जोहार लाइव ब्यूरो
शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है. मां कूष्मांडा को सूर्य के समान तेजस्वी माना गया है. मां कूष्मांडा का स्वरूप भक्तों को कर्मयोग अपनाने और जीवन में प्रकाश व ऊर्जा अर्जित करने की प्रेरणा देता है. उनकी मधुर मुस्कान जीवनी शक्ति का संचार करती है और हमें कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए सफलता पाने की राह दिखाती है. भगवती दुर्गा का यह स्वरूप अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की उत्पत्ति के लिए जाना जाता है. इसलिए इन्हें इन्हें आदिशक्ति और अष्टभुजा देवी कहा जाता है. जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर अंधकार व्याप्त था, तब देवी कूष्मांडा ने ब्रह्मांड की रचना की. इस कारण इन्हें सृष्टि की आदि-स्वरूपा और आदि शक्ति कहा जाता है.
मां कूष्मांडा पूजा विधि
- स्नान और संकल्प: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ या पीले रंग के वस्त्र धारण करें. इसके बाद माता की पूजा और व्रत का संकल्प लें.
- स्थान और स्थापना: पूजा घर या ईशान कोण में एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं. उस पर मां कूष्मांडा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें और गंगाजल छिड़कें.
- कलश पूजन: सबसे पहले गणेश जी और कलश (नवरात्र में स्थापित कलश) एवं उनमें विराजमान देवी-देवताओं की पूजा करें.
- शृंगार और सामग्री: माता को पंचामृत से स्नान कराएं, फिर उन्हें रोली, अक्षत (चावल), लाल पुष्प, धूप, गंध और श्रृंगार का सामान अर्पित करें.
- भोग : मां कूष्मांडा को मालपुए का भोग अत्यंत प्रिय है. इसके अलावा आप फलों और पेड़े का भोग भी लगा सकते हैं.
- मंत्र जाप: पूजा के दौरान देवी के मंत्र का जप करें- ॐ कूष्माण्डायै नम:
- स्तुति मंत्र : सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
- आरती और प्रसाद वितरण: अंत में श्रद्धापूर्वक मां की आरती उतारें। पूजा के बाद मालपुए और अन्य प्रसाद को किसी दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को दान करें, फिर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें और बड़ों का आशीर्वाद लें.
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