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    Home»जोहार ब्रेकिंग»SAIL और BCCL का ऐतिहासिक करार : पश्चिम बंगाल में विकसित होंगे दो नए कोकिंग कोल ब्लॉक
    जोहार ब्रेकिंग

    SAIL और BCCL का ऐतिहासिक करार : पश्चिम बंगाल में विकसित होंगे दो नए कोकिंग कोल ब्लॉक

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkSeptember 26, 2026Updated:September 26, 2026No Comments4 Mins Read3
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    भारत में तेजी से बढ़ते स्टील उत्पादन के बीच अब इसके सबसे अहम कच्चे माल यानी कोकिंग कोल की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है. स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) और भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) ने आपस में हाथ मिलाते हुए पश्चिम बंगाल स्थित दो महत्वपूर्ण कोकिंग कोल ब्लॉकों को संयुक्त रूप से विकसित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है. इस संबंध में बीते 25 सितंबर को दोनों सरकारी कंपनियों के बीच आधिकारिक तौर पर एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए.

    इस संयुक्त परियोजना के शुरू होने से दोनों ब्लॉकों से मिलकर सालाना लगभग 40 लाख टन कोकिंग कोल का उत्पादन किए जाने की क्षमता तैयार होगी, जिससे देश के इस्पात उद्योग को एक मजबूत घरेलू समर्थन मिलेगा.

    क्या है इस समझौते की रूपरेखा?

    इस परियोजना के तहत SAIL का ‘इंडिकट्टा रामनगर ब्लॉक’ और BCCL का ‘ईस्ट ऑफ दामागोरिया (कल्याणेश्वरी) ब्लॉक’ शामिल हैं. शुरुआती चरण में इन दोनों ब्लॉकों से करीब 7.9 करोड़ टन निकालने योग्य (extractable) कोयला भंडार होने का अनुमान लगाया गया है.

    सामान्यतः दो अलग-अलग खदानों का संचालन स्वतंत्र रूप से होता है, लेकिन इस परियोजना में दोनों खदानें एक-दूसरे के संसाधनों का पूरक बनकर काम करेंगी. जिसमें पहले चरण के दौरान कल्याणेश्वरी ब्लॉक से कोयला निकाला जाएगा, जबकि खनन प्रक्रिया में निकलने वाले ओवरबर्डन (यानी मिट्टी, पत्थर और मलबा) को रामनगर ब्लॉक में डंप किया जाएगा.

    दूसरे चरण में रामनगर ब्लॉक में खनन का काम होगा और वहां से निकलने वाले ओवरबर्डन को कल्याणेश्वरी ब्लॉक के क्षेत्र में डंप किया जाएगा. इस अदला-बदली वाली व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य दोनों ब्लॉकों के संसाधनों का अधिकतम और कुशल उपयोग सुनिश्चित करना है.

    स्टील उद्योग के लिए कोकिंग कोल क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

    कोकिंग कोल सामान्य ऊर्जा या ईंधन वाले कोयले से काफी अलग होता है. यह सीधे तौर पर स्टील निर्माण की बुनियादी प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है. जब इस कोकिंग कोल को हवा की गैर-मौजूदगी में उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है, तब इससे ‘कोक’ (Coke) तैयार होता है.

    ब्लास्ट फर्नेस (भट्टी) के भीतर यही कोक, लौह अयस्क से लोहा पिघलाकर अलग करने के लिए जरूरी अत्यधिक तापमान और रासायनिक प्रतिक्रिया को संभव बनाता है. इसके अलावा, यह फर्नेस के भीतर एक मजबूत और छिद्रयुक्त ढांचा भी बनाए रखता है, जिससे भट्टी के अंदर गर्म गैस और हवा का निरंतर प्रवाह सुचारू रूप से चलता रहता है. यही वजह है कि उच्च गुणवत्ता वाले कोकिंग कोल की मांग हमेशा स्टील सेक्टर में बनी रहती है.

    आयात पर निर्भरता घटाने की मजबूरी

    भारत में जैसे-जैसे स्टील का कुल उत्पादन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे कोकिंग कोल की मांग भी आसमान छू रही है. हालांकि, देश के भीतर इसकी घरेलू उपलब्धता मांग के मुकाबले कम है, जिसके चलते भारतीय स्टील उद्योग को अपनी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है.

    SAIL और BCCL का यह समझौता सिर्फ दो खदानों के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दूरगामी उद्देश्य देश के भीतर कोकिंग कोल का उत्पादन बढ़ाकर विदेशी आयात पर निर्भरता को कम करना और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में आगे बढ़ना है.

    शुक्रवार को प्रधानमंत्री के सलाहकार तरुण कपूर ने कोलकाता स्थित कोल इंडिया के कॉरपोरेट कार्यालय का दौरा किया और कंपनी के मौजूदा उत्पादन तथा सप्लाई की उच्चस्तरीय समीक्षा की. बैठक में देश भर के थर्मल पावर प्लांटों को कोयले की निर्बाध आपूर्ति, व्यावसायिक विविधता और कोयला गैसीफिकेशन परियोजनाओं की प्रगति और आगामी समय में कोयला उत्पादन को और अधिक गति देने की रणनीति पर चर्चा की गई.

    कोल इंडिया द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में अब तक कंपनी ने 310 मिलियन टन से अधिक कोयले का उत्पादन कर लिया है. इस अवधि में कुल कोयला सप्लाई 371 मिलियन टन से ज्यादा दर्ज की गई, जिसमें से अकेले 291 मिलियन टन से अधिक की आपूर्ति केवल बिजली क्षेत्र को की गई है.

    Also Read : झारखंड: क्यूएस बिजनेस मास्टर्स रैंकिंग में IIM रांची की इंट्री, एशिया में मैनेजमेंट की 21वीं और बिजनेस एनालिटिक्स की 16वीं रैंक

    BCCL SAIL
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