एक ऐसा दौर जब घर में टीवी होना ही बड़ी बात थी. चैनल सिर्फ एक था और रिमोट पर बटन भी गिने-चुने. कार्यक्रम अपनी मर्जी से नहीं, तय समय पर आते थे और उन्हें देखने के लिए पूरा परिवार टीवी के सामने बैठता था. रविवार की सुबह हो या शाम की खबर, स्क्रीन पर दूरदर्शन का लोगो आते ही घर का माहौल बदल जाता था.
आज जब मोबाइल की एक स्क्रीन पर दुनिया भर के चैनल और हजारों वीडियो मौजूद हैं, उस दौर को याद करना किसी पुराने एलबम के पन्ने पलटने जैसा है. लेकिन यह सिर्फ नॉस्टैल्जिया की कहानी नहीं है. यह उस माध्यम की कहानी है जिसने भारत को टीवी देखना सिखाया, जिसने खबरों को घरों तक पहुंचाया, जिसने गांव-कस्बों को एक राष्ट्रीय स्क्रीन से जोड़ा और जिसने भारतीय टेलीविजन की नींव रखी.
15 सितंबर 1959 को दिल्ली से एक छोटे ट्रांसमीटर और अस्थायी स्टूडियो के साथ शुरू हुआ दूरदर्शन का सफर आज भारतीय टेलीविजन के इतिहास का सबसे बड़ा अध्याय बन चुका है. दूरदर्शन की स्थापना भी इसी दिन भारत सरकार द्वारा की गई थी. शुरुआत एक प्रायोगिक प्रसारण के तौर पर हुई. नियमित दैनिक प्रसारण 1965 में शुरू हुआ और उस समय दूरदर्शन, ऑल इंडिया रेडियो का ही हिस्सा था. शुरुआती दौर में समाचार बुलेटिन भी महज कुछ मिनट का होता था.
पांच मिनट की खबर से शुरू हुआ सफर
आज न्यूज चैनलों पर 24 घंटे खबरें चलती हैं. हर कुछ मिनट में ब्रेकिंग न्यूज आती है. लेकिन एक समय ऐसा भी था जब टीवी पर खबर देखने के लिए लोगों को इंतजार करना पड़ता था. 1965 में दूरदर्शन के नियमित दैनिक प्रसारण की शुरुआत हुई. इसी दौर में प्रतिमा पुरी जैसे समाचार वाचकों ने टीवी न्यूज को घर-घर पहुंचाना शुरू किया. बाद में सलमा सुल्तान, गीतांजलि अय्यर, नीति रविंद्रन और रिनी साइमन जैसे चेहरे भारतीय टेलीविजन समाचार की पहचान बने.
दूरदर्शन सिर्फ खबरों तक सीमित नहीं रहा. 26 जनवरी 1967 को शुरू हुआ कृषि दर्शन भारतीय टेलीविजन के सबसे लंबे समय तक चलने वाले कार्यक्रमों में शामिल हुआ. इसका मकसद मनोरंजन के बजाय किसानों तक खेती से जुड़ी जानकारी पहुंचाना था. यानी टीवी उस समय सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं था. वह शिक्षा, सूचना और जनसंचार का भी जरिया था.
जब टीवी दिल्ली से निकलकर दूसरे शहरों तक पहुंचा
दूरदर्शन का शुरुआती प्रसारण दिल्ली तक सीमित था. लेकिन धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ने लगा. 1972 में टेलीविजन सेवा मुंबई और अमृतसर तक पहुंची. 1975 तक देश के सिर्फ सात शहरों में टेलीविजन उपलब्ध था और उन सभी जगहों पर दूरदर्शन ही प्रमुख टीवी प्रसारक था.
फिर आया 1 अप्रैल 1976 का दिन, जब टेलीविजन सेवाओं को आधिकारिक तौर पर ऑल इंडिया रेडियो से अलग कर दिया गया. इसके बाद दूरदर्शन ने स्वतंत्र पहचान बनानी शुरू की और 1982 में वह दिन आया, जिसने भारतीय टेलीविजन का चेहरा बदल दिया.
15 अगस्त 1982. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का स्वतंत्रता दिवस भाषण पहली बार रंगीन टेलीविजन पर सीधे प्रसारित हुआ. इसके बाद दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों का रंगीन प्रसारण हुआ. भारत में टीवी अब सिर्फ एक स्क्रीन नहीं रह गया था. वह धीरे-धीरे परिवार के बीच बैठने की एक वजह बनने लगा. 1982 में दूरदर्शन राष्ट्रीय प्रसारक बना. इसके बाद नेटवर्क का विस्तार हुआ और देश के अलग-अलग हिस्सों तक टीवी पहुंचने लगा. यही वह दौर था जब टीवी के सामने बैठना परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनने लगा.
रविवार की सुबह और खाली सड़कें
फिर आया 1980 का दशक. टीवी पर रामायण और महाभारत जैसे धारावाहिक प्रसारित होने लगे. इन कार्यक्रमों ने सिर्फ दर्शकों की संख्या नहीं बढ़ाई, बल्कि टेलीविजन देखने की संस्कृति ही बदल दी. रविवार की सुबह टीवी के सामने परिवार जुटता था. कई जगहों पर लोग पड़ोसियों के घर जाकर कार्यक्रम देखते थे. जिन घरों में टीवी नहीं होता था, वहां भी उसकी कमी महसूस होती थी.
दूरदर्शन ने इस दौर में मनोरंजन के साथ-साथ एक साझा राष्ट्रीय टेलीविजन अनुभव तैयार किया. हालांकि, दूरदर्शन की इस भूमिका की आलोचना भी हुई. कुछ अध्ययनों में आरोप लगाया गया कि उसके कार्यक्रमों में भारत की विविधता के बजाय एक खास उत्तर भारतीय, हिंदी और हिंदू सांस्कृतिक छवि को ज्यादा जगह मिली. यानी दूरदर्शन की कहानी सिर्फ लोकप्रियता की कहानी नहीं है. यह इस सवाल की कहानी भी है कि देश को टीवी पर किस तरह दिखाया गया.
एक चैनल से दर्जनों चैनलों तक
1980 के दशक की शुरुआत में जहां टेलीविजन के विकल्प बेहद सीमित थे, वहीं 1990 के दशक में तस्वीर तेजी से बदलने लगी. निजी टेलीविजन चैनलों के आने के बाद दर्शकों के सामने मनोरंजन और खबरों के कई विकल्प आ गए. दूरदर्शन के लिए यह पहली बड़ी चुनौती थी.
डीडी-1 और डीडी-2 जैसे चैनलों का स्वरूप बदला गया. बाद में डीडी नेशनल और डीडी मेट्रो जैसे नाम सामने आए. 2003 में डीडी मेट्रो की जगह डीडी न्यूज ने ली और 24 घंटे समाचार प्रसारण शुरू किया.
धीरे-धीरे दूरदर्शन ने भी अपने नेटवर्क का विस्तार किया. राष्ट्रीय चैनलों के साथ क्षेत्रीय भाषाओं के चैनल शुरू हुए. आज इसके नेटवर्क में हिंदी के साथ नागपुरी, संताली, बंगाली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी और कई दूसरी भाषाओं में प्रसारण करने वाले चैनल शामिल हैं. झारखंड के लिए भी इसका अपना क्षेत्रीय चैनल डीडी झारखंड है, जिसमें हिंदी के साथ नागपुरी और संताली में प्रसारण होता है.
फिर आया इंटरनेट का दौर
दूरदर्शन के सामने चुनौती अब सिर्फ निजी टीवी चैनल नहीं थे. इंटरनेट आया. फिर स्मार्टफोन आया. सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म आए. दर्शक अब किसी तय समय पर कार्यक्रम देखने के लिए टीवी के सामने बैठने को मजबूर नहीं था.
वह अपनी पसंद का कार्यक्रम अपनी सुविधा के समय देख सकता था. इस बदलाव ने दूरदर्शन की पुरानी दर्शक-आधारित ताकत को चुनौती दी. निजी चैनलों के आने के बाद उसके दर्शकों की संख्या में गिरावट दर्ज हुई और टेलीविजन बाजार में अपनी जगह बनाए रखना उसके लिए मुश्किल हुआ. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई.
कोरोना में फिर लौट आया पुराना दूरदर्शन
2020 में कोरोना महामारी और देशव्यापी लॉकडाउन के बीच करोड़ों लोग घरों में कैद थे. और अचानक लोगों की नजर फिर उसी पुराने दूरदर्शन पर गई. डीडी नेशनल पर रामायण का दोबारा प्रसारण शुरू हुआ. 16 अप्रैल 2020 को रात 9 बजे प्रसारित एक एपिसोड को 7.7 करोड़ दर्शकों ने देखा. पूरे प्रसारण के दौरान शो ने 28.5 करोड़ से ज्यादा दर्शकों तक पहुंच बनाई. महाभारत, चाणक्य, श्री कृष्ण, मालगुडी डेज, ब्योमकेश बख्शी और शक्तिमान जैसे पुराने कार्यक्रम भी फिर चर्चा में आ गए.
जिस दौर में ओटीटी और डिजिटल प्लेटफॉर्म अपने पैर जमा चुके थे, उसी दौर में पुराने टीवी कार्यक्रमों ने दर्शकों को फिर पीछे मुड़कर देखने पर मजबूर कर दिया. इसी मांग को देखते हुए प्रसार भारती ने 2020 में डीडी रेट्रो लॉन्च किया, जो पुराने क्लासिक कार्यक्रमों के लिए समर्पित था. हालांकि कम दर्शक संख्या के कारण इसे 2023 में बंद कर दिया गया.
दूरदर्शन सिर्फ चैनल नहीं, एक दौर है
दूरदर्शन की कहानी में कई रंग हैं. यह उस भारत की कहानी है, जहां टीवी घर में आने वाला एक बड़ा सपना था. उस भारत की कहानी है जहां रविवार की सुबह रामायण देखने के लिए लोग समय से पहले टीवी के सामने बैठ जाते थे. उस भारत की कहानी है जहां समाचार वाचक टीवी स्क्रीन पर दिखाई देने वाला भरोसे का चेहरा हुआ करते थे.
लेकिन यही कहानी आलोचनाओं से भी भरी है. आपातकाल के दौरान दूरदर्शन के सरकारी प्रचार के माध्यम के रूप में इस्तेमाल होने के आरोप लगे. 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान सरकारी स्रोतों पर निर्भर रिपोर्टिंग को लेकर भी सवाल उठे. इसलिए दूरदर्शन को समझना सिर्फ पुरानी यादों को याद करना नहीं है. यह भारत में मीडिया और सत्ता के रिश्ते को समझने की कोशिश भी है.
दूरदर्शन खत्म नहीं हुआ, बस दौर बदल गया
कभी दूरदर्शन के सामने पूरा देश बैठता था. आज वही दर्शक कई स्क्रीन में बंट चुका है. तब एक चैनल था, इसलिए इंतजार था. आज हजारों विकल्प हैं, इसलिए ध्यान टिकाना मुश्किल है.
लेकिन दूरदर्शन को सिर्फ इस आधार पर नहीं देखा जा सकता कि आज उसके सामने कितने दर्शक बैठते हैं. उसकी असली कहानी उन करोड़ों घरों में छिपी है, जहां उसने पहली बार टेलीविजन की खिड़की खोली थी. उसने भारत को खबरों से जोड़ा, मनोरंजन के नए मायने दिए और अलग-अलग हिस्सों को एक साझा स्क्रीन पर ला खड़ा किया.
समय के साथ वह स्क्रीन बदल गई. ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीन हुई, फिर केबल और सैटेलाइट तक पहुंची और अब मोबाइल की हथेली में सिमट गई. मगर इस पूरी यात्रा की पहली तस्वीर आज भी दूरदर्शन ही है.

