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    Home»जोहार ब्रेकिंग»सड़कों पर उतरा युवाओं का गुस्सा, क्या बड़े जनआंदोलन की आहट है?
    जोहार ब्रेकिंग

    सड़कों पर उतरा युवाओं का गुस्सा, क्या बड़े जनआंदोलन की आहट है?

    Joharlive NetworkBy Joharlive NetworkJuly 24, 2026No Comments3 Mins Read0
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    जमीन के भीतर लंबे समय से खदबदाहट थी. ऊपर से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन जब वही खदबदाहट ज्वालामुखी की तरह धरती की सतह को चीरकर बाहर आती है, तभी लोगों को पता चलता है कि भीतर कितना बड़ा विस्फोटक तैयार हो रहा था. आज देश के नौजवानों के आंदोलन की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है.

    शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी पर नवजवानों का संगठन बन जाएगा और उस संगठन के नेतृत्व में इतना व्यापक और जुझारू आंदोलन शुरू हो जाएगा ! जंतर-मंतर से शुरू होकर यह देश भर में फैलता जा रहा है. हर जगह युवाओं की भारी भागीदारी दिखाई दे रही हैं . बड़ी संख्या में युवतियाँ भी इस आंदोलन में सक्रिय दिखाई दे रहीं हैं. वे कह रही हैं कि इस भीड़ में वे स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस कर रही हैं। यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश है.

    यह आंदोलन केवल किसी एक घटना की प्रतिक्रिया नहीं है. इसके पीछे वर्षों से जमा होता असंतोष है. पिछले कुछ वर्षों से देश नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में चल रहा है. इस दौरान सरकार की नीतियों को लेकर समाज के एक बड़े वर्ग में यह धारणा बनी है कि इस सरकार में बड़े उद्योगपतियों और पूँजीपति समूहों को विशेष प्राथमिकता दी जा रही है. ग़रीबी और अमीरी के बीच खाई बेतहाशा बढ़ती जा रही है. गरीबों, किसानों, आदिवासियों और कमजोर वर्गों के हितों की अनदेखी हो रही है. बेरोज़गारी और महँगाई ने आम लोगों, विशेषकर युवाओं के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है.

    शायद सत्ता को यह ग़लतफ़हमी हो गई थी कि बग़ैर युवाओं की बात सुने केवल अपने मन की बात सुना कर, मुख्य धारा की मीडिया को अपने प्रचार का साधन बनाकर आम अवाम को अपने सम्मोहन में अनंत काल तक प्रभावित रखा जा सकता है. सरकार का जो भी निर्णय होगा जनता उन्हें चुपचाप स्वीकार करती रहेगी. लेकिन आज सड़कों पर दिखाई दे रहा नौजवानों का यह विस्फोट बता रहा है कि समाज के भीतर असंतोष लगातार जमा हो रहा था. यह उभार इस बात का संकेत है कि लोकतंत्र में जनता अंततः अपनी बात कहने का रास्ता खोज ही लेती है.

    अब यह आंदोलन रुकने वाला नहीं लगता. लगभग सभी राजनीतिक दल इसके साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं. उनके बीच मानो प्रतिस्पर्धा है कि युवाओं के इस उभार के साथ कौन स्वयं को अधिक मजबूती से जोड़ पाता है. हर दल अपनी-अपनी शैली में इस आंदोलन के निकट दिखाई देना चाहता है.
    फिर भी यह आंदोलन अभी तक किसी एक स्थापित नेता के नेतृत्व में नहीं है. 1974 के छात्र आंदोलन की तरह कोई सर्वमान्य नेतृत्व सामने नहीं आया है. विभिन्न लोग मंचों पर दिखाई दे रहे हैं और कई सामाजिक कार्यकर्ता भी समर्थन जता रहे हैं. सोनम वांगचुक जी ने भी युवाओं के समर्थन में अनशन किया है, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं का है जो अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे हैं.

    जब तक उनकी प्रमुख माँगें पूरी नहीं होतीं—और जिनमें एक प्रमुख माँग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की भी बताई जा रही है—तब तक आंदोलन के समाप्त होने की संभावना कम दिखाई देती है. शायद यह उभार अब उतने पर भी नहीं रूके.

    ( यह लेखक के निजी विचार है, शिवानन्द तिवारी बिहार के जाने माने नेता हैं और राष्ट्रीय जनता दल से राज्यसभा सांसद रह चुके हैं)

    Also Read : सादे कागज पर हस्ताक्षर लेकर रेप का केस करती है झारखंड की पुलिस

    शिवानंद तिवारी
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