पवन, रांची
राज्यसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद झारखंड के सत्ताधारी इंडिया ब्लॉक में शुरू हुआ अंदरूनी ‘शीत युद्ध’ अब खुलकर सामने आने लगा है. गठबंधन के उम्मीदवार की हार और कांग्रेस के भीतर मची रार के बीच सबसे बड़ा धमाका वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने किया है.
अपनी बेबाक और बागी छवि के लिए मशहूर वित्त मंत्री ने ब्यूरोक्रेसी के रवैये से नाराज होकर अपनी सरकारी गाड़ी और पूरी सुरक्षा वापस लौटा दी है. इस कदम के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि वे जल्द ही कैबिनेट से इस्तीफा दे सकते हैं.
राधाकृष्ण किशोर की नाराजगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे दिल्ली में होने के बावजूद होटल ताज में आयोजित ‘नेशनल स्टेकहोल्डर्स कंसल्टेशन’ जैसे बेहद महत्वपूर्ण सरकारी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए. इस पूरे घटनाक्रम ने हेमंत सोरेन सरकार के भीतर मचे घमासान को जगजाहिर कर दिया है.
भ्रष्टाचार के गंभीर दलदल और अदालती फैसलों ने छीनी कइयों की कुर्सी
झारखंड के राजनैतिक इतिहास का सबसे काला और बड़ा अध्याय साल 2006 से 2008 के बीच लिखा गया था, जब सूबे में निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा के नेतृत्व में सरकार चल रही थी. उस दौर में कैबिनेट के सबसे ताकतवर चेहरों में गिने जाने वाले मंत्री एनोस एक्का और हरि नारायण राय पर आय से अधिक संपत्ति बनाने, खनन पट्टों के आवंटन में धांधली और करोड़ों रुपये के घोटाले के गंभीर आरोप लगे.
यह मामला इतना बढ़ा कि केंद्रीय जांच एजेंसियों ने छापेमारी शुरू कर दी. चौतरफा फजीहत और कानूनी शिकंजे के भारी दबाव के बीच आखिरकार इन दोनों कद्दावर मंत्रियों को कैबिनेट से बेआबरू होकर निकलना पड़ा. बाद में अदालत ने इन दोनों को दोषी पाया और इन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी. यह झारखंड के इतिहास में भ्रष्टाचार के कारण मंत्रियों की विदाई का सबसे बड़ा उदाहरण बना.
योगेंद्र साव को देना पड़ा था अपना इस्तीफा
भ्रष्टाचार और आपराधिक गठजोड़ की ऐसी ही एक कहानी साल 2014 में हेमंत सोरेन की पहली सरकार के दौरान भी दोहराई गई. उस वक्त कांग्रेस कोटे से कद्दावर नेता योगेंद्र साव को कैबिनेट में कृषि मंत्री बनाया गया था. लेकिन कुछ ही समय बाद उन पर प्रतिबंधित नक्सली संगठनों और अपराधियों को संरक्षण देने के साथ-साथ खुद का एक गिरोह (झारखंड बचाओ आंदोलन) चलाने के सनसनीखेज आरोप लगे. पुलिस जांच में जैसे ही उनके खिलाफ पुख्ता सबूत मिले, सरकार और कांग्रेस पार्टी की साख दांव पर लग गई.
मुख्यमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व के भारी दबाव के बाद योगेंद्र साव को रोते-धोते अपना इस्तीफा सौंपना पड़ा था. इसी तरह, आजसू पार्टी के बड़े नेता चंद्रप्रकाश चौधरी को भी तकनीकी कानूनी अड़चनों और अदालती आदेशों के कारण अपनी मंत्री की कुर्सी से कुछ समय के लिए अस्थाई रूप से हटना पड़ा था, जिसके बाद झारखंड में मंत्रियों की योग्यता और तकनीकी जांच को लेकर लंबी बहस छिड़ गई थी.
जब स्वाभिमान और सियासी बगावत के कारण मंत्रियों ने खुद मारी लात
झारखंड की सियासत में सिर्फ आरोपों के कारण ही मंत्रियों की छुट्टी नहीं हुई, बल्कि अपनी ही सरकार के मुखिया से नीतिगत मतभेदों और स्वाभिमान की लड़ाई के कारण मंत्रियों के खुद पद छोड़ने का भी एक बेहद दिलचस्प इतिहास रहा है. इसका सबसे बड़ा और बेजोड़ उदाहरण साल 2019 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले देखने को मिला था. तत्कालीन रघुवर दास सरकार में खाद्य आपूर्ति मंत्री रहे सरयू राय अपनी ही सरकार के मुख्यमंत्री की कार्यशैली और कई नीतिगत फैसलों के खिलाफ लगातार आवाज उठा रहे थे.
विवाद तब अपने चरम पर पहुंच गया जब पार्टी ने विधानसभा चुनाव में उनका टिकट होल्ड पर रख दिया. सरयू राय ने इसे अपने स्वाभिमान पर चोट माना और तत्कालीन मुख्यमंत्री को चुनौती देते हुए कैबिनेट से अपना ऐतिहासिक इस्तीफा राजभवन को सौंप दिया. वे यहीं नहीं रुके, उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़कर जमशेदपुर पूर्वी सीट पर तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास को ही चुनाव हरा दिया, जो झारखंड की राजनीति में बगावत की सबसे बड़ी मिसाल बन गई. इसके अलावा, दलबदल की राजनीति ने भी झारखंड में मंत्रियों के इस्तीफे और उनकी बर्खास्तगी की कई पटकथाएं लिखी हैं.

2014 में ददई दुबे को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने किया था बर्खास्त
झारखंड की सियासत में फरवरी 2014 का वह दौर वाकई किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं था. एक तरफ कद्दावर नेता चंद्रशेखर दुबे उर्फ ददई दुबे थे, जिन्होंने अपनी ही सरकार के सीएम हेमंत सोरेन के खिलाफ सीधे बगावत का झंडा बुलंद कर दिया था. मीडिया के सामने सोरेन को सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री बताना और बालू खनन में करोड़ों की रिश्वतखोरी के आरोप लगाना सरकार को हजम नहीं हुआ. नतीजा यह हुआ कि जब कांग्रेस आलाकमान के अल्टीमेटम के बाद भी ददई दुबे ने इस्तीफा नहीं दिया, तो 19 फरवरी 2014 को उन्हें कैबिनेट से दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका गया यानी बर्खास्त कर दिया गया. इस बेइज्जती से नाराज ददई दुबे ने कांग्रेस को ‘बाय-बाय’ कहकर टीएमसी का दामन थाम लिया.
लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट ददई दुबे की बर्खास्तगी के बाद आया. कांग्रेस ने उनकी खाली कुर्सी पर पलामू के ही दूसरे तेजतर्रार ब्राह्मण नेता केएन त्रिपाठी को बिठाकर उन्हें ग्रामीण विकास मंत्री बना दिया. बस यहीं से पलामू प्रमंडल में ‘ब्राह्मणवाद’ और सियासी वर्चस्व की एक नई जंग छिड़ गई. ददई दुबे बरसों से खुद को पलामू में ब्राह्मणों का इकलौता और सबसे बड़ा चेहरा मानते थे. ऐसे में केएन त्रिपाठी का यह उभार उन्हें अपने ही गढ़ में सीधी चुनौती लगा.
ददई दुबे और उनके समर्थकों को लगा कि कांग्रेस जानबूझकर एक ब्राह्मण के खिलाफ दूसरे ब्राह्मण को खड़ा कर उनका सियासी वजूद खत्म करना चाहती है. इसके बाद तो दोनों गुटों में ‘असली ब्राह्मण नेता’ बनने की होड़ मच गई. जहां ददई दुबे अपनी ठेठ और बागी शैली से ब्राह्मण वोट बैंक को साधे रखना चाहते थे, वहीं केएन त्रिपाठी खुद को पढ़े-लिखे और नए जमाने के विकल्प के तौर पर पेश कर रहे थे. 2014 के चुनाव में यह खुन्नस साफ दिखी, जब दोनों ने अलग-अलग राह पकड़कर एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी.
झाविमो तोड़ छह विधायक भाजपा में हो गये थे शामिल
साल 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) के टिकट पर छह विधायक चुनाव जीतकर आए थे. लेकिन सरकार गठन के कुछ ही समय बाद अमर कुमार बाउरी और रणधीर सिंह समेत इन विधायकों ने अपनी मूल पार्टी तोड़ दी और बीजेपी में शामिल हो गए. इनाम के तौर पर अमर कुमार बाउरी और रणधीर सिंह को रघुवर दास कैबिनेट में मंत्री पद से नवाजा गया.
इसके बाद विपक्ष ने दल-बदल कानून के तहत इनकी सदस्यता रद्द करने और मंत्री पद से हटाने के लिए विधानसभा से लेकर अदालत तक लंबा कानूनी दंगल लड़ा. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मंत्रियों के इस्तीफे के दबाव और स्पीकर के कोर्ट में चली लंबी सुनवाई ने राज्य की राजनीति को महीनों तक गरमाए रखा था. अब ठीक वैसे ही हालात वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर के बागी तेवरों से बनते दिख रहे हैं, जहां अफसरशाही से अपमानित होकर उन्होंने सुरक्षा छोड़ दी है और उनका यह कदम झारखंड के इसी पुराने सियासी फ्लैशबैक की याद दिला रहा है.
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