संयुक्त सचिव वित्त विभाग के द्वारा मेरे आप्त सचिव को दिए गए नोटिस मेरे लिए इंबैरेसिंग है. अतः मैं वाहन सहित पुलिस बलों को वापस कर रहा हूं. ये किसी आम के नहीं, बल्कि खास व्यक्ति के द्वारा लिखा गया पत्र का एक हिस्सा है. वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने अपनी सुरक्षा सरकार को वापस कर दी है. यानी उनकी सुरक्षा में लगे कर्मियों को उन्होंने सरकार को लौटा दिया है.
दरअसर पूरा मामला ये है कि सोरेन सरकार के कद्दावर वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने पुलिस सुरक्षा लेने से साफ इनकार कर दिया है. उन्होंने न सिर्फ इस पर गहरी नाराजगी जताई है, बल्कि अपने कोटे के सभी पुलिस जवानों और गाड़ियों को पुलिस मुख्यालय को वापस लौटा दिया है.
मंत्री ने इस संबंध में सूबे की डीजीपी को एक कड़ा पत्र लिखा है. पत्र में उन्होंने लिखा है कि उनकी सुरक्षा में कुल 16 पुलिस जवान तैनात किए गए थे. इन 16 जवानों को चलने के लिए पुलिस मुख्यालय की तरफ से मात्र 3 सरकारी गाड़ियां दी गई थीं.
मंत्री राधाकृष्ण किशोर का कहना है कि इन गाड़ियों में सुरक्षा के साजो-सामान के साथ इतने जवानों को ठूंस-ठूंस कर बैठाना पड़ता है, जो सुरक्षा के लिहाज से बिल्कुल भी सही नहीं है. इसी परेशानी को देखते हुए उन्होंने 21 अप्रैल 2026 को DGP को एक चिट्ठी लिखी थी और जवानों के सही तालमेल के लिए एक अतिरिक्त गाड़ी की मांग की थी. लेकिन पुलिस मुख्यालय की ओर से उनकी इस मांग पर कोई जवाब नहीं आया.
मामला तब और बिगड़ गया जब नई गाड़ी मिलने के बजाय वित्त विभाग के संयुक्त सचिव पंकज कुमार सिंह ने एक नोटिस जारी कर दिया. इस नोटिस में एक पुराने सरकारी आदेश का हवाला देते हुए मंत्री राधाकृष्ण किशोर के बेड़े में शामिल तीन गाड़ियों में से भी एक गाड़ी को तुरंत पुलिस मुख्यालय वापस करने का हुक्म सुना दिया गया.
यह नोटिस सीधे मंत्री जी को न देकर उनके पर्सनल सेक्रेटरी को थमाया गया, जिससे मंत्री राधाकृष्ण किशोर बेहद आहत और नाराज हो गए. उन्होंने DGP को लिखे पत्र में साफ-साफ कहा कि उनके विभाग के ही संयुक्त सचिव द्वारा उनके स्टाफ को इस तरह का नोटिस दिया जाना उनके लिए बेहद शर्मनाक है और वे गाड़ियों के साथ जवानों को भी वापस लोटा रहे हैं.
जब अपनी ही सरकारों के लिए बने ‘सिरदर्द’
झारखंड की राजनीति में राधाकृष्ण किशोर एक ऐसे नेता माने जाते हैं, जिन्हें सत्ता की मलाई से ज्यादा अपनी शर्तों पर राजनीति करना पसंद है. वे चाहे जिस भी दल में रहे हों, जनता के मुद्दों पर उन्होंने कभी अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करने से परहेज नहीं किया. यही वजह है कि वे जब भी सत्ता पक्ष का हिस्सा रहे, अपनी ही सरकारों के लिए सबसे बड़े ‘सिरदर्द’ साबित हुए.
साल 2014 से 2019 के बीच जब झारखंड में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली रघुवर दास सरकार चल रही थी, तब राधाकृष्ण किशोर को सत्ता पक्ष का मुख्य सचेतक बनाया गया था. संसदीय व्यवस्था मं मुख्य सचेतक का काम अपनी पार्टी के विधायकों को अनुशासन में रखना और सरकार की नीतियों का सदन में बचाव करना होता है. लेकिन किशोर का मिजाज इस पद की बंदिशों में नहीं बंध सका.
साल 2017 और 2018 के दौरान जब रघुवर सरकार अपनी कार्यशैली को लेकर आगे बढ़ रही थी, तब राधाकृष्ण किशोर ने रांची विधानसभा परिसर से लेकर मीडिया के कैमरों के सामने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.
उनका सबसे बड़ा हमला बेलगाम नौकरशाही पर था. उन्होंने खुले मंचों से कहा कि राज्य में अफसरशाही इस कदर हावी हो चुकी है कि अधिकारी न तो जनप्रतिनिधियों की सुन रहे हैं और न ही उन्हें जनता के सुख-दुख से कोई सरोकार है.
एक सत्ताधारी मुख्य सचेतक के मुंह से अपनी ही सरकार की ऐसी आलोचना ने विपक्ष को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा थमा दिया था. रघुवर सरकार के कार्यकाल के दौरान झारखंड में स्थानीयता और नियोजन नीति को लेकर काफी विवाद चल रहा था. भाजपा इस मुद्दे पर एक खास स्टैंड ले चुकी थी, लेकिन राधाकृष्ण किशोर ने अपनी पार्टी की लाइन से पूरी तरह अलग राह चुनी.
उन्होंने पलामू और अपने विधानसभा क्षेत्र छतरपुर की जनसभाओं में दहाड़ते हुए ऐलान कर दिया कि झारखंड की तृतीय और चतुर्थ वर्गीय नौकरियों में शत-प्रतिशत हक सिर्फ और सिर्फ यहां के स्थानीय युवाओं का होना चाहिए.
इस बयान के बाद पार्टी के भीतर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग उठने लगी, लेकिन किशोर पीछे नहीं हटे. नतीजा यह हुआ कि साल 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उनका टिकट काट दिया. इस पर उन्होंने जरा भी देर नहीं की, तुरंत मुख्य सचेतक के पद से इस्तीफा दिया और बगावत का झंडा बुलंद करते हुए आजसू का दामन थाम लिया.
बागी तेवर या कुछ और
राधाकृष्ण किशोर का यह बागी तेवर सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जब राज्य में जेएमएम-कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन की सरकार आई, तब भी वे जनता के सवालों पर डटे रहे. साल 2023 और 2024 की शुरुआत में जब झारखंड में जेएसएससी-सीजीएल पेपर लीक का मामला बेहद गर्म था और छात्र सड़कों पर लाठियां खा रहे थे, तब राधा कृष्ण किशोर ने रांची और पलामू में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर तत्कालीन हेमंत सरकार को सीधे कटघरे में खड़ा किया था.
उन्होंने तीखा हमला बोलते हुए कहा था कि रांची के एसी कमरों में बैठकर पलामू के सूखे और युवाओं के दर्द का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. उन्होंने नौजवानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाली जांच एजेंसियों पर तुरंत ताला लगाने की मांग की थी. इसके अलावा पलामू प्रमंडल में पानी, अकाल और सिंचाई के मुद्दों पर उन्होंने अपनी मुखर आवाज से हेमंत सरकार के मंत्रियों को कई बार बैकफुट पर धकेल दिया था.
वक्त बदला और साल 2024 के अंत में राधाकृष्ण किशोर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर हेमंत सोरेन सरकार में कैबिनेट मंत्री बन गए. उन्हें वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई. लेकिन उनका पुराना मिजाज आज भी वैसा ही है.
सरकार के भीतर रहने के बावजूद जब उनकी सुरक्षा और सहूलियत की अनदेखी की गई, तो उन्होंने किसी और के बजाय सीधे अपनी ही सरकार की ब्यूरोक्रेसी से टक्कर ले लिया. सुरक्षा की गाड़ियों के तालमेल को लेकर जब वित्त विभाग के ही संयुक्त सचिव ने एक नोटिस जारी किया, तो मंत्री ने इसे अपने आत्मसम्मान पर चोट माना. उन्होंने सीधे सूबे के डीजीपी को कड़ा पत्र लिखा और अपने कोटे की पूरी सुरक्षा और गाड़ियां वापस लौटा दीं.
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