New Delhi : सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों में हो रहे अवैध खनन को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए इसे “पूर्ण अपराध” करार दिया है। बुधवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि गैर-कानूनी खनन से पर्यावरण को ऐसा नुकसान होता है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। इस गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अरावली में खनन और उससे जुड़े तमाम मुद्दों की व्यापक जांच के लिए विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र समिति गठित करने के पक्ष में फैसला सुनाया है।
क्या है अरावली विवाद:
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर उठे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने ‘इन री: डेफिनिशन ऑफ अरावली हिल्स एंड रेंजेज एंड एंसिलरी इश्यूज’ मामले में स्वतः संज्ञान लिया था। नवंबर 2025 में कोर्ट ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए नई खनन लीज पर रोक लगा दी थी। समिति ने सुझाव दिया था कि स्थानीय क्षेत्र से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भूमि को अरावली पहाड़ी माना जाए और 500 मीटर के भीतर स्थित दो या अधिक पहाड़ियों को अरावली रेंज की श्रेणी में रखा जाए। इसी परिभाषा को लेकर अब व्यापक समीक्षा की जा रही है।
विशेषज्ञ समिति गठित करने के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट :
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और के. एम. नटराज अदालत में उपस्थित रहे। वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि अलग-अलग इलाकों में बड़े पैमाने पर अवैध खनन और पेड़ों की कटाई हो रही है, जिस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। सीजेआई सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा कि अवैध खनन पूरी तरह से एक आपराधिक कृत्य है और इसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि कोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन होना चाहिए और सरकार को अपनी पूरी मशीनरी का इस्तेमाल कर इस पर रोक लगानी चाहिए। राजस्थान सरकार की ओर से पेश हुए एएसजी और के. एम. नटराज ने अदालत को भरोसा दिलाया कि अवैध खनन रोकने के लिए हर संभव कदम उठाए जाएंगे।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले में पहले ही स्वतः संज्ञान ले चुका है और नई रिट याचिकाएं दाखिल करने से बचा जाना चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि उन्होंने अरावली के इतिहास और वैज्ञानिक पहलुओं को लेकर हस्तक्षेप याचिका दाखिल की है और अदालत की सहायता करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि अरावली को परिभाषित करना अपने आप में एक जटिल विषय है, क्योंकि यह एक सब-टेक्टोनिक स्ट्रक्चर है जो गुजरात से उत्तर प्रदेश तक फैला है।
इस पर सीजेआई ने कहा कि अदालत को डोमेन एक्सपर्ट्स की एक ऐसी टीम की जरूरत है, जिसमें पर्यावरणविद, वैज्ञानिक, वन विशेषज्ञ और खनन से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हों। यह समिति सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी और पर्यवेक्षण में काम करेगी और चरणबद्ध तरीके से अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। अदालत ने ASG और एमिकस क्यूरी को चार सप्ताह के भीतर ऐसे विशेषज्ञों के नाम सुझाने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अवैध खनन में शामिल लोगों के खिलाफ कानून अपना काम करेगा। अदालत ने 29 दिसंबर 2025 को जारी अंतरिम आदेश को अगले निर्देश तक लागू रखने का फैसला किया है। गौरतलब है कि इससे पहले कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को लेकर जारी 20 नवंबर के निर्देशों पर भी अस्थायी रोक लगा दी थी।
Also Read : मुंबई की अंधेरी गलियों से उठता खौफ, ‘दलदल’ की ट्रेलर ने बढ़ाया रोमांच

