जब आप तिरंगे को लहराते हुए देखते हैं, तो आपके दिमाग में सबसे पहले क्या ख्याल आता है?
जज्बा, जुनून और देशभक्ति या अपने देश के प्रति सम्मान और उसकी पहचान?
लेकिन क्या कभी आपके मन में यह सवाल आया है कि भारत के इस तिरंगे को डिजाइन किसने किया था?
चलिए, आज हम उसी शख्स की कहानी जानते हैं.
शुरुआत से शुरू करते हैं..
भारत के राष्ट्रीय ध्वज को डिजाइन करने वाले विभूति का नाम पिंगली वेंकैया है. पिंगली वेंकैया वर्तमान आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के भटलापेनुमरु गांव के रहने वाले थे. उनका जन्म 2 अगस्त 1876 को इसी गांव में हुआ था. यह गांव वर्तमान में मछलीपट्टनम के पास स्थित है.
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मद्रास (अब चेन्नई) में प्राप्त की और आगे की पढ़ाई लाहौर में की. वे संस्कृत, उर्दू और जापानी भाषा सहित कई विषयों के जानकार माने जाते थे. पढ़ाई के बाद उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना में सैनिक के रूप में सेवा की. बाद में वे कृषि और भूविज्ञान के अध्ययन एवं शोध से भी जुड़े. उनकी बहुमुखी प्रतिभा के कारण उन्हें कृषि वैज्ञानिक और भूविज्ञान के जानकार के रूप में भी पहचान मिली.
जहां से पिंगली स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े
ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा के दौरान वे दक्षिण अफ्रीका गए. वहीं पिंगली वेंकैया की मुलाकात महात्मा गांधी से हुई. इसके बाद वे गांधीजी के विचारों से प्रभावित हुए और धीरे-धीरे उनके करीब आते चले गए. वे स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्र निर्माण से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय रूप से काम करने लगे.
उस दौर में देश पर अंग्रेजों का शासन था. पिंगली वेंकैया ने महसूस किया कि स्वतंत्रता आंदोलन के लिए कोई ऐसा सर्वमान्य राष्ट्रीय ध्वज नहीं है, जो सभी स्वतंत्रता सेनानियों और देशवासियों को एकजुट कर सके. समय-समय पर कई तरह के झंडे सामने आए, लेकिन उनमें से कोई भी सर्वमान्य नहीं बन पाया.
इसके बाद उन्होंने विभिन्न देशों के राष्ट्रीय ध्वजों का अध्ययन करना शुरू किया. इसी दौरान उन्होंने एक ऐसे झंडे की कल्पना की, जो भारत की स्वतंत्रता की भावना और उसकी विविधता को प्रदर्शित कर सके.
एक राष्ट्रीय गाथा तिरंगे की
साल 1921 में विजयवाड़ा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधी के सामने अपने झंडे का एक प्रारूप प्रस्तुत किया. उनके शुरुआती डिजाइन में लाल और हरे रंग की दो पट्टियां थीं. बाद में इसमें सफेद रंग को शामिल करने का सुझाव दिया गया. झंडे के बीच चरखे का प्रतीक भी रखा गया, जो उस समय स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक था.
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस झंडे का स्वरूप समय के साथ विकसित होता रहा. वर्ष 1931 में केसरिया, सफेद और हरे रंग की पट्टियों वाले चरखे के झंडे को कांग्रेस ने स्वीकार किया.
आजादी के करीब आते ही स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज को लेकर विचार-विमर्श शुरू हुआ. आखिरकार, 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने केसरिया, सफेद और हरे रंग की तीन पट्टियों तथा बीच में अशोक चक्र वाले तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया. दिन 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के साथ यही तिरंगा स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय पहचान बन गया.
Also Read : झारखंड विधानसभा: 11 साल पहले पूछा था सवाल, आज तक ढूंढा जा रहा जवाब

