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    Home»जोहार ब्रेकिंग»झारखंड विधानसभा: 11 साल पहले पूछा था सवाल, आज तक ढूंढा जा रहा जवाब
    जोहार ब्रेकिंग

    झारखंड विधानसभा: 11 साल पहले पूछा था सवाल, आज तक ढूंढा जा रहा जवाब

    6 अगस्त से झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होगा. इस दौरान विधायक अपने क्षेत्रों की समस्याओं को लेकर सरकार से सवाल पूछेंगे. लेकिन उन सवालों का क्या होता है?
    Joharlive NetworkBy Joharlive NetworkAugust 2, 2026No Comments5 Mins Read9
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    विजय उराँव

    आगामी 6 अगस्त से झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होने वाला है, इस दौरान कई विधायक अपने-अपने क्षेत्र से संबंधित समस्याओं को लेकर सरकार से सवाल करेंगे. लेकिन उनके सवालों का क्या हाल होता है, आपको इस रिपोर्ट से जानने की जरूरत है.

    एक संवेदनशील विषय को विधानसभा से अपराध अनुसंधान विभाग (CID) तक पहुंचने में कितना समय लग सकता है? एक साल, दो साल या एक सरकार का कार्यकाल… नहीं. झारखंड में एक मुद्दे को CID तक पहुंचने में पूरे 11 साल लग गए.

    2015 की वो विधानसभा कार्रवाई, जहाँ से बात शुरू हुई

    दरअसल, मामला वर्ष 2015 का है. झारखंड विधानसभा में साल 2015 में लापता बच्चों को लेकर सवाल उठाया गया था. तत्कालीन विधायक प्रदीप यादव ने पूछा था कि क्या वर्ष 2005 से 2014 के बीच लापता हुए 1177 बच्चों का अब तक कोई सुराग नहीं मिला है. सवाल मानव तस्करी से जुड़े मामलों को लेकर था.

    इस सवाल के जवाब में तत्कालीन गृह मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा ने बताया था कि वर्ष 2005 से 2014 के बीच राज्य में 3829 बच्चों के लापता होने की सूचना मिली थी. इनमें 2546 बच्चों को बरामद कर लिया गया था, जबकि 1281 बच्चों का कोई सुराग नहीं मिला था. सरकार ने यह भी बताया था कि इन मामलों में 675 बच्चों की गुमशुदगी की प्राथमिकी दर्ज कर जांच की जा रही है. सरकार ने कहा था कि बाकी बच्चों के बारें में अनुसंधान चल रही है.

    11 साल बाद खुली फाइल

    साल 2015 में विधानसभा में उठाए गए इस मुद्दे पर अब एक बार फिर सरकारी फाइल खुली है. विधानसभा में दिए गए आश्वासन का अपडेट तैयार करने के लिए अपराध अनुसंधान विभाग (CID) ने राज्य के सभी जिलों से वर्ष 2005 से 2014 के बीच लापता हुए बच्चों का पूरा रिकॉर्ड मांगा है.

    CID ने 24 जुलाई 2026 को जारी पत्र में रांची, जमशेदपुर, धनबाद समेत सभी जिला पुलिस अधीक्षकों और रेल एसपी को दो दिनों के भीतर रिपोर्ट भेजने का निर्देश दिया है. रिपोर्ट में वर्षवार यह जानकारी मांगी गई है कि 2005 से 2014 के बीच कितने बच्चे लापता हुए, कितने बरामद हुए और कितने अब भी अप्राप्त हैं.

    दरअसल, गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने विधानसभा में दिए गए आश्वासन का अपडेट मांगा था. इसके बाद पुलिस मुख्यालय ने CID को रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया और CID ने सभी जिलों से पुराने मामलों का पूरा ब्योरा तलब कर लिया.

    यानी 11 साल पहले विधानसभा में उठा लापता बच्चों का मुद्दा आज भी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है. अब सरकार विधानसभा में यह बताने की तैयारी कर रही है कि इतने वर्षों बाद उन मामलों में क्या प्रगति हुई, कितने बच्चे मिल पाए और कितने आज भी लापता हैं.

    सिर्फ लापता बच्चों का नहीं, कई पुराने आश्वासनों का भी हिसाब

    गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने विधानसभा के जिन लंबित आश्वासनों पर अपडेट करने की रिपोर्ट मांगी है, उनमें वर्ष 2014 में विधायक हरिकृष्ण सिंह द्वारा उठाया गया आदिवासी समूह के विरुद्ध दर्ज मुकदमों को निरस्त करने का मामला, वर्ष 2024 में विधायक पौलुस सुरीन एवं अन्य सदस्यों द्वारा उठाया गया आदिवासी जमीन पर अवैध कब्जे की जांच का मामला, वर्ष 2015 में विधायक प्रदीप यादव तथा वर्ष 2022 में विधायक डॉ. कुशवाहा शशि भूषण मेहता द्वारा उठाए गए मानव तस्करी से जुड़े मामले, तथा वर्ष 2021 में विधायक चमरा लिंडा द्वारा उठाया गया अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से संबंधित आश्वासन भी शामिल हैं.

    सरकार की इस प्रक्रिया ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विधानसभा में दिए गए सरकारी आश्वासनों के निस्तारण में आखिर इतना लंबा समय क्यों लग रहा है, खासकर तब जब मामला सैकड़ों लापता बच्चों और उनके परिवारों से जुड़ा हो.

    विधानसभा आश्वासन क्यों है अहम?

    विधानसभा का आश्वासन किसी मंत्री द्वारा सदन के भीतर दिया गया ऐसा वादा होता है, जो केवल राजनीतिक बयान नहीं बल्कि सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाता है. जब कोई विधायक किसी जनहित के मुद्दे पर सवाल उठाता है और मंत्री जवाब में किसी काम को कराने, जांच कराने, नई योजना शुरू करने या किसी समस्या का समाधान करने का आश्वासन देते हैं, तो सरकार उस वादे को पूरा करने के लिए जवाबदेह हो जाती है. इन आश्वासनों की निगरानी विधानसभा की आश्वासन समिति भी करती है, ताकि यह पता चल सके कि सरकार ने अपने वादे पूरे किए या नहीं.

    11 साल बाद भी कई सवालों के जवाब बाकी

    – 11 साल तक सरकार क्या करती रही?
    – विधानसभा में दिए गए आश्वासन का अपडेट लेने में आखिर इतना वक्त क्यों लगा?
    – क्या यह सिर्फ विधानसभा में जवाब देने की औपचारिकता है या पुराने मामलों की फिर से जांच भी होगी?
    – 675 एफआईआर में कितने मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई और कितनों को सजा मिली?
    – 2005 से 2014 के बीच लापता हुए बच्चों में से कितने आज भी गायब हैं?
    – जिन मामलों को मानव तस्करी से जोड़कर देखा गया था, उनमें आखिर क्या कार्रवाई हुई?
    – क्या 11 साल की इस देरी की जिम्मेदारी भी कभी तय होगी?

    हालांकि, फाइल का 11 साल बाद खुलना अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी. सरकार को सिर्फ विधानसभा में अपडेट देना ही नहीं, बल्कि यह भी बताना होगा कि वर्षों से लंबित मामलों में न्याय दिलाने, मानव तस्करी के नेटवर्क पर कार्रवाई करने और अब भी लापता बच्चों का पता लगाने के लिए आगे क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे.

    Also Read : संसद में आदिवासी: क्या खत्म होने के कगार पर पहुंच चुकी है लद्दाख की चांगपाओं?

    जनता की समस्या विधानसभा झारखंड विधायक
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