वैवाहिक जीवन सही नहीं चल रही हो, संतान को लेकर झगड़े हो, विवाद हो और बात एक दूसरे को गाली-गलौज करने तक पहुंच जाए. तो क्या हर ऐसी बात पर आपराधिक मुकदमा चल सकता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले ने इस सवाल पर अहम टिप्पणी की है.
मामला एक ऐसे दंपती का था, जिनके बीच संतान न होने को लेकर विवाद चल रहा था. पत्नी ने आरोप लगाया कि पति और उसके परिवार ने उसे बांझ कहकर अपमानित किया और उसके साथ क्रूरता की. इसके अलावा दहेज मांगने और मारपीट के भी आरोप लगाए गए.
क्या कहा कोर्ट ने
मामला अदालत पहुंचा तो हाईकोर्ट ने शिकायत में लगाए गए आरोपों को कानूनी कसौटी पर परखा. अदालत ने माना कि किसी महिला को ‘बांझ’ कहना निश्चित तौर पर असंवेदनशील और निंदनीय है. लेकिन कोर्ट ने यह भी पाया कि इस मामले में पति-पत्नी के बीच अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल दोनों तरफ से हुआ था. पत्नी के द्वारा भी पति को नपुंसक कहे जाने की बात रिकॉर्ड में थी.
अदालत के मुताबिक, बच्चे को लेकर चल रहा वैवाहिक विवाद धीरे-धीरे आरोप-प्रत्यारोप और गाली-गलौज में बदल गया. ऐसे में सिर्फ एक-दूसरे को अपमानित करने वाले शब्दों के आधार पर धारा 498-A के तहत क्रूरता का अपराध तय नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने यह भी देखा कि शिकायत में दहेज मांगने का कोई ठोस विवरण नहीं था. मारपीट के आरोप के समर्थन में भी मेडिकल साक्ष्य नहीं मिला.
धारा 498-A वैवाहिक असहमति को अपराध नहीं बनाता
हाईकोर्ट ने साफ किया कि धारा 498-A हर वैवाहिक असहमति को अपराध बनाने के लिए नहीं है. किसी मामले में क्रूरता साबित करने के लिए यह दिखना जरूरी है कि महिला को गंभीर शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाने वाली परिस्थितियां पैदा की गईं या उसे आत्महत्या जैसे कदम के लिए मजबूर करने की स्थिति बनाई गई.
यानी अदालत ने सीधे कहा कि वैवाहिक रिश्ते में हर कड़वी बात कानून की नजर में अपराध नहीं बन जाती. हालांकि, इसका मतलब यह भी नहीं है कि महिला को बांझ कहना सही ठहराया गया है. कोर्ट ने इस शब्द को साफ तौर पर असंवेदनशील और निंदनीय माना, लेकिन इस खास मामले के तथ्यों में इसे धारा 498-A की कानूनी कसौटी पर पर्याप्त नहीं पाया. अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया.

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