विजय उरांव
भारत को दुनिया के बड़े और तेजी से बढ़ते बाजारों में गिना जाता है. सरकार विदेशी निवेश बढ़ाने और कारोबार के लिए माहौल बेहतर बनाने पर लगातार जोर देती रही है. इसके बावजूद संसद में सामने आए आंकड़े विदेशी कंपनियों के भारत में कारोबार की एक अलग तस्वीर दिखाते हैं.
पिछले पांच वित्तीय वर्षों में 1,605 विदेशी कंपनियों और विदेशी होल्डिंग वाली भारतीय कंपनियों ने भारत में अपना कारोबार बंद किया. केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने 3 अगस्त 2026 को लोकसभा में यह जानकारी दी.
इनमें 382 विदेशी कंपनियां और 1,223 विदेशी होल्डिंग वाली भारतीय कंपनियां शामिल हैं. यानी कारोबार समेटने वाली कंपनियों में बड़ा हिस्सा उन भारतीय कंपनियों का है, जिनमें विदेशी पूंजी या विदेशी मालिकाना हक जुड़ा हुआ था.
पांच साल में 1,605 कंपनियां बाहर
संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2021-22 में 404 कंपनियों ने कारोबार बंद किया. इसके बाद 2022-23 में यह संख्या घटकर 197 हुई, लेकिन अगले वर्षों में फिर बढ़ती गई.
- 2021-22: 404
- 2022-23: 197
- 2023-24: 310
- 2024-25: 316
- 2025-26: 378
खास बात यह है कि 2025-26 में 378 कंपनियों ने कारोबार समेटा, जो पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 62 अधिक है. यानी हालिया आंकड़ों में बाहर निकलने की रफ्तार फिर बढ़ती दिखाई दे रही है.

क्या इसे भारत से विदेशी निवेश की वापसी मानें?
सिर्फ कंपनियों के कारोबार बंद करने के आंकड़े से यह कहना मुश्किल है कि विदेशी निवेशकों का भारत से मोहभंग हो रहा है. किसी बाजार से बाहर निकलना कई बार कंपनी की वैश्विक रणनीति का हिस्सा भी होता है. कंपनियां कमजोर मुनाफे वाले कारोबार को बंद कर सकती हैं, अपनी वैश्विक प्राथमिकताएं बदल सकती हैं या किसी खास बिजनेस वर्टिकल से निकलकर दूसरे बाजारों में पूंजी लगा सकती हैं. भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा और मार्जिन का दबाव भी कंपनियों के कारोबारी फैसलों को प्रभावित कर सकता है. यानी कंपनी का भारत से निकलना और विदेशी निवेश का भारत से निकलना—दोनों एक ही बात नहीं हैं.
तस्वीर का दूसरा पहलू भी मजबूत
अगर सिर्फ बंद हुई कंपनियों पर नजर डालेंगे तो तस्वीर चिंताजनक लग सकती है. लेकिन भारत में सक्रिय विदेशी कारोबार का आंकड़ा एक अलग कहानी बताता है. 30 जुलाई 2026 तक देश में 3,313 विदेशी कंपनियां सक्रिय थीं. इसके अलावा 19,881 भारतीय कंपनियों में विदेशी होल्डिंग थी. दोनों को मिलाकर ऐसी कंपनियों की संख्या 23,194 रही, जिनमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी कारोबारी हिस्सेदारी मौजूद है.
यानी पिछले पांच साल में 1,605 कंपनियों के कारोबार समेटने के बावजूद भारत विदेशी कंपनियों के लिए बड़ा बाजार बना हुआ है.

सबसे बड़ा डेटा गैप—कितनी नौकरियां गईं?
इस पूरे आंकड़े का सबसे अहम पहलू रोजगार से जुड़ा है. कंपनियां बंद हुईं, लेकिन इसका असर कितने कर्मचारियों पर पड़ा, इसकी स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आती. सरकार ने लोकसभा में बताया कि इन कंपनियों में काम करने वाले भारतीय नागरिकों की संख्या का केंद्रीय स्तर पर कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.
यानी संसद के पास कंपनियों के बंद होने का हिसाब है, लेकिन उन कंपनियों के बंद होने से कितने लोगों की नौकरी प्रभावित हुई, इसका आंकड़ा नहीं है. कारोबार के असर को समझने के लिहाज से यही सबसे बड़ा खाली हिस्सा है.
असली तस्वीर क्या कहती है?
1,605 कंपनियों का कारोबार बंद होना नजरअंदाज करने वाला आंकड़ा नहीं है, खासकर तब जब 2025-26 में संख्या फिर बढ़ी है. लेकिन इसे सीधे भारत से विदेशी पूंजी के पलायन के तौर पर देखना भी सही नहीं होगा. एक तरफ कुछ कंपनियां भारतीय बाजार से बाहर निकल रही हैं, तो दूसरी तरफ हजारों विदेशी कंपनियां और विदेशी हिस्सेदारी वाली भारतीय कंपनियां यहां कारोबार कर रही हैं. इसलिए संसद के आंकड़े फिलहाल भारत में विदेशी कारोबार के खत्म होने से ज्यादा उसके बदलते स्वरूप की कहानी बताते हैं—जहां कुछ कंपनियां बाजार छोड़ रही हैं, कुछ अपनी रणनीति बदल रही हैं और बड़ी संख्या में कंपनियां अब भी भारत की कारोबारी संभावनाओं पर दांव लगा रही हैं.
(LOK SABHA: STARRED QUESTION NO. *216 ANSWERED ON MONDAY, AUGUST 3, 2026)

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