दुनिया की टेक्नोलॉजी और डिफेंस इंडस्ट्री में अब सिर्फ तेल और गैस ही रणनीतिक ताकत नहीं हैं. कुछ ऐसे खनिज भी हैं, जिनके बिना इलेक्ट्रिक वाहन, स्मार्टफोन, विंड टर्बाइन और एडवांस डिफेंस सिस्टम की कल्पना मुश्किल है. इन्हें Rare Earth Elements (REE) कहा जाता है.
इन खनिजों की सप्लाई चेन पर चीन का दबदबा है. चीन की ओर से REE और उनसे जुड़े उत्पादों के निर्यात पर नियंत्रण कड़ा किए जाने के बाद दुनिया को इसकी अहमियत और ज्यादा समझ आई है. ऐसे में भारत के सामने चुनौती सिर्फ REE के भंडार खोजने की नहीं, बल्कि खदान से लेकर हाईटेक मैग्नेट तक पूरी वैल्यू चेन खड़ी करने की है.
संसद में उठा पुरुलिया के REE ब्लॉकों का सवाल
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया से सांसद ज्योतिर्मय सिंह महतो ने लोकसभा में सवाल उठाया कि जिले के Belma-Malthor, Chirugora, Mednitar और Purdaha ब्लॉकों में REE की खोज कहां तक पहुंची है और इनकी नीलामी कब होगी. सरकार के मुताबिक, Belma-Malthor ब्लॉक में G2 स्तर की खोज पूरी हो चुकी है. यहां 50 लाइन किलोमीटर का जियोफिजिकल सर्वे, 2,001.95 मीटर ड्रिलिंग और 2,400 कोर सैंपल लिए गए. हालांकि, अभी तक कोई बड़ा व्यावसायिक REE संसाधन साबित नहीं हुआ है. वहीं Chirugora, Mednitar और Purdaha ब्लॉकों को G3 से G2 स्तर पर लाया गया है. इन इलाकों में भी REE के ठोस और व्यावसायिक संसाधन स्थापित होना अभी बाकी है.
G3 से G1 तक क्यों अहम है यह सफर?
REE की खोज एक दिन में खदान तक नहीं पहुंचती. इसके कई चरण होते हैं.
G3 में खनिज होने की शुरुआती संभावना तलाशी जाती है.
G2 में सर्वे, ड्रिलिंग और सैंपलिंग से मात्रा और गुणवत्ता का अनुमान मजबूत किया जाता है.
G1 में विस्तृत जांच के जरिए खनिज की मात्रा और ग्रेड को ज्यादा सटीक तरीके से तय किया जाता है.
यानी सिर्फ जमीन के नीचे REE मिलने से ब्लॉक की नीलामी नहीं हो सकती. पहले यह साबित करना जरूरी है कि वहां पर्याप्त मात्रा में व्यावसायिक रूप से उपयोगी खनिज मौजूद है.
भारत के पास भंडार, लेकिन असली कमजोरी प्रोसेसिंग में
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, भारत के पास करीब 767 मिलियन टन REE ore resources का अनुमान है. लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है—क्या भारत इन संसाधनों को हाई-वैल्यू प्रोडक्ट में बदल सकता है? यही वह जगह है जहां चीन भारत से काफी आगे है.
REE को निकालने के बाद उसे अलग करना, रिफाइन करना, मेटल और अलॉय बनाना और आखिर में NdFeB जैसे हाई-परफॉर्मेंस परमानेंट मैग्नेट तैयार करना पड़ता है. भारत की क्षमता माइनिंग और सेपरेशन तक मौजूद है, लेकिन रिफाइनिंग, मेटल-अलॉय और खासकर एडवांस मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग में बड़ा गैप है. यही वजह है कि भारत अपनी Sintered NdFeB magnets की जरूरत के लिए आयात पर निर्भर है.
2030 तक मांग 8,220 MTPA, क्षमता का लक्ष्य 6,000 MTPA
सरकार के अनुमान के मुताबिक 2030 तक भारत में RE permanent magnets की मांग करीब 8,220 MTPA पहुंच सकती है.
इसमें:
- EV सेक्टर: 3,250 MTPA
- विंड एनर्जी: 1,800 MTPA
- इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस: 3,170 MTPAइस बढ़ती जरूरत को देखते हुए केंद्र ने ₹7,280 करोड़ की योजना शुरू की है. इसका लक्ष्य देश में करीब 6,000 MTPA की इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्षमता तैयार करना है. लेकिन यहां भी चुनौती साफ है, अगर 2030 में मांग 8,220 MTPA तक पहुंचती है और घरेलू क्षमता 6,000 MTPA रहती है, तो करीब 2,220 MTPA का गैप बचता है. सिर्फ सरकारी योजना और खनिज भंडार से आत्मनिर्भरता हासिल नहीं होगी. इसके लिए बड़े निवेश और निजी कंपनियों की भागीदारी भी जरूरी है.
इसका एक उदाहरण पश्चिम बंगाल का Kalapathar-Raghudih REE block है, जिसकी Tranche VI नीलामी में एक भी बोली नहीं मिली. इसके बाद सरकार निवेशकों को आकर्षित करने के लिए रोडशो और आउटरीच कार्यक्रमों पर जोर दे रही है.

असली लड़ाई जमीन के नीचे नहीं, वैल्यू चेन में है
भारत के पास REE संसाधन हैं और खोज का काम भी आगे बढ़ रहा है. लेकिन असली मुकाबला सिर्फ यह साबित करने का नहीं है कि “खनिज हमारे पास है.” मुकाबला यह है कि क्या भारत खनन से लेकर सेपरेशन, रिफाइनिंग, मेटल-अलॉय और हाई-परफॉर्मेंस मैग्नेट तक पूरी वैल्यू चेन अपने देश में खड़ी कर सकता है. क्योंकि REE की दुनिया में ताकत सिर्फ उस देश के पास नहीं होती, जिसके पास खदान है. असली ताकत उस देश के पास होती है, जो उस खनिज को टेक्नोलॉजी की ताकत में बदल सकता है. चीन के पास फिलहाल यही बढ़त है और भारत अब उसी बढ़त को चुनौती देने की तैयारी में है.
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