खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर झारखंड सरकार ने केंद्र के सामने अपनी आपत्ति के बाद अब राष्ट्रपति के समक्ष मामला रखा है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर विधेयक के संवैधानिक, संघीय, वित्तीय और सामाजिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार करने का अनुरोध किया है. उन्होंने संविधान के तहत उपलब्ध सभी विकल्पों पर यथोचित विचार करने की अपील की है.
हेमंत सोरेन ने पत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के 2015 से 2021 तक झारखंड के राज्यपाल के कार्यकाल का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि इस दौरान उन्होंने राज्य के आदिवासी और खनन प्रभावित क्षेत्रों को करीब से देखा और यहां के लोगों के संघर्ष, आकांक्षाओं और परिस्थितियों को समझा. सोरेन ने कहा कि झारखंड के लोग उन्हें ऐसे व्यक्तित्व के रूप में देखते हैं, जिनका राज्य से गहरा जुड़ाव रहा है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बनाया आधार
मुख्यमंत्री ने कहा कि संशोधन के तहत MMDR Act में प्रस्तावित धारा 9D से राज्यों की खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर, उपकर या अन्य लेवी लगाने की शक्ति सीमित हो सकती है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India Ltd. मामले के फैसले का हवाला दिया. सोरेन के मुताबिक, शीर्ष अदालत ने राज्य सूची की प्रविष्टि 49 के तहत राज्यों के खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने के अधिकार को मान्यता दी थी.
सेस से 2026-27 में ₹13,215 करोड़ की उम्मीद
पत्र में मुख्यमंत्री ने खनिज क्षेत्र से मिलने वाले राजस्व को झारखंड की वित्तीय क्षमता के लिए महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि 2024-25 में राज्य के अपने गैर-कर राजस्व का करीब 84.9 प्रतिशत हिस्सा खनन क्षेत्र से आया. झारखंड मिनरल बेयरिंग लैंड सेस से 2024-25 में ₹1,379 करोड़ और 2025-26 में ₹7,488 करोड़ मिले. मौजूदा प्रवृत्ति के आधार पर 2026-27 में करीब ₹13,215 करोड़ की प्राप्ति का अनुमान है.
संघीय ढांचे और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता का सवाल
हेमंत सोरेन ने कहा कि झारखंड ने खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और ग्रामीण आधारभूत संरचना के लिए संसाधन जुटाने के उद्देश्य से सेस कानून बनाया है. उन्होंने कहा कि खनिज संपदा से होने वाले आर्थिक लाभ में उन क्षेत्रों और समुदायों का उचित हिस्सा होना चाहिए, जिन्होंने खनन की सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत चुकाई है. मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति से विधेयक के प्रभावों पर विचार कर खनिज उत्पादक राज्यों, आदिवासी समुदायों और खनन प्रभावित क्षेत्रों के हितों को ध्यान में रखने का आग्रह किया.
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