Johar Live Desk : रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) और भारत सरकार के बीच KG-D6 गैस ब्लॉक को लेकर चल रहा 247 मिलियन डॉलर का विवाद 2026 में सुलझ सकता है। यह मामला फिलहाल अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के अंतिम चरण में है। RIL 2002 से KG-D6 ब्लॉक की ऑपरेटर है। उत्पादन साझेदारी अनुबंध (PSC) के तहत गठित मैनेजमेंट कमेटी में सरकार के दो प्रतिनिधि शामिल हैं, जिनके पास हर फैसले पर वीटो अधिकार है। कमेटी की स्वीकृति के बिना कोई खर्च या निर्णय लागू नहीं होता। RIL के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम ने सभी प्रक्रियाओं का पालन किया है, जबकि कुछ खर्चों को सरकार ने अमान्य ठहराया, जिसे अनुबंध की भावना के विपरीत माना जा रहा है।
मामले का मुख्य मुद्दा लागत वसूली (Cost Recovery) है। सरकार का दावा है कि RIL के कुछ खर्च लागत वसूली के दायरे में नहीं आते और इसलिए अतिरिक्त प्रॉफिट पेट्रोलियम की मांग की गई। वहीं, NELP नीति के तहत ऑपरेटर पहले अपनी पूरी लागत वसूल करता है, उसके बाद ही सरकार को लाभ में हिस्सा मिलता है।
KG-D6 ब्लॉक भारत का पहला डीपवॉटर उत्पादन ब्लॉक है, जिसे RIL ने रिकॉर्ड समय में विकसित किया। हालांकि बाद में भू-वैज्ञानिक कारणों से उत्पादन घटा, जिससे कंपनी को नुकसान हुआ। परियोजना में सरकार का कोई प्रत्यक्ष निवेश नहीं है, जबकि व्यावसायिक जोखिम मुख्य रूप से ऑपरेटर ने उठाया। इसके बावजूद सरकार को पर्याप्त प्रॉफिट पेट्रोलियम मिला है और सस्ती गैस की बिक्री से सब्सिडी व्यय भी कम हुआ।
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का फैसला न केवल इस विवाद के समाधान के लिए, बल्कि भविष्य में भारत में ऊर्जा क्षेत्र में निजी निवेशकों के भरोसे के लिए भी अहम होगा।
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