New Delhi : पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को बेहद सख्त लहजे में फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने मालदा जिले में सात न्यायिक अधिकारियों को नौ घंटे तक घेराव में रखे जाने की घटना पर नाराजगी जताते हुए इसे न केवल राज्य की प्रशासनिक विफलता, बल्कि लोकतंत्र और न्यायपालिका के अधिकार को चुनौती देने वाला कृत्य करार दिया है।
यह घटना पश्चिम बंगाल में चल रहे मतदाता सूची संशोधन (SIR) के कार्य के दौरान हुई, जब मालदा में ड्यूटी पर तैनात सात न्यायिक अधिकारियों को विरोध प्रदर्शनकारियों ने घेर लिया था। प्रदर्शनकारियों ने न केवल उनकी गाड़ियों पर पथराव किया और डंडों से हमला किया, बल्कि उन्हें करीब नौ घंटे तक बंधक बनाए रखा। इस दौरान राज्य प्रशासन की भूमिका पूरी तरह से निष्क्रिय रही, जिसने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यह घटना ‘पूर्व-निर्धारित और गणना किया गया कृत्य’ है, जिसका उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों के मनोबल को तोड़ना और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करना था। न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने राज्य सरकार की कानून-व्यवस्था व्यवस्था को टूटा हुआ करार देते हुए गृह सचिव और डीजीपी से सवाल किया कि आखिर उनकी निष्क्रियता के लिए उन पर कार्रवाई क्यों न की जाए।
सीजेआई ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे स्वयं रात 2 बजे तक स्थिति की मॉनिटरिंग कर रहे थे और कोर्ट अच्छी तरह जानता है कि उपद्रवी कौन हैं। कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि इसकी जांच NIA या CBI जैसी केंद्रीय एजेंसियों से कराई जाए। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि चुनावी प्रक्रिया और न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से किसी भी स्तर पर समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हालांकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे भाजपा की साजिश बताया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल को सबसे ज्यादा ध्रुवीकृत राज्य बताते हुए राज्य सरकार की जिम्मेदारी पर कड़े सवाल खड़े किए हैं।
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