New Delhi : सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के हमलों के मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि यदि किसी हमले में किसी व्यक्ति की चोट या मौत होती है, तो नगर निकायों के साथ-साथ डॉग फीडर्स की जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उसकी पिछली टिप्पणियों को मजाक समझना गलत होगा, अदालत इस विषय को लेकर पूरी तरह गंभीर है।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में स्थानीय प्रशासन की विफलता सामने आई है और अदालत जिम्मेदारी तय करने से पीछे नहीं हटेगी। पीठ ने संकेत दिया कि इस मामले में निजी पक्षों की दलीलें पूरी करने के बाद राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी सुनवाई का अवसर दिया जाएगा।
28 जनवरी को अगली सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी को दोपहर 2 बजे होगी। उस दिन अदालत एमिकस क्यूरी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के वकील और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की दलीलें सुनेगी। एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने बताया कि अभी सात राज्यों से जानकारी आना बाकी है।
कोर्ट में तीखी बहस, अलग-अलग पक्षों की दलीलें
सुनवाई के दौरान पीड़ितों की ओर से एडवोकेट हर्ष जैदका, डॉग लवर्स और एनजीओ की ओर से एडवोकेट प्रशांत भूषण तथा मेनका गांधी की ओर से सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने अपनी दलीलें रखीं।
पीड़ित पक्ष की ओर से कहा गया कि आवारा कुत्तों के हमलों से बच्चों और आम नागरिकों की जान खतरे में है और प्रशासन समय रहते प्रभावी कदम उठाने में नाकाम रहा है। कुछ वकीलों ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के उल्लंघन से जोड़ा और कहा कि यदि आवारा कुत्तों के कारण किसी की मौत होती है, तो राज्य सरकार मुआवजे की जिम्मेदार होगी।
वहीं, डॉग लवर्स और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से कहा गया कि संविधान सभी जीवों के प्रति करुणा रखने का निर्देश देता है। उनका तर्क था कि समस्या का समाधान कुत्तों को मारना नहीं, बल्कि प्रभावी नसबंदी, टीकाकरण और कचरा प्रबंधन है। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया भर में नसबंदी कार्यक्रमों से आवारा कुत्तों की संख्या और आक्रामकता कम हुई है।
रेबीज और इलाज पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान रेबीज के इलाज और रोकथाम को लेकर भी बहस हुई। कुछ वकीलों ने कहा कि रेबीज 100 प्रतिशत रोकी जा सकने वाली बीमारी है, लेकिन भारत में प्रभावी रोकथाम नीति का अभाव है। अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं और समय पर इलाज न मिलने के आरोप भी लगाए गए।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस मेहता ने कुछ मामलों में हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट किया कि अदालत किसी विशेष मौत के कारणों पर टिप्पणी की अनुमति नहीं देगी। वहीं, जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि अदालत की टिप्पणियां व्यंग्य नहीं थीं और उन्हें हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
पीठ ने दोहराया कि पिछली सुनवाई में यह संकेत दिया गया था कि आवारा कुत्तों के हमलों में नगर निकायों के साथ-साथ डॉग फीडर्स की भी जिम्मेदारी तय हो सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह इस मुद्दे पर संतुलन और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत के साथ आगे बढ़ना चाहती है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें लगभग पूरी कर ली हैं और 28 जनवरी को होने वाली सुनवाई में राज्यों और संबंधित संस्थाओं से ठोस जवाब और समाधान की उम्मीद जताई है।
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