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    Home»जोहार ब्रेकिंग»सुदिव्य सोनू का विश्वविद्यालय विधेयक: झारखंड की सियासत में क्यों मची थी हलचल?
    जोहार ब्रेकिंग

    सुदिव्य सोनू का विश्वविद्यालय विधेयक: झारखंड की सियासत में क्यों मची थी हलचल?

    Kanika RanaBy Kanika RanaSeptember 6, 2026No Comments5 Mins Read7
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    कनिका राणा, जोहार लाइव

    झारखंड की राजनीति में पिछले करीब एक साल से अगर किसी मुद्दे ने शिक्षा से ज्यादा सत्ता और अधिकार की लड़ाई को चर्चा में रखा, तो वह था उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का विश्वविद्यालय विधेयक.

    मामला सिर्फ विश्वविद्यालयों में सुधार का नहीं था. असली सवाल यह था कि राज्य के विश्वविद्यालयों की कमान आखिर किसके हाथ में होगी, राजभवन के पास या फिर राज्य सरकार के पास.

    इसी सवाल को लेकर शुरू हुई लड़ाई करीब आठ महीने तक चली. विपक्ष सड़कों और सदन में विरोध करता रहा, छात्र संगठन सवाल उठाते रहे, राजभवन ने बिल वापस कर दिया और आखिरकार संशोधन के बाद अप्रैल 2026 में यह कानून बन गया.

    आखिर विश्वविद्यालय बिल में क्या था?

    सीधी भाषा में समझें तो सरकार एक ऐसा कॉमन कानून लाना चाहती थी, जिससे विश्वविद्यालयों के प्रशासन, नियुक्ति और वित्तीय व्यवस्था के लिए एक समान सिस्टम तैयार हो. सबसे बड़ा बदलाव कुलपति, प्रति-कुलपति और दूसरे अहम पदों की नियुक्ति में राज्य सरकार की भूमिका बढ़ाना था. कुलपति और प्रति-कुलपति का कार्यकाल पांच साल और अधिकतम उम्र सीमा 70 साल रखने का भी प्रावधान था. शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्ति व प्रोन्नति में भी सरकार की भूमिका बढ़ाई गई.

    यही बात विपक्ष और छात्र संगठनों को सबसे ज्यादा खटकी. उनका आरोप था कि सरकार इसके जरिए विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता कम कर रही है. वहीं सरकार का कहना था कि इससे जवाबदेही तय होगी और विश्वविद्यालयों का कामकाज ज्यादा तेजी से होगा.

    22 मई 2025: कैबिनेट से मिली पहली मंजूरी

    कहानी की शुरुआत 22 मई 2025 से हुई. झारखंड कैबिनेट ने विश्वविद्यालयों से जुड़े नए कानून के प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी.
    तय किया गया कि कुलपति और प्रति-कुलपति की नियुक्ति पांच साल के तय कार्यकाल के लिए होगी और इन पदों के लिए अधिकतम उम्र सीमा 70 साल रखी जाएगी.

    इसके बाद उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग ने नए कानून का ड्राफ्ट तैयार करने के दौरान महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों के कानूनों का भी अध्ययन किया. सरकार का कहना था कि झारखंड के लिए एक ऐसा मॉडल एक्ट तैयार किया जाए, जिससे उच्च शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता आए और कामकाज ज्यादा पारदर्शी हो.

    26 अगस्त 2025: विधानसभा से पास हुआ बिल

    मानसून सत्र के तीसरे दिन यानी 26 अगस्त 2025 को मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक, 2025 विधानसभा में पेश किया. बिल ध्वनिमत से पास हो गया. लेकिन यहीं से विवाद भी तेज हो गया. क्योंकि इस कानून में विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव का प्रस्ताव था.

    28 अगस्त: विधानसभा में हंगामा

    बिल पास होने के सिर्फ दो दिन बाद ही विधानसभा में इस मुद्दे पर जमकर हंगामा हुआ. हटिया से भाजपा विधायक नवीन जायसवाल ने आरोप लगाया कि सरकार इस कानून के जरिए शिक्षा व्यवस्था का राजनीतिकरण करना चाहती है.

    विरोध इतना बढ़ा कि विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो को प्रश्नकाल की कार्यवाही तक स्थगित करनी पड़ी. उधर मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने
    सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि विपक्ष छात्रसंघ चुनाव और छात्रों के अधिकारों को लेकर भ्रम फैला रहा है.
    उनका कहना था कि नए कानून में छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों में कोई कटौती नहीं की गई है.

    छात्र संगठन भी उतरे विरोध में

    विधानसभा से बिल पास होने के बाद विरोध सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं रहा. कई छात्र संगठनों ने भी इस विधेयक पर सवाल उठाने शुरू कर दिए.
    सरकार और मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू को सार्वजनिक रूप से सफाई देनी पड़ी कि कानून का मकसद छात्र राजनीति या छात्रसंघ चुनाव पर रोक लगाना नहीं है. इधर आजसू पार्टी भी इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ खुलकर सामने आ गई.

    आजसू प्रमुख और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो ने विधेयक को जनविरोधी और असंवैधानिक बताया. उन्होंने आरोप लगाया कि झामुमो-कांग्रेस सरकार विश्वविद्यालयों में राजनीतिक दखल बढ़ाने की तैयारी कर रही है.

    दिसंबर 2025: राजभवन ने लगा दिया ब्रेक

    लेकिन सरकार के लिए सबसे बड़ा झटका दिसंबर 2025 में आया. शीतकालीन सत्र शुरू होने से ठीक पहले, 4 और 5 दिसंबर के बीच राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक, 2025 को गंभीर आपत्तियों के साथ राज्य सरकार को वापस भेज दिया.
    साथ ही झारखंड कोचिंग सेंटर नियंत्रण एवं विनियमन विधेयक, 2025 भी वापस कर दिया गया.

    राजभवन का कहना था कि विधेयक को लेकर राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों ने कई आपत्तियां दर्ज कराई हैं और उनका समाधान किए बिना इसे मंजूरी नहीं दी जा सकती. यानी विधानसभा से बिल पास होने के बावजूद मामला वहीं अटक गया.

    करीब पांच महीने बाद फिर विधानसभा पहुंचा बिल

    इसके बाद सरकार ने विधेयक में जरूरी बदलाव किए. करीब पांच महीने की खींचतान के बाद संशोधित कानून दोबारा विधानसभा में लाया गया और पारित कराया गया. इस बार मामला आगे बढ़ा और राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी. 28 अप्रैल 2026 को इसे झारखंड राजपत्र के असाधारण अंक में झारखंड अधिनियम संख्या 5, 2026 के रूप में प्रकाशित कर दिया गया.

    पुराने कानूनों की जगह नया कानून

    नया कानून पुराने झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 2000 की जगह आया. इसके साथ ही झारखंड रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय अधिनियम, 2016, झारखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय अधिनियम, 2015 और पंडित रघुनाथ मुर्मू जनजातीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2022 को भी एक व्यापक कानूनी ढांचे में शामिल किया गया.
    सरकार को उम्मीद है कि इससे विश्वविद्यालयों में नियुक्ति प्रक्रिया, वित्तीय प्रबंधन और अकादमिक व्यवस्था ज्यादा व्यवस्थित होगी.

    अब आगे क्या?

    22 मई 2025 की कैबिनेट मंजूरी से लेकर 28 अप्रैल 2026 की गजट अधिसूचना तक, करीब एक साल की इस पूरी प्रक्रिया में सुदिव्य कुमार सोनू का विश्वविद्यालय विधेयक झारखंड की शिक्षा और राजनीति का बड़ा मुद्दा बना रहा.

    एक तरफ सरकार ने इसे जवाबदेही और सुधार की दिशा में कदम बताया, तो दूसरी तरफ विपक्ष और छात्र संगठनों ने इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता में दखल बताया. आखिरकार संशोधन के बाद कानून तो बन गया, लेकिन अब नजर इस बात पर है कि नई व्यवस्था जमीन पर कितना बदलाव लाती है.

    Also Read:सोनू भैया, आपका जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति : हेमंत सोरेन

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