Ranchi: झारखंड के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार की डीजीपी नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। मरांडी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला देकर डीजीपी नियुक्ति नियमावली में संशोधन किया और तर्क दिया कि राज्य में अनुभवी पुलिस प्रमुख की नियुक्ति अनिवार्य है।
मरांडी ने कहा कि झारखंड कैडर के डीजी रैंक के तीन वरिष्ठ अधिकारी — अनिल पालटा, प्रशांत सिंह और एम.एस. भाटिया — केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर नहीं हैं और उनकी सेवा अवधि क्रमशः एक, दो और तीन वर्ष शेष है। इसके बावजूद, सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले इनके स्थान पर कनिष्ठ अधिकारी को डीजीपी नियुक्त किया गया।
नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि यह नियुक्ति प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ फैसले का उल्लंघन है, क्योंकि यूपीएससी के पैनल से चयन नहीं किया गया। साथ ही राज्य सरकार ने स्वयं बनाई गई डीजीपी नियुक्ति नियमावली के वरीयता क्रम का भी पालन नहीं किया।
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का हवाला देकर झारखंड में डीजीपी नियुक्ति नियमावली में संशोधन किया और तर्क दिया गया कि राज्य में अनुभवी पुलिस प्रमुख की नियुक्ति अनिवार्य है, लेकिन कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर होने के कारण डीजीपी पद पर चयन हेतु… pic.twitter.com/dkIQqooiPo
— Babulal Marandi (@yourBabulal) January 16, 2026
मरांडी ने कहा कि डीजीपी पूरे राज्य के पुलिस बल के मुखिया होते हैं और उनकी नियुक्ति में पक्षपात और नियमों की अवहेलना भ्रष्टाचार, ट्रांसफर-पोस्टिंग में लेन-देन, वसूली, रंगदारी और फर्जी मुकदमों जैसी घटनाओं को बढ़ावा देती है। उन्होंने अनुराग गुप्ता मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कानूनी प्रावधानों को ताक पर रखकर उनकी नियुक्ति कराई और भ्रष्टाचार जांच प्रभावित हुई, लेकिन अंततः अनुराग गुप्ता को रातोंरात हटाना पड़ा।
बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से अपील की है कि संवैधानिक प्रावधानों और कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सम्मान करें और डीजीपी नियुक्ति में हुए पक्षपात की समीक्षा कर अपनी गलती सुधारें।
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