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    Home»जोहार ब्रेकिंग»खबरें संसद की: तीन साल में 1 लाख फुटबॉल मैदान जितनी वन भूमि साफ, झारखंड में 6,199 हेक्टेयर का डायवर्जन
    जोहार ब्रेकिंग

    खबरें संसद की: तीन साल में 1 लाख फुटबॉल मैदान जितनी वन भूमि साफ, झारखंड में 6,199 हेक्टेयर का डायवर्जन

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkAugust 19, 2026Updated:August 19, 2026No Comments3 Mins Read0
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    विजय उरांव
    देश में विकास परियोजनाओं के नाम पर जंगलों की बलि दी जा रही है. संसद में सामने आए ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन सालों और मौजूदा वित्तीय वर्ष (6 अगस्त 2026 तक) में देशभर में 82,817.92 हेक्टेयर (लगभग 828 वर्ग किलोमीटर) वन भूमि को गैर-वन उपयोग के लिए मंजूरी दी गई है. यह क्षेत्रफल आकार में लगभग 1 लाख फुटबॉल मैदानों के बराबर बैठता है.

    केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा राज्यसभा में सांसद आई.एस. इनबादुरई के सवाल पर दिए गए जवाब से साफ हुआ है कि वनों की कटाई और उनके व्यावसायिक इस्तेमाल के मामले में झारखंड देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है.

    वन भूमि डायवर्जन में मध्य प्रदेश सबसे आगे, झारखंड चौथे स्थान पर

    संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, जंगलों की जमीन को गैर-वन कामों के लिए देने के मामले में मध्य प्रदेश देश में सबसे ऊपर है, जहां सबसे ज्यादा 22,027.02 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को मंजूरी दी गई. इसके बाद दूसरे स्थान पर ओडिशा है, जहां 10,098.99 हेक्टेयर जमीन को मंजूरी मिली, जबकि 7,828.31 हेक्टेयर के साथ अरुणाचल प्रदेश तीसरे स्थान पर रहा.

    इस सूची में झारखंड चौथे स्थान पर है, जहां 6,199.41 हेक्टेयर (लगभग 62 वर्ग किलोमीटर) वन भूमि को वन  (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के तहत गैर-वन इस्तेमाल के लिए डायवर्ट किया गया है. झारखंड के बाद महाराष्ट्र पांचवें स्थान पर (5,282.18 हेक्टेयर), गुजरात छठे स्थान पर (4,964.12 हेक्टेयर) और छत्तीसगढ़ सातवें स्थान पर (4,274.12 हेक्टेयर) रहा.

    क्या है डायवर्जन और झारखंड पर इसका व्यावहारिक असर?

    तकनीकी भाषा में वन भूमि को खनन, सड़क, रेलवे, उद्योग या बिजली परियोजनाओं के लिए सौंपना ‘डायवर्जन’ कहलाता है. सरकार का कहना है कि मंजूरी का मतलब तुरंत सारे पेड़ कटना नहीं होता, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर किसी परियोजना को मंजूरी मिलने का अंतिम परिणाम घने जंगलों की कटाई और प्राकृतिक माहौल का खात्मा ही होता है.

    झारखंड के लिए यह 62 वर्ग किलोमीटर जमीन का नुकसान बेहद गंभीर है, क्योंकि यहां के आदिवासी और ग्रामीण समुदाय महुआ, तेंदूपत्ता, साल के पत्ते और औषधीय पौधों पर अपनी रोजमर्रा की आजीविका के लिए निर्भर हैं. जंगल घटने से न केवल उनकी आय प्रभावित होगी, बल्कि जलस्रोत सूखने, मिट्टी का कटाव बढ़ने और मानव-वन्यजीव संघर्ष तेज होने की आशंका है.

    पौधे लगाना बनाम प्राकृतिक जंगल का नुकसान

    सरकार का दावा है कि India State of Forest Report 2023 के अनुसार देश में फॉरेस्ट कवर में 156.41 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई है और कुल वन आवरण 21.76 प्रतिशत तक पहुंच गया है.

    हालांकि, पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि नए पौधे लगाना या कमर्शियल प्लांटेशन करना कभी भी सदियों पुराने प्राकृतिक जंगलों और उनकी जैव-विविधता का स्थान नहीं ले सकता. इसके अलावा, राज्यसभा के जवाब में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि झारखंड की 6,199 हेक्टेयर जमीन में से कितनी जमीन निजी कंपनियों के खनन और कितनी सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए दी गई है.

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