महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के नमक कानून को चुनौती देने के लिए दांडी मार्च किया था. करीब एक सदी बाद बिहार की शराबबंदी को देखकर आने वाले इतिहासकार शायद बहस करें कि शराब के साथ कथित तौर पर पकड़ी गई नेहा झा को बिहार के निषेध-युग की कहानी में एक फुटनोट मिलना चाहिए या नहीं.
गांधी का सवाल सीधा था. नमक जैसी रोजमर्रा की जरूरत की चीज पर सरकार का अधिकार कैसे हो सकता है? बिहार की शराबबंदी ने भी अपने तरीके से एक विचित्र सवाल पैदा किया है.
सरकार ने शराब को प्रतिबंधित कर दिया. समाज के एक हिस्से ने शायद जवाब दिया, “ठीक है, लेकिन माल मिलेगा कहां?”
और यहीं से कहानी शुरू होती है. कानून बनने के बाद शराब गायब नहीं हुई. वह बस दुकानों से गायब हुई. कीमत बढ़ गई, रास्ते बदल गए, सप्लाई चेन अधिक रचनात्मक हो गई और खरीदारों ने गोपनीयता सीख ली. अर्थशास्त्र की एक बुरी आदत है. वह सरकार के इरादों से ज्यादा मांग और आपूर्ति की भाषा समझता है.
किसी चीज की मांग कानून बनाने से समाप्त नहीं होती. वैध बाजार अवैध हो जाता है. लाइसेंसधारी दुकानदार गायब होते हैं और तस्कर पैदा होते हैं. सरकार का कर खत्म होता है और अपराधियों का मुनाफा बढ़ता है. लोग जरूरी नहीं कि शराब पीना छोड़ दें. वे सिर्फ यह नहीं जानते कि जो पी रहे हैं, वह कहां बनी है और उसमें क्या मिला है.
बिहार ने इस तरह एक अद्भुत प्रशासनिक प्रयोग किया है. शराब को लाइसेंसधारी दुकानों से हटाकर ऐसे लोगों के हाथों में पहुंचा दिया गया है, जिन्हें लाइसेंस की जरूरत ही नहीं पड़ती.
कल्पना कीजिए, अगर गांधी आज बिहार में होते. किसी ने उन्हें समझाया होता, “बापू, नमक प्रतिबंधित है. यह समाज के हित में है. कृपया दांडी की ओर न जाएं.” और फिर पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति आती: “एक संदिग्ध व्यक्ति को समुद्र तट की ओर भारी मात्रा में नमक के साथ पकड़ा गया है. जांच की जा रही है कि नमक कहां से आया और किस सिंडिकेट तक पहुंचाया जाना था.”
मामला सिर्फ शराब पीने या न पीने का नहीं है. शराब की लत, घरेलू हिंसा और अपराध वास्तविक समस्याएं हैं. सरकार का कर्तव्य है कि वह शराब की बिक्री को नियंत्रित करे और नशे की समस्या से लड़े. लेकिन नियंत्रण और पूर्ण प्रतिबंध में अंतर होता है. जब मांग बनी रहती है और आपूर्ति पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो बाजार खत्म नहीं होता. वह भूमिगत हो जाता है.
भूमिगत बाजार बिल नहीं देता. टैक्स नहीं देता. गुणवत्ता की गारंटी नहीं देता. लेकिन वह नेटवर्क बनाता है, जोखिम का मुनाफा देता है और कभी-कभी नेहा झा जैसी सुर्खियां पैदा करता है.
तो क्या नेहा झा बिहार की गांधी हैं? बिल्कुल नहीं. लेकिन उनका मामला एक सवाल जरूर खड़ा करता है. अगर सरकार को सालों तक ट्रेनों, सड़कों और सीमावर्ती इलाकों में बोतलें खोजनी पड़ रही हैं, तो सवाल केवल यह नहीं है कि शराब कौन ले जा रहा है.
सवाल यह है कि क्या बिहार की शराबबंदी अपनी ही सबसे बड़ी तस्करी बन चुकी है, जिसमें सरकार शराब को पकड़ती रहती है और शराब सरकार की नीति को?
गांधी ने सिखाया था कि कोई कानून सिर्फ कानून की किताब में लिखा होने से तार्किक नहीं हो जाता. बिहार शायद वही बात फिर सिखा रहा है. बस इस बार नमक की जगह बोतल है. और पैकिंग थोड़ी बेहतर है.
(शशि सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो कि दी स्टेट्समैन अखबार से जुड़े हुए हैं. यह उनके निजी विचार हैं. जोहार लाइव का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)
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