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    Home»झारखंड»1.91 करोड़ गबन मामले में विमल अग्रवाल और बेटे को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, FIR हुई रद्द
    झारखंड

    1.91 करोड़ गबन मामले में विमल अग्रवाल और बेटे को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, FIR हुई रद्द

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyJune 3, 2026No Comments3 Mins Read
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    झारखंड हाईकोर्ट
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    Jamshedpur : झारखंड हाईकोर्ट ने जमशेदपुर के व्यवसायी विमल कुमार अग्रवाल और उनके पुत्र प्रतीक अग्रवाल को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उनके खिलाफ सोनारी थाना में दर्ज प्राथमिकी और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद कर दिया है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। यह मामला करीब 1.91 करोड़ रुपये के कथित गबन से जुड़ा था, जिसमें दोनों पर निवेश के नाम पर पैसे लेने और वापस नहीं करने का आरोप लगाया गया था।

    क्या था पूरा मामला

    मामले की शुरुआत बिष्टुपुर स्थित शांति हरि आवासन निवासी शंकर लाल गुप्ता की शिकायत से हुई थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि मेसर्स श्री नरसिंग कंस्ट्रक्शन के संचालक विमल कुमार अग्रवाल ने वर्ष 2017 में उन्हें रेलवे प्रोजेक्ट में निवेश करने का प्रस्ताव दिया था। बताया गया था कि राउरकेला में करीब 15 करोड़ रुपये के रेलवे प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है, जिसमें 20 से 30 प्रतिशत तक मुनाफा होने की संभावना है। साथ ही निवेश के बदले होने वाले लाभ का 50 प्रतिशत हिस्सा देने का आश्वासन भी दिया गया था।

    कई किश्तों में दिए गए थे पैसे

    शिकायतकर्ता के अनुसार, 14 जनवरी 2017 को दोनों पक्षों के बीच एक एकरारनामा भी हुआ था। इसके बाद जनवरी से दिसंबर 2017 के बीच अलग-अलग किश्तों में करीब 1.62 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। आरोप है कि बाद में अतिरिक्त रेलवे प्रोजेक्ट मिलने और अधिक लाभ का हवाला देकर और रकम मांगी गई। इस तरह कुल मिलाकर लगभग 1.91 करोड़ रुपये निवेश के नाम पर लिए गए।

    निचली अदालत में क्या थी दलील

    अग्रवाल पिता-पुत्र की ओर से निचली अदालत में कहा गया था कि मामला करीब आठ साल पुराना है और शिकायतकर्ता को 1.73 करोड़ रुपये वापस भी किए जा चुके हैं। इसी आधार पर उन्हें जमानत मिली थी। इसके बाद दोनों की ओर से झारखंड हाईकोर्ट में क्रिमिनल मिस पिटीशन दायर कर प्राथमिकी को चुनौती दी गई।

    हाईकोर्ट ने क्यों रद की FIR

    सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले के सभी पहलुओं पर विचार किया। हाईकोर्ट ने पाया कि यह विवाद मुख्य रूप से लेन-देन और निवेश से जुड़ा है, जिसकी प्रकृति सिविल (दीवानी) है। अदालत की राय थी कि ऐसे मामलों का समाधान सिविल प्रक्रिया के तहत होना चाहिए और इसे आपराधिक विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने सोनारी थाना कांड संख्या 45/2025, जीआर संख्या 966/2025 और उससे संबंधित पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद कर दिया।

    कानूनी गलियारे में फैसले की चर्चा

    हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद कानूनी हलकों में इसकी चर्चा शुरू हो गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हर वित्तीय या कारोबारी विवाद को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता। यदि मामला मूल रूप से निवेश, अनुबंध या लेन-देन से जुड़ा है, तो उसका समाधान सिविल कानून के तहत किया जाना चाहिए।

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