मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से रिटायर होते वक्त जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह ने अपनी कमाई और शरीर, दोनों को समाज के नाम करने का संकल्प लिया. बीते 17 सितंबर को अपने विदाई समारोह में उन्होंने ऐलान किया कि रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली उनकी पूरी GPF राशि, करीब 1.01 करोड़ रुपये, PM CARES Fund में दान की जाएगी. उन्होंने कहा कि यह रकम राष्ट्र निर्माण के काम आएगी. हालांकि, यह फिलहाल दान किए जाने की घोषणा है. रकम मिलने के बाद उसे दान करने की बात कही गई है.
पत्नी के साथ देहदान का भी फैसला
जस्टिस सिंह ने इसी समारोह में एक और बड़ा फैसला साझा किया. उन्होंने बताया कि उन्होंने और उनकी पत्नी ने रिटायरमेंट से दो दिन पहले जबलपुर मेडिकल कॉलेज में देहदान के लिए पंजीयन कराया है. मृत्यु के बाद उनके शरीर का इस्तेमाल मेडिकल शिक्षा और वैज्ञानिक शोध के लिए किया जाएगा.
जस्टिस सिंह ने अपने फैसले को समाज को कुछ लौटाने की सोच से जोड़ा. उन्होंने कहा कि सिर्फ अपने लिए जीने के बजाय जीवन और उसके बाद भी समाज के काम आना चाहिए. उन्होंने यह भी बताया कि GPF दान करने और देहदान का विचार उनकी पत्नी की ओर से आया था.
36 साल से ज्यादा का न्यायिक सफर
जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह ने 31 मई 1990 को सिविल जज के तौर पर न्यायिक सेवा शुरू की थी. इसके बाद उन्होंने न्यायिक सेवा में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं. मई 2023 में उन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया. करीब तीन साल हाईकोर्ट में सेवा देने के बाद 17 सितंबर 2026 को वे रिटायर हो गए.
विदाई भाषण में जस्टिस सिंह ने अपने जीवन के संघर्षों और उन लोगों को भी याद किया, जिन्होंने उन्हें आगे बढ़ने में मदद की. उन्होंने बताया कि जब वह करीब छह महीने के थे, तभी उनकी मां का निधन हो गया था. इसके बाद उनका पालन-पोषण उनके मामा-मामी ने किया.
उन्होंने अपनी मौसी की दी हुई सीख को भी याद किया कि जिंदगी में सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता. मेहनत और ईमानदार प्रयास के बिना मिली सफलता ज्यादा देर नहीं टिकती.
जज को कलम पर किसी तरह का दबाव नहीं होना चाहिए
जस्टिस सिंह ने अपने शुरुआती न्यायिक करियर की एक सीख भी साझा की. उन्होंने बताया कि तत्कालीन जिला जज एनके जैन ने उन्हें सलाह दी थी कि अगर किसी मामले में जज की कलम पर किसी तरह का दबाव हो, चाहे वह किसी पक्ष के प्रति गुस्सा हो या लगाव, तो उसे उस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए.
रिटायरमेंट के मौके पर उनका भाषण सिर्फ न्यायिक सेवा की विदाई तक सीमित नहीं रहा. करीब 36 साल की सेवा के बाद उन्होंने अपनी GPF की पूरी रकम और मृत्यु के बाद अपना शरीर समाज के काम आने देने का संकल्प लिया.
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