रांची: आदिवासी समाज के अधिकारों, शिक्षा, जमीन और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले डॉ. कार्तिक उरांव का जीवन बहुआयामी था. गुमला जिले के लिटाटोली गांव में 29 अक्टूबर 1924 को जन्मे कार्तिक उरांव ने विपरीत परिस्थितियों से निकलकर उच्च शिक्षा हासिल की और देश के विकास में अहम योगदान दिया.
छोटानागपुर के आदिवासी बहुल इलाके में शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए. विदेश में तकनीकी क्षेत्र में कार्य करने के बाद वह 1961 में स्वदेश लौटे और रांची स्थित हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन (HEC) से जुड़े. निर्माण कार्यों से जुड़े पदों पर कार्य करते हुए वह डिप्टी चीफ इंजीनियर के पद तक पहुंचे. उनका जीवन यह साबित करता है कि तकनीकी दक्षता और शिक्षा सामाजिक भागीदारी के नए रास्ते खोल सकती है.
संसद से केंद्रीय मंत्रिमंडल तक राजनीतिक सफर
राजनीति में आने के बाद कार्तिक उरांव 1967, 1971 और 1980 में लोहरदगा लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए और केंद्र सरकार में मंत्री रहे. उन्होंने आदिवासी समाज की समस्याओं को राष्ट्रीय पटल पर रखा. उनके प्रयासों से ही पांचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-75) के दौरान ‘ट्राइबल सब-प्लान’ (आदिवासी उपयोजना) को अपनाया गया, जिसका उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और रोजगार के संसाधनों को सुनिश्चित करना था.
इसके अलावा, रांची में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना और 6 मार्च 1972 को पटना हाई कोर्ट की सर्किट बेंच (जो बाद में 1976 में स्थायी पीठ और 2000 में झारखंड हाई कोर्ट बनी) स्थापित कराने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. इससे क्षेत्र के लोगों की न्याय तक पहुंच सुगम हुई.
वैचारिक संघर्ष और ‘बीस बरस की काली रात’ और डिलिस्टिंग की बहस
अपनी पुस्तक ‘बीस बरस की काली रात’ में उन्होंने आदिवासी समाज की स्थिति, इतिहास और भविष्य की चुनौतियों पर खुलकर विचार रखे. वे आदिवासियों की विशिष्ट सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को बनाए रखने के प्रबल समर्थक थे.
कार्तिक उरांव की विरासत का एक अहम और चर्चा में रहने वाला पहलू धर्मांतरण तथा संवैधानिक आरक्षण से जुड़ा है. उन्होंने 1962 में लोहरदगा सीट से हार के बाद धर्मांतरित उम्मीदवारों के आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने को चुनौती दी थी. 1969 में संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष भी उन्होंने धर्मांतरित जनजातीय लोगों को एसटी श्रेणी से बाहर करने की सिफारिश से जुड़े प्रयास किए. हालांकि यह कानून नहीं बन सका, लेकिन आज भी ‘डीलिस्टिंग’ के समर्थक उनके इन ऐतिहासिक तर्कों को अपने पक्ष का आधार बनाते हैं, जबकि इसके विरोधी इसे धार्मिक आस्था और जनजातीय पहचान को अलग नजरिए से देखते हैं.
लोकसभा की प्रोसिडिंग की कॉपी के अंश जिसको लेकर आज भी बहस होती है
धर्म परिवर्तन के पश्चात् आदिम जातीय लोगों को विशेष सुविधाओं को समाप्त करना)
दिनांक 05-08-1979 मौखिक जवाब
ओम प्रकाश त्यागी – क्या विधि तथा समाज कल्याण मंत्री यह बताने की कृपा करेंगे कि
• क्या यह सच है कि श्री एस. राजगोपालन की चुनाव याचिका पर अपने निर्णय की घोषणा करते हुए उच्चतम न्यायलय ने यह मत व्यक्त किया था कि आदिम जाति के कोई भी व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद आदिम जाति के लोगों को मिलने वाली विशेष सुविधाओं का हकदार नहीं रहता है. क्योंकि धर्म परिवर्तन करने के बाद वह आदिम जाति का सदस्य नहीं रहता है.
• यदि हां, तो क्या उच्चतम न्यायलय के उपर्युक्त निर्णय के अनुसरण में आदिम जाति के उन लोगों को जिन्होने धर्म परिवर्तन किया है अब तक मिलने वाली विशेष सुविधाओं को समाप्त करने का सरकार का विचार है.
• यदि नहीं, तो इसके क्या कारण है.
समाज कल्याण विभाग व कानून मंत्रालय में उपमंत्री (श्री मुत्याल राव)– (क) प्रासंगिक निर्णय समर्थन करता प्रतीत नहीं होता है, जो माननीय सदस्य द्वारा अवलोकन किया गया है. (ख) और (ग) यह नहीं उठाया गया है.
ओम प्रकाश त्यागी – श्री राजगोपालन की चुनाव याचिका इसी आधार पर रद्द की गई थी कि उन्होने ईसाई धर्म अपना लिया था और हाईकोर्ट के जज ने अपना निर्णय देते हुए यह कहा था कि चूंकि उन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है और यह ट्राईब नहीं रह गए हैं, इसलिए उनकी याचिका रद्द की जाती है. अब गवर्नमेंट का यह कहना है कि यह यहां एराईज नहीं होता है. यह बात समझ में नहीं आयी है. धर्म परिवर्तन चूंकि उन्होंने कर लिया था. इस वास्ते वह ट्राईबल नहीं रह गए थे. ईसाई या मुसलमान या हिंदू कुछ भी हो गए थे. गवर्नमेंट से जो सहायता विशेष दी जाती है. शेड्यूल कास्ट और आदिम जाति के लोगों को और वह सहायता उन लोगों को भी जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है, दी जाती है. इस जजमेंट के प्रकाश में अवैधानिक हो जाती है. उस सहायता का कोई अर्थ नहीं बैठता है. वह नाजायज है और कोई भी उसके खिलाफ रिट दाखिल कर सकता है. मैं जानना चाहता हूं कि क्या गवर्नमेंट ने वह सहायता इस जजमेंट के प्रकाश में बंद कर दी है औऱ यदि नहीं की है तो आप अपने कानून में कोई परिवर्तन इस प्रकार से करने का इरादा रखते हैं कि जो धर्म परिवर्तन कर ले, उसको सहायता न मिले ताकि जजमेंट के अनुसार ठीक कार्य हो सके?
मुत्याल राव – दरअसल सवाल गलत तरीके से पूछा गया है. श्री राजगोपालन शेड्युल ट्राईब के नहीं हैं, शेड्युल कास्ट के हैं. आप जानते हैं कि शेड्युल कास्ट वालों के लिए और शेड्युल ट्राईब लोगों के लिए अलग-अलग सीट रिजर्व की गई है. इस केस में इनके इलेक्शन को इनके अपोनेंट ने चैलंज किया और सनिड जज ने इनके खिलाफ फैसला दे दिया. उनको सुविधाएं मिलती है, इनसे इनका कोई संबंध नहीं है. लेकिन आप जानते हैं कि शेड्यूल ट्राईब्स के लिए अलग-अलग इरादे बनाए गए हैं और माननीय सदस्य जानते हैं कि संविधान में इन दोनों को अलग-अलग सुविधाएं दी गई है. यह बात किसी के दिल दिमाग में रहनी चाहिए कि कोई भी आदमी जब अपना मत बदलता है तो वह शेड्युल कास्ट रह जाता है. लेकिन यह बात सिर्फ शेड्युल ट्राईब में लागू नहीं होती है. उन पर लागू नहीं होती है.
अटल बिहारी बाजपेयी – होनी चाहिए.
मुत्याल राव– इसको मैं मानता हूं. उसके बारे में सोचा जा सकता है. चूंकि संविधान में इस तरह की बात है, इस वास्ते इस वक्त मजबूर हूं. लेकिन इस पर सोचा जा सकता है और सोचकर कोई निर्णय किया जा सकता है.
ओम प्रकाश त्यागी – मैं मंत्री महोदय को धन्यवाद देता हूं कि उन्होने इस बात को सिद्धांतह स्वीकार किया है. लेकिन एक विशेष बात कहना चाहता हूं. जो सहायता अनुसूचित जातियों और आद्म जातियों को दी गई है. वह दो आधारो पर दी गई है, आर्थिक पिछड़ापन और सामाजिक पिछड़ेपन. आर्थिक पिछड़ापन तो हिंदूओं, मुसलमानों, ईसाइयों आदि में भी मिल जाएगा, लेकिन सामाजिक पिछड़ापन एक विशेष चीज है, जिसके कारण दोनों को सहायता दी जा रही है. अगर कोई शेड्यूल कास्ट का आदमी अपना धर्म परिवर्तन करता है, तो उसको सहायता देना बंद कर दिया जाता है. लेकिन शेड्यूल ट्राईब का आदमी ऐसा करता है, धर्म परिवर्तन करता है. हालांकि उनका भी धर्म, उनकी भी संस्कृति आदि सब कुछ चेंज हो जाते हैं. लेकिन उन पर यह चीज लागू नहीं होती है. आपने अनुभव किया है कि दोनों को समान स्तर पर खड़ा किया जाना चाहिए. मैं जानता हूं कि यह जो भेदभाव चल रहा है इसको दूर करने के लिए आप नया प्रयास करने वाले हैं और क्या आप कानून में परिवर्तन करके इन दोनों को समान स्तर पर ला खड़ा करने की कोशिश करेंगे.
मुत्याल राव – सरकार इस पर गौर करने के लिए तैयार है.
कार्तिक उरांव – भारत सरकार अधिनियम, 1919 और 1935 के तहत जिन अनुसूचित जाति और जनजाति ने ईसाई धर्म परिवर्तन कर लिया था. वे भारतीय ईसाई कहलाए. उन्होने 1952 तक के सभी विशेषाधिकारों का आनंद लिया. और जो जनजातीय धर्म (Tribal Religion) को मानने वाले थे “पिछड़ी जनजाति (Backward tribe) ” कहलाए. उस समय उन्हें किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं दी गई. नया संविधान जो 1950 में लागू हुआ उसमें भारतीय ईसाईयों के लिए कोई प्रावधान नहीं किए गए थे. क्योंकि वे सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से अधिक उन्नत थे. यहां तक कि उच्च जाति के हिंदूओं और मुसलमानों की तुलना में राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक थे और हैं.
उपाध्यक्ष महोदय (Deputy speaker) – क्या आप कृपया प्रश्न पर आयेंगे, क्योंकि समय समाप्त हो गया है.
कार्तिक उरांव – अनुसूचित जनजाति के रूप में पिछड़ी जनजातियों के लिए राष्ट्रीय सरकार ने एक विशेष प्रावधान किया है. लेकिन भाग्य की विडंबना से आज तक 5.53 फीसदी भारतीय ईसाई 75-85 फीसदी केंद्रीय सेवाएं हिस्सा ले रहे हैं. विदेशी छात्रवृति का 60 फीसदी व 90 फीसदी राज्य सेवा और मैट्रिक की छात्रवृति वो भी वास्तविक अनुसूचित जनजातियों के 94.47 फीसदी के खुले शोषण के कीमत पर.
उपाध्यक्ष महोदय – क्या मैं अगली बात पर जाऊ.
कार्तिक उरांव – मैं सरकार से इस बारें में जानना चाहता हूं क्या उनके पास कोई अधिसूचना है, कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय ईसाई अनुसूचित जातियों से शासित जातियां और जनजातियां भारतीय ईसाईयों के विशेषाधिकारों की समाप्ति के बाद अनुसूचित जातियों और जनजातियों में इस आधार पर विलीन हो जाएगी कि वे कहां से आती है. यदि हां, तो वह क्या है? यदि नहीं, तो मैं उस अधिकार को जानना चाहूंगा. जिसके तहत सरकार पत्र और भावना के प्रावधानों में संविधान उल्लंघन कर रही है.


