देश के जाने-माने वकील और राजनेता कपिल सिब्बल का एक बयान काफी चर्चा में है. सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान बीते 9 अक्टूबर को जब 57 मेट्रो स्टेशन को बंद करने की घोषणा सरकार ने की, सिब्बल उस पर रोक लगाने के लिए तत्काल सुनवाई की गुहार लगा रहे थे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने से इंकार कर दिया. अब सिब्बल ने पूरे मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.
उन्होंने कहा, “हम अदालत जाते हैं, लेकिन मुझे नहीं पता कि हमें कोई राहत मिलेगी या नहीं. देश के लोग महसूस करते हैं कि इस सरकार को जाना चाहिए. ऐसे समय में अगर कोई संविधान को बचा सकता है, तो वह भारत का सुप्रीम कोर्ट है. लेकिन बार-बार सुप्रीम कोर्ट जाते-जाते मैं थक गया हूं. मैं अपनी बात कर रहा हूं. मुझे नहीं लगता कि वहां जाने का कोई फायदा है. भारत के सुप्रीम कोर्ट पर मेरा ज्यादा भरोसा नहीं रह गया है. जो होना है, वह होकर रहेगा.”
“हमने सुप्रीम कोर्ट को कई बार बताया कि मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जा रहे हैं और गलत तरीके से जोड़े भी जा रहे हैं. हमने महीनों तक इस मुद्दे पर दलीलें दीं. इसके सबूत जनता के सामने हैं. अब अपीलीय न्यायाधिकरण भी कह रहे हैं कि 93 फीसदी मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए थे. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को इसकी जानकारी जरूर रही होगी. लेकिन कोई राहत नहीं दी गई. इसलिए मैं अपनी बात कर रहा हूं, मुझे अब भरोसा नहीं है.”
सिब्बल कोई पहले व्यक्ति नहीं है जिन्होंने कोर्ट के रवैये की आलोचना की है. इससे पहले साल 2020 में जाने-माने नागरिक अधिकार वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट की अवमानना का सामना करने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के रवैये की तीखी आलोचना की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायपालिका अपने संवैधानिक दायित्वों और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय अक्सर सरकार के पक्ष में झुकती दिखती है.
साल 2018 में तो एतिहासिक घटना घटी. 12 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ—ने एक अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस कर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) के कामकाज और मुकदमों के आवंटन के भेदभावपूर्ण रवैये की सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी. उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता बहाल नहीं की गई, तो देश में लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने अदालतों में जजों की बेंचों के गठन और मामलों के आवंटन (Master of the Roster) के तरीके की खुलकर आलोचना की है.
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