दिल्ली में 10 अक्टूबर को SIR के विरोध में प्रदर्शन हुआ. मतदाता सूची से नाम काटे जाने के आरोपों के बीच प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की. इस आंदोलन के केंद्र में सवाल है कि अगर किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से कट जाए, तो उसके वोट देने के अधिकार की रक्षा कैसे होगी?
करीब पांच दशक पहले भी देश में लोकतंत्र, सत्ता की जवाबदेही और व्यवस्था में बदलाव को लेकर ऐसा आंदोलन खड़ा हुआ था. तब बिहार के छात्र महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे. उनके आंदोलन को जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व मिला और 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान से संपूर्ण क्रांति का नारा बुलंद हुआ.
आज SIR को लेकर उठ रहे सवाल और जेपी आंदोलन के मुद्दे एक जैसे नहीं हैं. जेपी आंदोलन व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव की मांग से जुड़ा था, जबकि SIR का मौजूदा विवाद मतदाता सूची और वोट के अधिकार पर केंद्रित है. लेकिन दोनों के बीच एक अहम कड़ी है—लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों की भूमिका और संस्थाओं की जवाबदेही.
जेपी का मानना था कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यवस्था को जनता के प्रति जवाबदेह भी होना चाहिए. इसी सोच ने उनके आंदोलन को सरकार बदलने की मांग से आगे बढ़ाकर संपूर्ण क्रांति का रूप दिया.
जेपी के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन बिहार से निकलकर देशव्यापी बना. इसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार को चुनौती दी, विपक्षी दलों को एकजुट किया और आपातकाल के विरोध में अहम भूमिका निभाई. साल 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार और केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन भी इसी दौर की बड़ी राजनीतिक परिणति थी.
पढिए जेपी आंदोलन की पूरी कहानी….
बिहार के सिताब दियारा में 11 अक्टूबर 1902 को जन्मे जयप्रकाश नारायण स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी विचारक और जननेता थे. लोकनायक के नाम से मशहूर जेपी स्वतंत्रता के बाद सक्रिय दलगत राजनीति से दूर होकर भूदान और सर्वोदय आंदोलनों से जुड़ गए थे. लेकिन 1974 में छात्रों के आग्रह पर उन्होंने फिर राजनीतिक संघर्ष का नेतृत्व संभाला.
जेपी आंदोलन की शुरूआत कैसे हुई
साल 1970 के दशक की शुरुआत में देश आर्थिक संकट से गुजर रहा था. साल 1973 के अंतरराष्ट्रीय तेल संकट के बाद महंगाई बढ़ी. बेरोजगारी, खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों और सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी थीं.
बिहार में छात्र परीक्षा व्यवस्था, शिक्षा संस्थानों की बदहाली और रोजगार के सीमित अवसरों से परेशान थे. गुजरात में महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए नवनिर्माण आंदोलन ने भी बिहार के विद्यार्थियों को प्रेरित किया.
पटना में 18 मार्च 1974 को बिहार विधानसभा के बजट सत्र के दौरान छात्रों ने प्रदर्शन किया. विधानसभा घेराव की कोशिश के दौरान पुलिस से टकराव हुआ. इसके बाद आंदोलन राज्य के दूसरे हिस्सों में भी फैलने लगा. बिहार छात्र संघर्ष समिति ने आंदोलन को संगठित किया और मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर की सरकार के खिलाफ विरोध तेज हो गया.
छात्रों को ऐसे नेतृत्व की जरूरत महसूस हुई, जो आंदोलन को राजनीतिक दलों के दायरे से बाहर निकालकर व्यापक जनसमर्थन दिला सके. उन्होंने जयप्रकाश नारायण से नेतृत्व संभालने का आग्रह किया.
जेपी ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया, लेकिन कुछ शर्तें भी रखीं. आंदोलन अहिंसक रहेगा, किसी राजनीतिक दल के नियंत्रण में नहीं होगा और इसका लक्ष्य केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि व्यवस्था में बुनियादी सुधार करना होगा.
जब गांधी मैदान से गूंजा संपूर्ण क्रांति का नारा
पटना के गांधी मैदान में 5 जून 1974 को विशाल जनसभा हुई. यहीं जेपी ने संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया. उनका मानना था कि भ्रष्टाचार, महंगाई और प्रशासनिक अव्यवस्था जैसी समस्याओं का समाधान केवल मुख्यमंत्री या सरकार बदलने से नहीं होगा.
उनका नारा था:
“संपूर्ण क्रांति अब नारा है,
भावी इतिहास हमारा है.”
संपूर्ण क्रांति के सात आयाम थे – राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक. जेपी चाहते थे कि शासन जवाबदेह बने, आर्थिक असमानता और सामाजिक भेदभाव कम हो तथा शिक्षा व्यवस्था समाज की जरूरतों के अनुरूप हो.
उनके लिए युवाओं की भूमिका चुनाव और सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं थी. वे चाहते थे कि छात्र गांवों और समुदायों में काम करें, भ्रष्टाचार का विरोध करें और सामाजिक बदलाव में भागीदार बनें.
नवंबर 1974 में पटना में एक बड़े प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में जेपी घायल हुए. इससे आंदोलन को और राजनीतिक समर्थन मिला. इसी दौर में देश में श्रमिक असंतोष भी बढ़ रहा था. मई 1974 की जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व वाली रेलवे हड़ताल ने आर्थिक और श्रमिक समस्याओं को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया.
दिल्ली के बोट क्लब क्षेत्र में 6 मार्च 1975 को विपक्ष की एक बड़ी रैली ने संकेत दिया कि सरकार के खिलाफ लामबंदी अब बिहार तक सीमित नहीं रही थी.
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से बढ़ा टकराव
दिन 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने राज नारायण की याचिका पर फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के 1971 के रायबरेली लोकसभा चुनाव को चुनावी कानूनों के उल्लंघन के आधार पर अमान्य घोषित कर दिया. अदालत ने सरकारी अधिकारियों की सहायता लेने को भ्रष्ट चुनावी आचरण माना और छह साल के लिए अयोग्यता का आदेश दिया. इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. इसके बाद 24 जून को उन्हें सशर्त अंतरिम राहत मिली, जिसमें इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर रह सकती थी, लेकिन सांसद के रूप में मतदान के अधिकार पर रोक थी. लेकिन विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग तेज कर दी.
जेपी नारायण ने 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली को संबोधित किया. उन्होंने शांतिपूर्ण जनसंघर्ष जारी रखने की अपील की और पुलिस तथा सशस्त्र बलों से गैरकानूनी और अनैतिक आदेशों का पालन नहीं करने को कहा.
उसी रात आपातकाल लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी. राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत ‘आंतरिक अशांति’ का हवाला देते हुए उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए. साल 1975 की 26 जून को देश को आपातकाल लागू होने की जानकारी दी गई.
आपातकाल में जेल गए जेपी, प्रेस पर लगी सेंसरशिप
आपातकाल लागू होते ही जेपी समेत कई विपक्षी नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई और सरकार की आलोचना करने वाली खबरों के प्रकाशन पर पाबंदियां लगीं. जेपी को 26 जून 1975 को गिरफ्तार किया गया. हिरासत में उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद स्वास्थ्य कारणों से 12 नवंबर 1975 को रिहा किया गया. किडनी की गंभीर बीमारी के बावजूद उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली और आपातकाल समाप्त करने की मांग जारी रखी.
इस दौरान नागरिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध, राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी, जबरन नसबंदी और झुग्गी-बस्तियों को हटाने जैसी कार्रवाइयां विवाद का विषय बनीं. जेपी आंदोलन का केंद्र भी बदल गया. अब लड़ाई सिर्फ भ्रष्टाचार और सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों, प्रेस की आजादी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए थी.
तारीख 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ. इससे पहले जनवरी में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी थी. विपक्षी दलों ने एकजुट होकर चुनाव लड़ने की तैयारी की. आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में विपक्षी दल जनता पार्टी के रूप में एकजुट हुए. भारतीय लोकदल, भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ) और समाजवादी धारा के नेता इस गठबंधन का हिस्सा बने. जेपी ने विपक्षी एकता में अहम भूमिका निभाई, लेकिन खुद किसी सरकारी पद पर नहीं आए.
चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई और कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हो गई. इंदिरा गांधी भी रायबरेली से चुनाव हार गईं. साल 1977 के 24 मार्च को मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. यह केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी. हालांकि, जनता पार्टी की सरकार आंतरिक मतभेदों और नेतृत्व संघर्ष के कारण 1979 में गिर गई. इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि सरकार के खिलाफ एकजुट होना और सत्ता में आने के बाद साझा कार्यक्रम पर शासन चलाना अलग चुनौतियां हैं.
जेपी आंदोलन से निकले कई बड़े नेता
जेपी आंदोलन से जुड़े कई युवा आगे चलकर भारतीय राजनीति के प्रमुख चेहरे बने. इनमें लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी और रामविलास पासवान जैसे नेताओं के नाम शामिल हैं. इनकी भूमिका और आंदोलन से जुड़ने का समय अलग-अलग था, लेकिन बिहार की राजनीति पर इस आंदोलन का गहरा प्रभाव पड़ा.
इसकी विरासत सिर्फ नेताओं के राजनीतिक करियर तक सीमित नहीं रही. आंदोलन ने भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और सरकारी नीतियों पर सवाल उठाने को लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में स्थापित करने में भूमिका निभाई.
Also Read : दिल्ली प्रोटेस्ट में अब तक 1500 से अधिक लोग डिटेन, पूर्व मुख्यमंत्रियों से लेकर पत्रकारों तक पर कार्रवाई

