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    Home»आदिवासी»झारखंडः लापता मजदूरों की तलाश में निकला मिशन बदलाव संगठन, अब तक 50 मजदूरों के गायब होने की सूचना, संख्या बढ़ने की आशंका
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    झारखंडः लापता मजदूरों की तलाश में निकला मिशन बदलाव संगठन, अब तक 50 मजदूरों के गायब होने की सूचना, संख्या बढ़ने की आशंका

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyOctober 11, 2026No Comments6 Mins Read2
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    विजय उरांव, जोहार लाइव संवाददाता

    झारखंड में रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों और महानगरों में जाने वाले मजदूरों के लापता होने की समस्या अब गंभीर सवाल खड़े कर रही है. कोई परिवार अपने बेटे का इंतजार कर रहा है, तो कोई पति या भाई की वापसी की उम्मीद में बैठा है. कई मामलों में परिवारों को यह तक पता नहीं चल पाता कि उनके परिजन कहां हैं और उसके साथ क्या हुआ. इस बीच, संसद में पेश आंकड़े राज्य में गुमशुदगी की समस्या की एक बड़ी तस्वीर सामने रखते हैं.

    लोकसभा में 1 दिसंबर 2025 को श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की ओर से दिए गए जवाब के अनुसार, 26 नवंबर 2025 तक झारखंड के 97,86,446 असंगठित श्रमिक ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत थे. इनमें प्रवासी मजदूर भी शामिल हैं, लेकिन यह आंकड़ा केवल दूसरे राज्यों में काम करने वाले मजदूरों का नहीं है. वहीं, गृह मंत्रालय ने 4 फरवरी 2026 को राज्यसभा में NCRB के आंकड़ों के आधार पर झारखंड में लापता लोगों का वर्षवार ब्योरा दिया था. इससे पता चलता है कि राज्य में गुमशुदगी के मामले लगातार दर्ज होते रहे हैं.

    गृह मंत्रालय की ओर से संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड में 2020 में 699 लोग लापता हुए थे. 2021 में यह संख्या 847, 2022 में 1,266 और 2023 में बढ़कर 2,445 हो गई. 2023 के अंत तक राज्य में कुल 3,840 लापता लोगों के मामले दर्ज थे, जिनमें 1,941 लोगों का पता नहीं चल पाया था. इस कुल संख्या में पिछले वर्षों के लंबित मामले भी शामिल हैं.

    ये आंकड़े सभी लापता व्यक्तियों से संबंधित हैं. इनमें कितने लोग रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में गए प्रवासी मजदूर थे, इसका अलग विवरण इन आंकड़ों से नहीं मिलता. इसलिए इनकी संख्या को प्रवासी मजदूरों की गुमशुदगी का आंकड़ा नहीं माना जा सकता.

    मिशन बदलाव को मिले करीब 50 मामले, गांव-गांव पहुंच रही टीम

    सरकारी आंकड़ों के बीच मिशन बदलाव ने झारखंड के लापता प्रवासी मजदूरों की तलाश के लिए अभियान तेज किया है. संस्था के सदस्य भूषण भगत के मुताबिक, अब तक करीब 50 मामले सामने आए हैं और लगातार नए मामलों की जानकारी मिल रही है. संस्था अपने सदस्यों के जरिए गांव-गांव जाकर उन परिवारों की पहचान कर रही है, जिनका कोई सदस्य दूसरे राज्य या देश में काम करने गया और लंबे समय से घर नहीं लौटा.

    भूषण भगत बताते हैं कि कुछ समय पहले गुजरात से लापता सुरेंद्र उरांव का मामला सामने आया. शुरुआत में संस्था के पास ऐसे एक-दो मामले आते थे, लेकिन बाद में पता चला कि समस्या इससे कहीं ज्यादा बड़ी हो सकती है. इसके बाद अलग-अलग इलाकों में ऐसे परिवारों की पहचान करने का काम शुरू किया गया.

    उन्होंने दुबई गए उदय गोप का मामला भी साझा किया. उनके मुताबिक, उदय गोप के मामले में कंपनी से जुड़ी कानूनी परेशानी की जानकारी सामने आई थी. शिकायत के बाद उनके लापता होने का मामला दर्ज हुआ. मिशन बदलाव की टीम ने भी उनकी तलाश के लिए प्रयास किया, लेकिन अब तक उनका पता नहीं चल सका है.

    परिवार इंतजार करते रहते हैं, कई मामले थाने तक नहीं पहुंचते

    भूषण भगत के मुताबिक, कई परिवार इस उम्मीद में इंतजार करते रहते हैं कि उनका परिजन कुछ दिनों में लौट आएगा. इसी कारण हर मामला पुलिस या जिला प्रशासन तक नहीं पहुंच पाता. संस्था की टीम परिवारों से सीधे संपर्क कर यह पता लगा रही है कि मजदूर आखिरी बार कब संपर्क में था, कहां काम करने गया था और कितने समय से बातचीत बंद है.

    इसके साथ ही यह भी पूछा जा रहा है कि परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई या नहीं, शिकायत पर कोई कार्रवाई हुई या नहीं और पुलिस की ओर से किस तरह की सहायता मिली. संस्था ऐसे मामलों को भी दर्ज कर रही है, जिनकी जानकारी अब तक प्रशासन तक नहीं पहुंची है.

    फिलहाल मिशन बदलाव सिमडेगा, खूंटी और गुमला में सक्रिय रूप से काम कर रहा है. लोहरदगा के दूरदराज के इलाकों से भी ऐसे मामले सामने आए हैं. संस्था का प्रयास है कि झारखंड के सभी क्षेत्रों में लापता मजदूरों के परिवारों तक पहुंचकर उनकी जानकारी जुटाई जाए.

    ईंट-भट्ठों पर फंसने और संपर्क टूटने की शिकायतें

    भूषण भगत बताते हैं कि कोविड के दौरान संस्था की टीम को कई ऐसे मामले मिले थे, जिनमें मजदूर रोजगार के लिए ईंट-भट्ठों पर गए थे. कुछ मामलों में मजदूरों के मोबाइल छीन लिए जाने और परिवार से संपर्क टूटने की शिकायतें सामने आई थीं. उन्होंने यह भी बताया कि कुछ मजदूरों को वापस घर नहीं आने देने की शिकायतें मिली थीं.

    रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने वाले मजदूर कई बार ऐसी परिस्थितियों में फंस जाते हैं कि उनके लिए वापस लौटना मुश्किल हो जाता है. परिवारों को न तो उनके ठिकाने की जानकारी मिलती है और न ही यह पता चलता है कि वे सुरक्षित हैं या नहीं. भूषण भगत ने दावा किया कि NCRB के अनुसार झारखंड से हर साल 2,000 से 3,000 प्रवासी मजदूर लापता होते हैं.

    मिशन बदलाव अब सामने आए मामलों की जानकारी सत्यापित कर सूची तैयार कर रहा है. संस्था की योजना इन मामलों को मुख्यमंत्री कार्यालय के समक्ष उठाने की है. इसके साथ ही लापता मजदूरों के परिवारों को सहायता और मुआवजा दिलाने की मांग भी की जाएगी.

    भूषण भगत का कहना है कि मजदूर अपने परिवार का जीवन बेहतर बनाने के लिए घर से दूर कमाने जाते हैं. अगर वे लापता हो जाते हैं, तो परिवार भावनात्मक संकट के साथ आर्थिक परेशानी से भी गुजरता है. ऐसे में मजदूरों की तलाश के साथ उनके परिवारों को सहायता देने की व्यवस्था भी जरूरी है.

    संसद में पेश आंकड़े राज्य में गुमशुदगी की स्थिति का एक व्यापक संकेत देते हैं, जबकि मिशन बदलाव का अभियान प्रवासी मजदूरों से जुड़े मामलों की पहचान करने की कोशिश कर रहा है. अब अहम सवाल यह है कि इन मामलों का सरकारी स्तर पर सत्यापन कैसे होगा, कितने मजदूरों का पता लगाया जा सकेगा और उनके परिवारों को कब तक राहत मिल पाएगी.

    Also Read : विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: मानसिक रोगियों में 90 परसेंट तक को नहीं मिलता इलाज, ये हम नहीं, भारत की संसद कह रही है

    प्रवासी मजदूर मिशन बदलाव
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