जोहार लाइव ब्यूरो
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने देश में गैर-न्यायिक हत्याओं और पुलिस हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई है. उन्होंने सवाल उठाया कि कई बार आरोपियों को पुलिस हिरासत में लेने के बाद कथित मुठभेड़ या अन्य घटनाओं में उनकी मौत कैसे हो जाती है.
शुक्रवार 18 सितंबर को नई दिल्ली में सेंटर फॉर डिस्कोर्स ऑन क्रिमिनल एंड कॉंस्टीट्यूशनल ज्यूरिसप्रूडेंस की ओर से आयोजित “Discourse on Ethics in Criminal Litigation, Trial by Media & Admissibility of Statements” कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि उन्हें पहले लगता था कि हिरासत में हिंसा बीते दौर की बात हो चुकी है, लेकिन बाद में उन्हें अपनी इस धारणा पर दोबारा विचार करना पड़ा.
उन्होंने कहा, “मुझे लगा था कि हिरासत में हिंसा बीते दौर की बात हो चुकी है. लेकिन मुझे अपनी इस धारणा पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा. भारत में गैर-न्यायिक हत्याएं बढ़ रही हैं.”
जस्टिस भुइयां ने यह भी सवाल उठाया कि अपराध के घटनास्थल का पुनर्निर्माण कराने के नाम पर आरोपियों को असामान्य समय में पुलिस हिरासत से बाहर क्यों ले जाया जाता है, खासकर तब जब ऐसा करने की कोई स्पष्ट और तत्काल जरूरत न हो.
उन्होंने पूछा, “किसी आरोपी को अपराध का घटनास्थल दोबारा तैयार कराने के लिए सुबह 3 बजे पुलिस हिरासत से बाहर ले जाने की क्या जरूरत है? क्या सूर्योदय तक इंतजार नहीं किया जा सकता था? ऐसी कौन-सी गंभीर और तत्काल जरूरत थी?”
जज ने उन अलग-अलग वजहों का भी जिक्र किया, जो किसी आरोपी की हिरासत में या ऐसी किसी कार्रवाई के दौरान मौत के बाद पुलिस की ओर से कभी-कभी बताई जाती हैं. इनमें यह दावा शामिल हो सकता है कि आरोपी ने पुलिस की राइफल छीनने की कोशिश की, हाथापाई के दौरान गोली चल गई या आरोपी तेज रफ्तार ट्रक की चपेट में आ गया.
उन्होंने एक ऐसे मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि आरोपी डिप्रेशन में था और उसने कथित तौर पर कुएं में छलांग लगा दी थी.
जस्टिस भुइयां ने कहा कि ऐसी घटनाएं लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर कर सकती हैं कि जांच की कमियों को छिपाने के लिए “शॉर्टकट तरीके” अपनाए जा रहे हैं, खासकर तब जब जांच अधिकारियों को आपराधिक मुकदमे के संभावित नतीजे का अंदाजा हो.
उन्होंने कहा, “सही सोच रखने वाले लोग यह सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि क्या जांच की कमियों को छिपाने का यह कोई तरीका है? जब मुकदमे के नतीजे का पूरी तरह अंदाजा हो, तो क्या इन्हीं शॉर्टकट तरीकों को अपनाया जाता है?”
जस्टिस भुइयां ने जोर देकर कहा कि ऐसी गतिविधियां भारत की संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं हैं. हमारी संवैधानिक व्यवस्था इस तरह की परिस्थितियों को मंजूरी नहीं देती.
आप अंदाजा नहीं लगा सकते कि पुलिस हिरासत में किसी के साथ क्या हो सकता है
जज ने प्रदर्शनकारियों पर युवा आईपीएस अधिकारियों द्वारा व्यक्तिगत रूप से हमला किए जाने की घटनाओं पर भी चिंता जताई. इस संदर्भ में उन्होंने एक अन्य कार्यक्रम में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादती को लेकर की गई अपनी पिछली टिप्पणी का जिक्र किया.
उन्होंने कहा, “लेकिन आप देखते हैं कि युवा आईपीएस अधिकारी खुद प्रदर्शनकारियों पर हमला कर रहे हैं और उनके चेहरे पर इतना गुस्सा दिखाई देता है. आखिर क्यों? आप एक पेशेवर पुलिस अधिकारी हैं, आपको इतना उत्तेजित होने की क्या जरूरत है? निहत्थे हाथों से किसी प्रदर्शनकारी की पिटाई करना…”
जस्टिस भुइयां ने कहा कि इस तरह का व्यवहार यह गंभीर सवाल खड़ा करता है कि पुलिस हिरासत में किसी आरोपी के साथ क्या हो सकता है, खासकर रात के समय.
उन्होंने कहा, “यह सोचकर ही सिहरन होती है कि अगर ऐसा कोई पुलिस अधिकारी रात में किसी आरोपी की हिरासत में हो तो क्या होगा. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि रात में पुलिस हिरासत में किसी आरोपी के साथ क्या हो सकता है? हममें से कई लोग लोगों को पुलिस हिरासत में भेजने को लेकर काफी सतर्क रहते हैं, और इसके पीछे वजह है.”
हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी कई आदेशों के जरिए कथित मुठभेड़ हत्याओं को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से पेश की जाने वाली एक जैसी दलीलों और घटनाक्रम के विवरण पर सवाल उठाए थे.
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