19 सितंबर 2008 की सुबह दिल्ली के लिए आम सुबह नहीं थी. छह दिन पहले ही राजधानी सिलसिलेवार बम धमाकों से दहल चुकी थी. 13 सितंबर को दिल्ली में हुए धमाकों में कई लोगों की जान गई थी और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे. जांच एजेंसियां हमले के पीछे मौजूद नेटवर्क तक पहुंचने में जुटी थीं.
इसी जांच के दौरान दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को जामिया नगर के बाटला हाउस इलाके के एल-18 मकान की जानकारी मिली. पुलिस के मुताबिक, यहां इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े संदिग्ध आतिफ उर्फ बशीर और उसके साथी मौजूद थे. 19 सितंबर की सुबह पुलिस टीम वहां पहुंची.
टीम का नेतृत्व इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा कर रहे थे. उनके साथ स्पेशल सेल के दूसरे अधिकारी भी थे. पुलिस को शायद अंदाजा था कि सामने संदिग्ध हो सकते हैं, लेकिन कुछ ही देर में वहां गोलियां चलने वाली थीं, इसका अंदाजा उस वक्त शायद किसी को नहीं था. कुछ मिनट बाद L-18 से गोलियों की आवाज आने लगी.

छह दिन पहले बम धमाकों से दहली थी दिल्ली
बाटला हाउस की कहानी समझने के लिए छह दिन पीछे जाना होगा. 13 सितंबर 2008 को दिल्ली के कई भीड़भाड़ वाले इलाकों में सिलसिलेवार बम धमाके हुए. कनॉट प्लेस, करोल बाग और ग्रेटर कैलाश समेत कई इलाकों को निशाना बनाया गया. इन धमाकों में 26 लोगों की मौत हुई और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए. जांच एजेंसियों ने इन हमलों के पीछे इंडियन मुजाहिदीन के नेटवर्क को जिम्मेदार बताया.
दिल्ली पुलिस ने मामले में कई मुकदमे दर्ज किए और संदिग्धों की तलाश शुरू कर दी. जांच के दौरान पुलिस को एक मोबाइल नंबर मिला. उसकी निगरानी की गई और लोकेशन जामिया नगर के बाटला हाउस इलाके में एक मकान तक पहुंची. यहीं से L-18 की कहानी शुरू हुई.
मोबाइल लोकेशन ने पहुंचाया L-18 तक
दिल्ली पुलिस ने बम धमाकों के सिलसिले में पांच मुकदमे दर्ज किए. धमाकों में शामिल अपराधियों की धरपकड़ शुरू हो चुकी थी. एक मोबाइल नंबर की पहचान हुई. उसे ट्रेस पर लगाया गया. एक लोकेशन मिली, जामिया नगर के बाटला हाउस स्थित एक घर की. इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के नेतृत्व में एक टीम 19 सितंबर 2008 को बाटला हाउस के मकान नंबर L-18 पर पहुंची. फ्लैट में सबसे पहले घुसने वालों में सब-इंस्पेक्टर धर्मेंद्र थे. उन्होंने फॉर्मल शर्ट, टाई और ट्राउजर्स पहन रखी थी. वह एक टेलिकॉम कंपनी का एक्जीक्यूटिव बनकर गए थे. तब एसीपी रहे संजीव यादव उस वक्त L-18 की सीढ़ियां चढ़ रहे थे जब उन्होंने गोलियों की आवाज सुनी. ऊपर गए सात में तीन पुलिसकर्मियों को गोली लगी. यादव ने अपने साथियों को शर्मा व अन्य घायल पुलिसकर्मियों को नीचे लाते देखा.

इस दौरान इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा समेत तीन पुलिसकर्मी घायल हुए. पुलिस की टीम आगे बढ़ी तो एक कमरे में मोहम्मद साजिद उर्फ छोटा साजिद मिला. पुलिस के मुताबिक, जवाबी फायरिंग में वह मारा गया. एक अन्य संदिग्ध मोहम्मद आतिफ अमीन भी मारा गया. वहीं मोहम्मद सैफ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. पुलिस के मुताबिक, वह बाथरूम में मिला था और उसने सरेंडर करने की बात कही थी.
लेकिन दो लोग वहां से निकलने में कामयाब हो गए. इनमें एक था शहजाद अहमद और दूसरा आरिज खान. और इसी दौरान घायल इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा को अस्पताल ले जाया गया. बाद में उनकी मौत हो गई. मोहन चंद शर्मा की मौत ने मामले को और गंभीर बना दिया.
मोहन चंद शर्मा दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के चर्चित अधिकारियों में शामिल थे. आतंकवाद से जुड़े कई मामलों में उन्होंने काम किया था. बाटला हाउस ऑपरेशन में उनकी मौत ने पूरे मामले को और बड़ा बना दिया. अब यह सिर्फ आतंकवादियों की तलाश में हुई पुलिस कार्रवाई नहीं थी. एक पुलिस अधिकारी की मौत भी इस मामले का हिस्सा बन चुकी थी.
दिल्ली पुलिस का दावा था कि टीम पर फायरिंग हुई और जवाबी कार्रवाई में संदिग्ध मारे गए. लेकिन इसके साथ ही एक दूसरा सवाल भी उठने लगा. क्या बाटला हाउस में हुई मुठभेड़ की परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए?
मुठभेड़ पर उठे सवाल
मुठभेड़ के बाद जामिया नगर और देश के दूसरे हिस्सों में इसे लेकर विरोध शुरू हुआ. कुछ राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने कार्रवाई पर सवाल उठाए और न्यायिक जांच की मांग की. जामिया मिलिया इस्लामिया से जुड़े लोगों की ओर से भी इस मामले को लेकर चिंता जताई गई.
दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस अपने दावे पर कायम रही कि यह कार्रवाई दिल्ली में हुए बम धमाकों से जुड़े संदिग्धों के खिलाफ थी और पुलिस टीम पर फायरिंग के बाद जवाबी कार्रवाई हुई. यही विरोधाभासी दावे आने वाले वर्षों तक बाटला हाउस की बहस का आधार बने रहे.
कैसे पकड़े गए फरार आतंकी?
बाटला हाउस एनकाउंटर के कुछ हफ्तों बाद ही आरिज नेपाल पहुंच गया. वहां की नागरिकता लेकर उसने मोहम्मद सलीम के नाम से पासपोर्ट भी बनवा लिया था. पहले उसने ढाबा खोला फिर कुछ स्कूलों में पढ़ाया भी. आईएम के झंडाबरदारों- भटकल बंधुओं के कहने पर बीच में आरिज ऊदी अरब भी गया. आरिज और शहजाद की तलाश में पुलिस टीमें लगी हुई थी. 2010 में यूपी की एंटी टेररिस्ट स्क्वाड (ATS) ने शहजाद को आजमगढ़ से दबोचा. वह अपने दादा के घर रह रहा था. दिल्ली की साकेत अदालत ने उसे 2013 में दोषी करार दिया.
आरिज अब भी गिरफ्त से दूर था. एनकाउंटर को लेकर तमाम राजनीतिक दलों ने सवाल उठाए, कई तरह की जांच हुई, आयोग बने… केस को लॉजिकल एंड तक पहुंचाने में आरिफ अहम कड़ी था. जनवरी 2018 में डीसीपी प्रमोद कुशवाहा की टीम को खान की भनक लगी. एक टीम नेपाल भेजी गई. महीने भर चले ऑपरेशन में आरिज खान को पकड़ लिया गया.
कोर्ट ने क्या कहा ?
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2008 के बाटला हाउस एनकाउंटर के दोषी आरिज खान को मिली फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है. जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस अमित शर्मा की बेंच ने 12 अक्टूबर को मामले पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया. आरिज खान इंडियन मुजाहिदीन (IM) का आतंकी है. उस पर दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की हत्या का आरोप है.
दिल्ली की साकेत कोर्ट ने इस मामले में आरिज खान को 8 मार्च को दोषी करार दिया था. अदालत ने 14 मार्च 2021 को आरिज को फांसी की सजा सुनाई थी, तब कोर्ट ने कहा था कि यह क्राइम रेयरेस्ट ऑफ रेयर कैटेगरी का है. आरिज ने कोर्ट के इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
और अब शहजाद की मौत
बाटला हाउस मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे शहजाद अहमद की मौत 28 जनवरी 2023 को हुई. इस मामले ने एक बार फिर 19 सितंबर 2008 की उस घटना को चर्चा में ला दिया. शहजाद लंबे समय से जेल में बंद था और इलाज के दौरान उसकी मौत हुई. करीब डेढ़ दशक पहले जिस मामले में उसे उम्रकैद मिली थी, उसी मामले ने उसकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी. लेकिन बाटला हाउस की कहानी सिर्फ शहजाद की गिरफ्तारी और सजा तक सीमित नहीं है.
बाटला हाउस की घटना को 18 साल हो चुके हैं. इन वर्षों में इस मामले से जुड़े कई किरदारों की जिंदगी बदल गई. दो संदिग्ध मुठभेड़ में मारे गए. इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की जान गई. शहजाद को उम्रकैद मिली. आरिज खान करीब दस साल बाद गिरफ्तार हुआ और उसे मौत की सजा सुनाई गई. लेकिन इस पूरी कहानी के साथ एक राजनीतिक और सामाजिक बहस भी चलती रही.
एक पक्ष के लिए यह दिल्ली में हुए बम धमाकों से जुड़े संदिग्धों के खिलाफ पुलिस का ऑपरेशन था, जिसमें एक अधिकारी ने अपनी जान गंवाई. दूसरी तरफ मुठभेड़ की परिस्थितियों को लेकर सवाल उठाने वाले लोग स्वतंत्र जांच की मांग करते रहे.
यही वजह है कि बाटला हाउस सिर्फ 19 सितंबर 2008 की एक पुलिस मुठभेड़ का नाम नहीं है. यह उस दौर की कहानी है, जब दिल्ली आतंकवादी हमलों के डर से जूझ रही थी, पुलिस हमलावरों की तलाश में थी और उसी कार्रवाई के बीच एक ऐसी मुठभेड़ हुई, जिसने आतंकवाद से लड़ाई और पुलिस कार्रवाई को लेकर देश में लंबी बहस छेड़ दी.
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