विजय उराँव, जोहार लाइव संवाददाता
झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया क्षेत्र की रहने वाली छूटनी देवी (महतो) का नाम आज देश के उन विरले सामाजिक योद्धाओं में शुमार है, जिन्होंने अंधविश्वास और हिंसा की राख से उठकर सैकड़ों जिंदगियों को नया जीवन दिया है. कभी अपने ही ससुराल और गांव में अमानवीय बर्बरता झेलने वाली छूटनी महतो ने समाज के बहिष्कार को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसी पीड़ा को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाकर कुप्रथा के खिलाफ जन-आंदोलन खड़ा कर दिया.
उनकी कहानी सिर्फ एक सर्वाइवर की दास्तान नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज में महिलाओं की बेबसी, जमीन के विवाद और अंधविश्वास के हिंसक गठजोड़ को जड़ से उखाड़ फेंकने का जीवंत दस्तावेज है. जिस महिला को कभी डायन बताकर गांव की सीमा से खदेड़ दिया गया था, उन्होंने आगे चलकर 150 से अधिक महिलाओं को मौत के मुंह से निकाला. इसी असाधारण सामाजिक योगदान के लिए वर्ष 2021 में भारत सरकार ने उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से अलंकृत किया.

आज 70 वर्ष से अधिक उम्र की दहलीज पर भी उनका यह मोर्चा थमा नहीं है. छूटनी महतो वर्तमान में अपने सरायकेला स्थित केंद्र से अंधविश्वास, डायन प्रताड़ना और घरेलू हिंसा की शिकार बेसहारा महिलाओं को कानूनी सहायता, तत्काल सुरक्षा और आश्रय दिलाने का काम पूरी सक्रियता से कर रही हैं. वे आज भी पीड़ितों की ढाल बनकर थानों से लेकर अदालतों तक सीधी लड़ाई लड़ रही हैं और व्यवस्था के सामने स्वाभिमान के साथ खड़ी हैं.
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शुरुआती जीवन : जब डायन होने का ठप्पा लगा
सरायकेला के एक साधारण ग्रामीण परिवार में जन्मीं छूटनी महतो का जीवन लंबे समय तक एक आम ग्रामीण महिला की तरह बीता. 1978 के दौर में, जब उनकी उम्र महज 12 से 14 वर्ष रही होगी, उनका विवाह महतो परिवार में हुआ. पति अपने मां-बाप के इकलौते बेटे थे और परिवार के पास करीब दो-तीन एकड़ पुश्तैनी जमीन थी.
शुरुआती दिन ठीक-ठाक बीते, लेकिन सास-ससुर के गुजरते ही परिवार के भीतर जमीन को लेकर आंखें तिरछी होने लगीं. छूटनी महतो अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती थीं, जबकि ससुराल के कुछ लोग बच्चों से मवेशी चराने और खेत का काम करवाना चाहते थे. बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता देना और जमीन पर हिस्सेदारी को लेकर रिश्तेदारों से विवाद गहराता गया.
साल 1995 में परिवार की एक रिश्तेदार किशोरी बीमार पड़ी, तो ससुराल वालों और पड़ोसियों ने डॉक्टरों के पास जाने के बजाय ओझा का सहारा लिया और छूटनी महतो पर डायन होने का ठप्पा लगा दिया. गांव की पंचायत बैठी और उन पर 500 रुपये का भारी जुर्माना लगाया गया. छूटनी ने जुर्माना भर भी दिया, लेकिन जमीन हड़पने की नीयत से रची गई साजिश इतने पर शांत नहीं हुई.
मुश्किलों से मुकाबला: पेड़ के नीचे आठ महीने और जमीन का घिनौना सच
जुर्माना देने के कुछ ही दिनों बाद भीड़ ने उन पर हमला कर दिया. उनके कपड़े खींचे गए, घसीटा गया और जबरन मैला पिलाने की कोशिश की गई. अपनी और बच्चों की जान बचाने के लिए वे रात के अंधेरे में गांव छोड़कर भाग निकलीं. पति ने भी रिश्तेदारों के दबाव में उनका साथ छोड़ दिया और दूसरी औरत रख ली.
चार मासूम बच्चों को लेकर आठ महीने तक उन्हें खुले आसमान और पेड़ के नीचे रातें गुजारनी पड़ीं. पेट भरने के लिए मजदूरी की, दूसरों के खेतों में काम किया, लेकिन कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया.
इस दौर को याद करते हुए छूटनी महतो कहती हैं:
“हमारा कहानी का तकलीफ 1995 से 1996 तक रहा. आठ महीना कोई पेड़ के नीचे थे चार बच्चा को लेकर. उस समय सब कोई मेरे को छी-थू करता था, डायन बोलता था. अब पद्मश्री मिला तो सब टंगरी चाटने आ रहा है! सब कहता है पद्मश्री तो हमने दिलाया. अरे भाई, तुमने दिलाया तो अपने परिवार को दिलाओ न, हमको काहे दिलाए? जब भूखे मर रहे थे, तब तो कोई दो मुट्ठी चावल देने नहीं आया था.”
वे डायन प्रथा के पीछे की असली जड़ को साफ शब्दों में समझाती हैं:
“ज़मीन को कौन खाता है बेटा? ज़मीन तो जहां है तहां रह जाता है, हम लोग आते हैं और चले जाते हैं. मेरा दादा-परदादा दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मिट्टी तो उसी जगह है. मिट्टी को कौन धोके ले जाएगा? लेकिन गांव में सब खेल इसी जमीन का है. तुमको डायन बोलकर भगा देंगे तो तुम्हारी जमीन हड़प लेंगे. गांव का आदमी अंधविश्वास में फंसा रहता है और चालाक लोग जमीन डकार जाते हैं.”
पहचान और उपलब्धियां: दिल्ली का सफर और नीतिगत उपेक्षा
1996 में कानूनी सहायता से जुड़ीं और फिर 2001 से पूरी तरह मैदान में उतर गईं. जहां भी किसी महिला को डायन बोलकर प्रताड़ित किए जाने की सूचना मिलती, छूटनी महतो लाठी लेकर पहुंच जातीं. उन्होंने पीड़ितों को थानों तक पहुंचाया, अपने घर में महीनों पनाह दी और 150 से अधिक महिलाओं को नया जीवन दिया.
25 जनवरी 2021 को उन्हें पद्मश्री देने की घोषणा हुई और तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें सम्मानित किया. लेकिन इस राष्ट्रीय सम्मान के पीछे की मुफलिसी और प्रशासनिक बेरुखी पर छूटनी महतो बेबाकी से पर्दा उठाती हैं:
“पद्मश्री चौथा नंबर का सम्मान है. नाम मिला, इज्जत मिला, लेकिन एको रुपया नहीं है. हम जब 2021 में पद्मश्री लेने गए न बाबू, मेरे पास जाने की क्षमता नहीं थी. मेरा बेटा लोन लेकर हमको दिल्ली ले गया. उधर रहने के लिए एक ठो होटल का रूम मिला था, जिसमें हम चार आदमी घुसे थे. खाना-पीना मिला, लेकिन आने-जाने का टिकट तक का खर्चा नहीं मिला. दिल्ली में अमित खरे और निधि खरे (आईएएस अधिकारी) थे, जो कभी चाईबासा में डीसी रहे थे, उन्होंने अपनी गाड़ी भेजकर हमको बुलाया और सम्मान दिया.”
वे सीधे राज्य सरकार की नीतियों की तुलना पड़ोसी राज्यों से करते हुए कहती हैं:
“ओडिशा में चले जाओ, भुवनेश्वर सरकार 30,000 रुपये महीना बांध के दे रही है. छत्तीसगढ़ दे रहा है, बिहार दे रहा है. 2024 बीता और अब 2026 आ गया, हम लोग को 2 भी नहीं मिला. गवर्नर हाउस जाने में सूखा 3,000 रुपये का तेल जलता है फोर व्हीलर में. वहां खाना खाओ, ताली बजाओ और फिर चले आओ. जमुना टुडू (2019 पद्मश्री) और चामी मुर्मू (2024 पद्मश्री) भी गई थीं, जमुना बोली—’जा दीदी, सरकार से बोल.’ हम बोले—हम नहीं जाएंगे भीख मांगने. हम बेटा पैदा किए हैं, निमक-रोटी खिलाएगा. रोज-रोज किसी का दरवाजा खटखटाना अच्छा नहीं है, उससे अच्छा सिला (स्वाभिमान से) मर जाना अच्छा है. पर जब गवर्नर के साथ सब प्रणाम कर रहा था, तब हम हेमंत सोरेन को बोले थे—’बेटा, हम लोग के ऊपर भी थोड़ा ध्यान देना.’ वो भी ‘हाँ-हाँ’ किया, पर मिला कुछ नहीं.”
वे राज्य में वयोवृद्धों की पेंशन व्यवस्था पर भी तल्ख टिप्पणी करती हैं:
“एक साल से उम्रदार लोगों का विडो पेंशन तक अटका हुआ है, सब पैसा मंईयां योजना में चला गया. सरकार सोचती है कि बुढ़िया लोग तो वोट देने जा नहीं सकेगी, जवान महिलाओं को देंगे तो वोट मिलेगा. घर-घर में यही लड़ाई है.”
अंधविश्वास की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका एक वाकया वे साझा करती हैं जब उन्होंने व्यवस्था के बड़े ओहदेदारों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था. चाईबासा में डायन कुप्रथा के खिलाफ प्रशासन के एक जागरूकता कार्यक्रम में जब एक वरिष्ठ अधिकारी ने भाषण के दौरान डायन होने की बात का सामान्य रूप से जिक्र किया, तो छूटनी महतो ने भरे मंच से सीधे सवाल दाग दिया:
“जब बोलने की मेरी बारी आई, तो हमने सीधे उस अफसर से पूछा—आप किसी को डायन कैसे पहचान लेते हैं? क्या किसी के कहने पर किसी औरत को डायन मान लेना ठीक है? अंधविश्वास सिर्फ अनपढ़ गांव वालों में नहीं है, ये पढ़े-लिखे अफसरों के दिमाग में भी बैठा हुआ है.”
आज की भूमिका और आगे की राह: ‘खादी भी है और खाकी भी’
सरायकेला के बीरबांस में स्थित अपने केंद्र में छूटनी महतो आज भी रविवार को चौपाल लगाती हैं. उनके बेटे अब पढ़-लिखकर कानूनी प्रक्रियाओं में अपनी मां का हाथ बंटाते हैं. उनके संघर्ष और जीवन पर एक फीचर फिल्म भी बनकर तैयार है, जो 2026 में पर्दे पर आने वाली है.
वे बताती हैं कि आज डायन प्रथा ने नया रूप ले लिया है—दहेज और घरेलू कलह का हथियार:
“अभी 2026 में पांच डायन केस आया मेरे पास. एक हफ्ता पहले एक लड़का आया था—मार्च में शादी किया और जून में लड़की को भगा दिया कि तू डायन है. असल बात क्या थी? लड़के का किसी और से चक्कर था और बाप-महतारी ने 2 लाख दहेज लेकर शादी करा दी थी. तुम बहू नहीं ले रहे हो, तुमको रुपया चाहिए! हमने साफ बोल दिया कि मानवाधिकार आयोग को चिट्ठी लिखेंगे.”
कानून के लचर क्रियान्वयन पर वे हाल की एक घटना का जिक्र करती हैं:
“अभी कुछ दिन पहले 27 तारीख को एक औरत को डायन बोलकर मारा-पीटा. थाना वाला बोला कि हमने धारा लगा दी है. अरे, कागजी धारा से क्या होता है? जब तक कानून कड़ा नहीं होगा और पुलिस तुरंत जेल नहीं भेजेगी, तब तक ये सब कैसे रुकेगा?”
अपनी औपचारिक पढ़ाई की कमी पर तंज कसने वालों को वे दो टूक जवाब देती हैं:
“हम स्कूल का मुंह नहीं देखे, तो क्या हुआ? राबड़ी देवी पढ़ी-लिखी थीं क्या? वो भी तो मुख्यमंत्री बनी थीं न! जब लालू जी जेल में थे, हम लोग पटना गांधी मैदान रैली में गए थे. हमारे पास अपने लोगों के लिए खादी भी है और कानून के लिए खाकी भी है. हम किसी से नहीं डरते.”
नई पीढ़ी और महिलाओं को उनका सीधा संदेश है कि डर के आगे घुटने मत टेको:
“मार खा के मत आओ, किसी पर हाथ भी मत उठाओ, लेकिन अन्याय सहो भी मत. आज हम ऐसी जगह बैठे हैं कि कोई हमको उठने नहीं कहेगा, और ऐसा तरीका से बात बोलेंगे कि कोई उसे झूठ नहीं कह सकेगा.”
छूटनी महतो का संघर्ष इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब एक शोषित महिला अपने स्वाभिमान को पहचान लेती है, तो वह पूरे समाज के ढोंग को हिलाने का माद्दा रखती है. उन्होंने साबित कर दिया कि व्यवस्था भले ही संवेदनहीन हो और कानून के हाथ कागज़ों तक सीमित रह जाएं, लेकिन यदि हौसले में ज़मीनी सच्चाई हो, तो एक अकेली मां सैकड़ों असहाय जिंदगियों की सबसे मजबूत अदालत बन सकती है.


