विजय उरांव, जोहार लाइव संवाददाता
पेड़ों को कटते देखकर हजारीबाग के खोलाम गांव की सुधा कुमारी (सुधा रानी के नाम से जानी जाती हैं) के मन में यही सवाल उठता था. वह उन पेड़ों का दर्द महसूस करती थीं, जो अपनी पीड़ा किसी से कह नहीं सकते. फिर उन्होंने तय किया कि वह अपनी आवाज के जरिए लोगों को जंगलों का महत्व समझाएंगी. सुधा ने पर्यावरण संरक्षण को अपने जीवन का हिस्सा बनाया और गीत गाकर पेड़ों को बचाने का संदेश देने लगीं. खोरठा और भोजपुरी के अलावा हिंदी में लिखे उनके गीत लोगों को प्रकृति के करीब आने और जंगलों की रक्षा करने की प्रेरणा देते हैं. दिन 7 अक्टूबर 1995 को शुरू हुआ उनका यह सफर आज भी जारी है.
सरकार ने जीवन यापन के लिए उन्हें जन वितरण प्रणाली का दुकान दे रखा है. इसके अलावा होलंग चौक पर ही एक छोटी सी गुमटी भी चलाती हैं, जिससे उनका घर चलता है.

लेकिन पेड़ों को बचाने के लिए आवाज उठाने वाली सुधा की अपनी जिंदगी भी आसान नहीं रही. बचपन में शारीरिक बनावट को लेकर लोगों के ताने, स्कूल में उपेक्षा, पिता को कम उम्र में खोने का दुख और फिर भाई व पति के निधन का दर्द. जिंदगी ने उन्हें कई बार तोड़ने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. जिस आवाज के सहारे वह जंगलों को बचाने की कोशिश करती हैं, उसी आवाज ने उन्हें मुश्किलों के बीच अपनी पहचान बनाए रखने की ताकत भी दी.
बचपन से ही संघर्ष, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी
हजारीबाग जिले के खोलाम गांव में पली-बढ़ीं सुधा कुमारी की पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल से शुरू हुई. सातवीं कक्षा तक उन्होंने गांव में पढ़ाई की. इसके बाद मैट्रिक की पढ़ाई होलांग हाई स्कूल से और इंटरमीडिएट की पढ़ाई झुमरा स्कूल से पूरी की. आगे की पढ़ाई के लिए वह हजारीबाग आईं और मार्खम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से स्नातक किया.
लेकिन पढ़ाई के इस सफर में उन्हें सिर्फ किताबों और परीक्षाओं का सामना नहीं करना पड़ा. लोगों की टिप्पणियों और व्यवहार ने भी उन्हें परेशान किया. उनकी लंबाई करीब साढ़े तीन फीट है. इसी वजह से स्कूल में कुछ बच्चे उन पर हंसते थे. वह बताती हैं कि ऐसे समय में एक कोने में बैठ जाती थीं, सिर नीचे कर लेती थीं और घर लौटकर रोती थीं.
कॉलेज में भी उन्हें अपनी शारीरिक बनावट को लेकर टिप्पणियां सुननी पड़ीं. कुछ लड़कियां उनके लंबे बालों को छूतीं और उनकी लंबाई पर टिप्पणी करती थीं. उन्हें बुरा लगता था और वह रोने लगती थीं.
एक दिन कॉलेज में एक लड़की ने यह सब देखा. उसने उन लोगों को डांटा और सुधा को अपने साथ एक कमरे में ले गई. वहां उसने सुधा से गाना गाने को कहा. सुधा ने ‘आंखें हैं भरी-भरी और तुम’ गीत गाया. उनकी आवाज सुनकर धीरे-धीरे वहां लोग जुटने लगे. लोगों ने उनके गाने की तारीफ की. गाते-गाते सुधा की आंखें भर आईं.
यह उनके जीवन का ऐसा अनुभव था, जिसमें लोगों के तानों के बीच उनकी आवाज को सराहना मिली. वह कहती हैं, “पढ़ाई करनी है भाई, तो फिर डर के क्यों रहूं.”
लोगों की बातें उन्हें आज भी याद हैं, लेकिन उन्होंने उन बातों को अपनी जिंदगी का फैसला नहीं बनने दिया. सुधा कहती हैं, “हार अगर मान जाऊंगी तो फिर कुछ नहीं कर पाऊंगी. इसलिए लोगों को जो कहना है, जो बोलना है, बोलते दो. मैं जो में लगी हूं, बस लगी रहती हूं.”
रेडियो से शुरू हुआ संगीत का सफर
सुधा को बचपन से ही गाने का शौक था. घर में रेडियो था, जिसे वह खूब सुनती थीं. रेडियो पर गीत सुनते-सुनते उनके भीतर भी गाने की इच्छा बढ़ती गई. स्कूल में होने वाले कार्यक्रमों में वह गाती थीं और उन्हें पुरस्कार भी मिलते थे.
सुधा बताती हैं कि बचपन में उनका एक गीत बीबीसी लंदन तक पहुंचा था. उनके मुताबिक, बीबीसी की टीम हजारीबाग में किसी कार्यक्रम के सिलसिले में आई थी. उस दौरान टीम ने उनका गीत रिकॉर्ड किया, जिसे बाद में बीबीसी लंदन पर प्रसारित किया गया. उस समय वह छठी या सातवीं कक्षा में पढ़ती थीं. आज भी रेडियो से उनका जुड़ाव बना हुआ है और वह रेडियो सुनती हैं.
संगीत उनके लिए सिर्फ शौक नहीं रहा. आगे चलकर यही उनकी बात कहने का जरिया बना. जब उन्होंने जंगलों को कटते देखा, तो लोगों को जागरूक करने के लिए भी इसी हुनर का सहारा लिया.
7 अक्टूबर 1995 को शुरू हुआ जंगल बचाने का सफर
सुधा बताती हैं कि 7 अक्टूबर 1995 को स्कूल की ओर से उन्हें दूधमटिया पर्यावरण मेले में ले जाया गया था. वहीं से पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनका जुड़ाव शुरू हुआ. इसके बाद वह हर साल कार्यक्रमों में भाग लेने लगीं और जंगल बचाने के प्रयासों से जुड़ी रहीं.
उनके मुताबिक, अक्टूबर 2026 तक इस काम से जुड़े हुए 31 साल हो चुके हैं.
जंगलों को बचाने की प्रेरणा उन्हें अपनी पढ़ाई और अपने अनुभवों से मिली. स्कूल में उन्होंने सीखा था कि पेड़-पौधों में भी जीवन होता है. लेकिन जब वह जंगल में लोगों को पेड़ काटते देखती थीं, तो उनके मन में सवाल उठता था कि आखिर पेड़ों को काटने का अधिकार इंसानों को किसने दिया.
वह कहती हैं, “हम एक लोटा या तो एक गिलास, एक मग पानी उस पेड़ पर नहीं डालते हैं. ना कभी हम उसे भोजन देते हैं. फिर हमें उसे काटने का क्या अधिकार है?”
सुधा के लिए पेड़ सिर्फ लकड़ी या किसी जमीन पर खड़े पौधे नहीं हैं. वे जीवन का हिस्सा हैं. उन्हें लगता है कि पेड़ अपनी पीड़ा बोलकर नहीं बता सकते, इसलिए इंसानों को उनकी अहमियत समझनी चाहिए और उनकी रक्षा करनी चाहिए.
भाषण नहीं, गीतों से समझाती हैं जंगल का महत्व
सुधा की सबसे अलग बात यह है कि वह पर्यावरण संरक्षण का संदेश गाकर देती हैं. वह खोरठा और भोजपुरी में गीत लिखती हैं और गाती हैं. उनका मानना है कि गीतों के जरिए कही गई बात लोगों के दिल तक पहुंचती है.
वह कहती हैं, “लोगों को गीतों के माध्यम से बताइए, तो ज्यादा असर होता है.”
सुधा खोरठा गायक सुरेंद्र प्रसाद सिंह के साथ गांव-गांव जाती हैं. वहां लोगों को जंगलों के महत्व के बारे में बताती हैं और अपने गीतों के जरिए उन्हें पेड़ों की रक्षा के लिए प्रेरित करती हैं.
उनके खोरठा गीत की पंक्तियां हैं:
“जंगल बिनु मनवा नाई लागे रामा,
जंगल बिनु मनवा नाई लागे रामा.
बोना रे बिनु, बोना रे बिनु,
मनवा नाई लागे रामा. बोना रे बिनु,
बोना रे बिनु, मनवा नाई लागे रामा,
बोना रे बिनु. मनवा नाई लागे रामा.
बाग हिरण बिनु, बनवुन सोगे.
बाग हिरण बिनु, बनवुन सोगे.
बाग हिरण बिनु, बाग हिरण बिनु.
बनवुन सोगे, कुयेल बिनु, बनवाना सोभे रामा, कुयेल बिनु.
बनवाना सोभे रामा, कुयेल बिनु, बनवाना सोभे रामा, जंगल बिनु.
मनवा नाई लागे रामा, जंगल बिनु मनवा नाई लागे रामा.”
इन पंक्तियों में जंगल के बिना जीवन के अधूरेपन की बात है. जंगल उजड़ेंगे, तो वहां रहने वाले जीव-जंतुओं का बसेरा भी खत्म होगा. प्रकृति की सुंदरता और जीवन का संतुलन भी प्रभावित होगा.
भोजपुरी में भी सुधा जंगलों के उजड़ने का दर्द अपने गीतों में बयां करती हैं:
“कैसे बचते हमर परनवा, बनवुआ उजरल जाला.
कैसे बचते हमर परनवा, बनवुआ उजरल जाला.
उजरल जाला, नार बनवुआ, उजरल जाला, नार बनवुआ, उजरल जाला.
कैसे बचते हमर परनवा, बनवुआ उजरल जाला.
पड़ काट के खेत बनवली, समज के अपनी शान.
घरवा बनवली, दुवरियो बनवली, घेरली अपनी बगान.
कइसन कैली, अपन करमवा, कइसन कैली, अपन करमवा, धनवा लुटल जाला ना.
कि धनवा लुटल जाला ना, कैसे बचते हमर परनवा, बनवुआ उजरल जाला.”
उनके गीतों में पेड़ों की कटाई और जंगलों के खत्म होने की चिंता है. वह चाहती हैं कि लोग समझें कि जंगलों को नुकसान पहुंचाना अंततः इंसानों और आने वाली पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित करता है.
सुधा बताती हैं कि उन्होंने कई गीत लिखे हैं, लेकिन अब तक उनकी कोई किताब प्रकाशित नहीं हुई है और न ही कोई एल्बम बना है. उनके गीत उनकी डायरी में दर्ज हैं. फिलहाल वह इन्हीं गीतों को गाकर लोगों तक अपना संदेश पहुंचाती हैं.
पेड़ों की रक्षा में महिलाओं की भूमिका
सुधा के मुताबिक, जंगल बचाने के प्रयासों में महिलाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. कई जगहों पर महिलाएं पेड़ों को राखी बांधकर उनकी रक्षा का संकल्प लेती हैं. इसका मकसद लोगों को यह समझाना है कि जंगलों की रक्षा करना सबकी जिम्मेदारी है.
वह बताती हैं कि जिन जंगलों की रक्षा के लिए लोग संकल्प लेते हैं, वहां अगर कोई लकड़ी काटता हुआ दिखाई देता है, तो उसे समझाने की कोशिश की जाती है. कुछ मामलों में जुर्माना भी लगाया जाता है.
सुधा के लिए पर्यावरण संरक्षण सिर्फ पेड़ों की कटाई रोकने तक सीमित नहीं है. यह प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने का सवाल भी है.
इसी काम के लिए उन्हें दूधमटिया पर्यावरण मेले में सम्मानित किया गया. उन्हें एक शील्ड मिली, जिस पर दूधमटिया पर्यावरण मेला लिखा हुआ है. यह सम्मान उनके पर्यावरण संरक्षण के लंबे सफर की एक अहम याद है.
पिता को बचपन में खोया, फिर भाई और पति का साथ भी छूटा
सुधा की कहानी में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ निजी जिंदगी के संघर्ष भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. उनके पिता ईश्वर लाल का निधन तब हो गया था, जब वह छोटी थीं. उनकी मां का नाम मोसमात सीता है. परिवार में चार भाई और तीन बहनें हैं.
उनके भाई दिनेश कुमार कथारा में शिक्षक थे. वर्ष 2024 में एक दुर्घटना में उनका निधन हो गया. उनके तीन अन्य भाई बजरंगी लाल, विनय लाल और श्याम सुंदर लाल हैं. श्याम सुंदर लाल रांची में रहते हैं. उनकी दोनों बड़ी बहनों की शादी हो चुकी है. एक बहन रांची के पहाड़ी इलाके के पास रहती हैं और दूसरी बोकारो स्टील सिटी में रहती हैं. सुधा परिवार की सबसे छोटी बहन हैं.
निजी जीवन में भी उन्हें एक बड़ा झटका लगा. वर्ष 2018 में फेसबुक के जरिए उनकी एक व्यक्ति से दोस्ती हुई. बाद में वह उनसे मिलने आए और दोनों ने शादी कर ली. लेकिन वर्ष 2024 में एक दुर्घटना में उनके पति का निधन हो गया.
एक तरफ भाई को खोने का दुख और दूसरी तरफ पति के निधन का दर्द. इन घटनाओं ने सुधा की जिंदगी को और कठिन बना दिया. लेकिन इन मुश्किलों के बीच भी उन्होंने अपना काम नहीं छोड़ा. वह आज भी गीतों और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों से जुड़ी हुई हैं.
अपनी तकलीफों से घबराना नहीं चाहतीं सुधा
सुधा की जिंदगी में मुश्किलें एक के बाद एक आती रहीं. बचपन में लोगों के ताने, पढ़ाई के दौरान उपेक्षा, पिता को कम उम्र में खोना और फिर भाई व पति का निधन. लेकिन वह मानती हैं कि तकलीफों से घबराकर हार मान लेना कोई रास्ता नहीं है.
वह कहती हैं, “अपनी तकलीफों से इंसान को घबराना नहीं चाहिए. हौसले को हमेशा बुलंद रखें.”
अपनी बात को वह इन पंक्तियों में कहती हैं:
“हौसले बुलंद हो तो कोई गम नहीं,
अगर कोई ज्यादा है तो हम भी किसी से कम नहीं.”
सुधा का यह संदेश उनके अपने जीवन के अनुभवों से निकला है. उन्होंने लोगों के ताने सुने, अपनों को खोया और कई मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया. लेकिन उन्होंने अपनी पहचान को इन परिस्थितियों तक सीमित नहीं होने दिया.
आज वह चाहती हैं कि लोग जंगलों को बचाने के लिए आगे आएं. उनका संदेश है, “जंगल बचाने का काम करें और जहां तक हो सके जंगल की कटाई ना करें और जंगल को बचाएं सभी मिलजुल के.”
खोलाम गांव की सुधा कुमारी की कहानी पर्यावरण संरक्षण की एक ऐसी पहल है, जिसमें उनकी आवाज सबसे बड़ा माध्यम है. वह उन पेड़ों के लिए गाती हैं, जो खुद बोल नहीं सकते. और शायद यही उनकी कहानी की सबसे खास बात है कि अपनी जिंदगी में तमाम मुश्किलों का सामना करने के बाद भी उन्होंने अपनी आवाज को खामोश नहीं होने दिया. उन्होंने उसी आवाज को जंगल बचाने के संदेश में बदल दिया.
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