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    Home»झारखंड»लकवाग्रस्त मरीजों के लिए उम्मीद की किरण : कोडरमा के इंजीनियर कुणाल का इनोवेशन बना देश का सर्वश्रेष्ठ प्रोजेक्ट
    झारखंड

    लकवाग्रस्त मरीजों के लिए उम्मीद की किरण : कोडरमा के इंजीनियर कुणाल का इनोवेशन बना देश का सर्वश्रेष्ठ प्रोजेक्ट

    Team JoharBy Team JoharFebruary 20, 2026Updated:February 20, 2026No Comments3 Mins Read3
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    झारखंड
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    Koderma : झारखंड के कोडरमा जिले के झुमरी तिलैया के रहने वाले युवा मैकेनिकल इंजीनियर कुणाल अम्बष्टा ने ऐसा कमाल कर दिखाया है, जिस पर पूरे राज्य को गर्व है। उनके ‘काया-न्यूरोसिंक’ प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय स्तर पर पहला पुरस्कार मिला है। नई दिल्ली में आयोजित एक बड़े इनोवेशन महोत्सव में उनका प्रोजेक्ट देशभर के टॉप 16 प्रोजेक्ट्स में सबसे बेहतर चुना गया।

    नई दिल्ली में मिला राष्ट्रीय सम्मान

    नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) मुख्यालय में आयोजित “स्वदेशी उद्यमी और इनोवेटर्स महोत्सव-2026” में कुणाल के इस प्रोजेक्ट को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन इग्नू के नेशनल सेंटर फॉर इनोवेशन इन डिस्टेंस एजुकेशन और स्कूल ऑफ कंप्यूटर एंड इंफॉर्मेशन साइंस ने मिलकर किया था। देशभर से चुने गए 16 बेहतरीन प्रोजेक्ट्स के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा थी, लेकिन ‘काया-न्यूरोसिंक’ ने सबको पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया। यह उपलब्धि सिर्फ कुणाल के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे झारखंड के लिए गर्व की बात है।

    क्या है ‘काया-न्यूरोसिंक’?

    कुणाल बताते हैं कि ‘काया-न्यूरोसिंक’ एक ओपन-सोर्स हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर आधारित एडवांस्ड ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) सिस्टम है। आसान भाषा में समझें तो यह ऐसी तकनीक है, जो इंसान के दिमाग की तरंगों और आंखों की हलचल को पढ़कर मशीनों को कंट्रोल कर सकती है। यानी अगर कोई व्यक्ति बोल नहीं सकता या शरीर हिला नहीं सकता, तब भी वह सिर्फ अपने दिमाग और आंखों की मदद से व्हीलचेयर, रोबोटिक आर्म या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चला सकता है।

    लकवाग्रस्त मरीजों के लिए उम्मीद

    यह तकनीक खास तौर पर उन लोगों के लिए बेहद फायदेमंद है, जो पूरी तरह लकवाग्रस्त हैं या किसी गंभीर शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे हैं। ऐसे मरीज अक्सर दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। ‘काया-न्यूरोसिंक’ उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है। डिवाइस शरीर के बायो-पोटेंशियल सिग्नल्स—जैसे ब्रेन वेव्स और आई मूवमेंट—को पढ़ता है और बिना किसी शारीरिक स्पर्श के कमांड को मशीन तक पहुंचाता है।

    कम लागत में अत्याधुनिक समाधान

    कुणाल का कहना है कि विदेशी मेडिकल उपकरणों की कीमत कई बार करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है, जिससे आम लोगों के लिए उनका इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाता है। ‘काया-न्यूरोसिंक’ को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह कम लागत में अत्याधुनिक सुविधा उपलब्ध कराए। उनका लक्ष्य है कि यह तकनीक ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे और भारत में ही सस्ती और प्रभावी मेडिकल टेक्नोलॉजी विकसित हो।

    कैसे शुरू हुआ सफर?

    इस प्रोजेक्ट की नींव नीति आयोग की कम्युनिटी इनोवेटर फेलोशिप के दौरान रखी गई थी। उस समय कुणाल को भारतीय खनि विद्यालय धनबाद (आईएसएम धनबाद) से मार्गदर्शन मिला। सबसे खास बात यह है कि उन्होंने अपने रिसर्च की फंडिंग अपनी पॉकेट मनी और अलग-अलग हैकाथॉन में जीती गई पुरस्कार राशि से की। यानी सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने जुनून और मेहनत के दम पर यह मुकाम हासिल किया।

    युवाओं के लिए मिसाल

    कुणाल अम्बष्टा की यह उपलब्धि बताती है कि अगर सोच बड़ी हो और इरादे मजबूत हों, तो छोटे शहर से निकलकर भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है। उनका ‘काया-न्यूरोसिंक’ प्रोजेक्ट न सिर्फ टेक्नोलॉजी की दुनिया में नई दिशा दे रहा है, बल्कि हजारों जरूरतमंद लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण भी बन सकता है।

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