रांची: राज्यसभा सांसद महुआ माझी ने कहा कि पांचवीं अनुसूची को केवल कानून के दायरे में देखने के बजाय इतिहास, सामाजिक न्याय और राजनीतिक इच्छाशक्ति के नजरिये से समझने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में परंपराओं और सामुदायिक सत्ता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. यहां औद्योगिक विकास से पहले सह-अस्तित्व की संस्कृति रही है.
महुआ माझी शनिवार, 10 अक्टूबर को रांची प्रेस क्लब सभागार में जनवादी लेखक संघ की ओर से आयोजित कार्यक्रम में बोल रही थीं. कार्यक्रम में लेखक सुधीर पाल की पांचवीं अनुसूची, पेसा और जनजातीय अधिकारों से संबंधित चार पुस्तकों का लोकार्पण किया गया. उन्होंने सुधीर पाल के लेखन की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी किताबें झारखंड की सामाजिक, सांस्कृतिक और सरोकार की राजनीति को समझने में मददगार साबित होंगी. उन्होंने पाँचवीं अनुसूची आदिवासियों-मूलवासियों की संवैधानिक रक्षा का कवच बताया.
वहीं इतिहास के सेवानिवृत्त प्राध्यापक और लेखक डॉ. एलएन राणा ने कहा कि ये किताबें झारखंड के इतिहास, समाज, समुदाय और उनके संघर्षों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती हैं. इनके माध्यम से औपनिवेशिक राजनीति को भी समझा जा सकता है. उन्होंने कहा कि सुधीर पाल ने बताया है कि किस तरह समय, राजनीति और आर्थिक स्वार्थों के गठबंधन ने इस क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया है. वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि कुमार बृजेन्द्र ने सत्र की अध्यक्षता करते हुए इन पुस्तकों को वर्तमान समय की जरूरत बताया. सत्र का संचालन अपराजिता ने किया.
ग्रामसभा की सर्वोच्चता और पेसा कानून पर चर्चा
‘झारखंड में पेसा: परंपरा, पंचायत और जवाबदेही’ पुस्तक पर चर्चा करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखिका दयामनी बारला ने कहा कि राज्य में पेसा लागू होने के बाद संसाधनों पर मालिकाना हक और उनके प्रबंधन की लड़ाई को बल मिला है. उन्होंने कहा कि यह किताब आदिवासी क्षेत्रों में ग्रामसभा की सर्वोच्चता को सशक्तीकरण के माध्यम के रूप में स्थापित करती है.
नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के व्याख्याता रामचंद्र उरांव ने कहा कि पुस्तक में बार-बार यह स्पष्ट होता है कि टकराव परंपरा और आधुनिकता के बीच नहीं, बल्कि केंद्रीकृत सत्ता और सामुदायिक स्वशासन के बीच है. यह उस विकास मॉडल का टकराव है, जो स्थानीय समाज को साझेदार के बजाय बाधा मानता है. सत्र की अध्यक्षता लेखिका डॉ. किरण ने की और संचालन आलम आरा ने किया.
‘पांचवीं अनुसूची: परंपराओं का गणराज्य’ पुस्तक पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रश्मि कात्यायन ने कहा कि सुधीर पाल की यह किताब पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों को केवल कानून के दायरे में देखने के बजाय इतिहास, सामाजिक न्याय और राजनीतिक इच्छाशक्ति के व्यापक संदर्भ में समझने का नजरिया विकसित करती है.
साहित्यकार रणेंद्र ने कहा कि यह किताब किस्से-कहानियों के माध्यम से उन जमीनी हकीकतों से रूबरू कराती है, जहां राजनीति और कॉरपोरेट गठजोड़ के कारण संविधान और कानून को दिखावे का जरिया बना दिया जाता है. डॉ. जेपी गुप्ता ने कहा कि विडंबना है कि सात दशक बाद भी आम लोगों के लिए पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों को समग्रता में समझने वाली किताबों की कमी रही है. यह पुस्तक उस कमी को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण है. इस सत्र का संचालन अशरफ ने किया.
आंतरिक उपनिवेशवाद और आदिवासी प्रश्न पर विमर्श
‘आंतरिक उपनिवेश और आदिवासी प्रश्न’ पुस्तक पर चर्चा करते हुए साहित्यकार महादेव टोप्पो ने कहा कि संकलित लेखों में यह स्पष्ट होता है कि टकराव परंपरा और आधुनिकता के बीच नहीं, बल्कि केंद्रीकृत सत्ता और सामुदायिक स्वशासन के बीच है. उन्होंने शासन-प्रशासन की भाषा क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं में करने की वकालत की.
शिक्षाविद् एवं लेखक डॉ. मिथिलेश ने कहा कि आंतरिक उपनिवेशवाद ऐसी व्यवस्था की कहानी है, जिसमें राष्ट्र-राज्य अपने ही नागरिकों के एक बड़े हिस्से के साथ उपनिवेश जैसा व्यवहार करता है. उन्होंने कहा कि उपनिवेशवाद से पहले दानवीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है. सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. विनोद कुमार ने औपनिवेशिक मानसिकता को समाप्त करने की जरूरत बताई. सत्र का संचालन यासमीन लाल ने किया.
कार्यक्रम के दौरान आयोजित कवि गोष्ठी में आधे दर्जन से अधिक जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के कवियों ने जन सरोकारों से जुड़ी रचनाएं प्रस्तुत कीं. इनमें डॉ. अशरफ अली, प्रियंका उरांव, यासमीन लाल, सत्यनारायण मुंडा, सालों उरांव, दिव्या मुर्मू, रीता सोरेंग, महावीर उरांव, मनीषा बोदरा और शिवशंकर उरांव शामिल थे. सत्र का संचालन विकी मिंज और सुकेशी कर्मकार ने किया.
मौके पर जनवादी लेखक संघ के एमजेड खान, आलम आरा, यासमीन लाल, सुकेशी कर्मकार, विकी मिंज सहित अन्य सदस्य मौजुद थे.

