आजादी के तुरंत बाद का दौर भारत में बंटवारे, विस्थापन और एक नए राष्ट्र के निर्माण की भारी उथल-पुथल से गुजर रहा था. इसी दौर में छोटानागपुर के इतिहास से जुड़ा एक ऐसा दिलचस्प अध्याय सामने आता है, जो आज की राजनीतिक कहानी का एक कम चर्चित हिस्सा है.
यह कहानी है 29 सितंबर 1947 की, जब ‘छोटानागपुर मोमिन यूनियन’ ने एक हिंदी पर्चा जारी कर मोमिन समुदाय से अलग झारखंड प्रांत की मांग को मजबूत करने की जोरदार अपील की थी. शोधकर्ता काथिंका सिन्हा-केरखॉफ और उनके सहयोगियों के अध्ययन में इस पर्चे का विशेष उल्लेख मिलता है, जिसे हाजी हनीफ अंसारी ने दिखाया था.
रहने की जगह नहीं, अपना घर है
पर्चे पर छोटा नागपुर मोमिन यूनियन के महासचिव शेख मोहिउद्दीन का नाम दर्ज था. उन्होंने समुदाय के लोगों को याद दिलाया कि छोटानागपुर और संथाल परगना में रहने वाले मोमिनों का इस इलाके से पुराना रिश्ता है और यह उनके लिए सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि उनका अपना घर है.
पर्चे में इस बात पर जोर दिया गया कि यहाँ रहने वाले मोमिनों के आदिवासी और दूसरे हिंदू समुदायों के साथ पुराने सामाजिक और व्यावसायिक संबंध हैं. इसलिए, अलग झारखंड की मांग को सिर्फ आदिवासियों की मांग मानकर उससे अलग रहने के बजाय, मोमिनों को भी इसमें खुलकर शामिल होना चाहिए.
उस समय झारखंड की कल्पना केवल एक अलग प्रशासनिक इकाई बनाने तक सीमित नहीं थी. पर्चे में यह तर्क दिया गया था कि अगर अलग झारखंड प्रांत बनता है, तो यहाँ से मिलने वाला राजस्व सीधे इसी क्षेत्र के लोगों के विकास पर खर्च हो सकेगा.
इसके अलावा, प्रशासन में आदिवासियों, हिंदुओं और मोमिनों की संयुक्त भागीदारी की कल्पना भी रखी गई थी, यानी झारखंड को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में देखा गया था जहाँ अलग-अलग समुदाय मिलकर प्रशासन और विकास की जिम्मेदारी संभालेंगे.
इस पुराने पर्चे की सबसे खास बातों में से एक इसका आर्थिक तर्क था. मोमिन समुदाय के बहुत से लोग बुनकरी से जुड़े थे और आदिवासी समुदाय पारंपरिक रूप से मोमिनों के हाथ से बुने कपड़े पहनता था. यह अपील केवल धर्म या राजनीति के आधार पर नहीं थी, बल्कि इसमें रोजमर्रा की जिंदगी, कारोबार और साझा सामाजिक रिश्तों को आधार बनाया गया था.
झारखंड आंदोलन का इतिहास आम तौर पर आदिवासी महासभा, जयपाल सिंह मुंडा और बाद में झारखंड पार्टी की राजनीति से जोड़ा जाता है. लेकिन 1947 का यह दस्तावेज यह साबित करता है कि उस समय अलग झारखंड की कल्पना को लेकर गैर-आदिवासी समुदायों के भीतर भी गंभीर राजनीतिक बहस चल रही थी. देश को आजाद हुए अभी डेढ़ महीना ही हुआ था और विभाजन के कारण धार्मिक तनाव चरम पर था, ऐसे में यह पर्चा स्थानीय पहचान, जमीन और क्षेत्रीय हितों को आधार बनाकर झारखंड की मांग का समर्थन कर रहा था.
जयपाल के आंदोलन से सभी मोमिनों की सहमति नहीं थी
यह मोमिन यूनियन अचानक नहीं बनी थी. बिहार स्टेट आर्काइव्स में 1947 की फाइल नंबर 270(3)/1947 का शीर्षक ही है- ‘Formation of Jharkhand Momin Union to work for the separation of Jharkhand’. रांची में 1946-47 के दौरान गठित इस संगठन की गतिविधियाँ मुख्य रूप से रांची तक सीमित थीं.
हालांकि, यह भी सच है कि पूरा मोमिन समुदाय एकमत नहीं था. बिहार स्टेट आर्काइव्स की अन्य फाइलों से पता चलता है कि अब्बास और रहीम बख्श जैसे मोमिन यूनियन से जुड़े कुछ अन्य नेताओं की राजनीतिक भूमिका अलग थी, जिन्होंने आदिवासियों से जयपाल सिंह के नेतृत्व वाले आंदोलन से अलग होकर कांग्रेस के साथ जाने की अपील की थी. इससे साफ है कि उस दौर में समुदाय के भीतर भी राजनीतिक राय बंटी हुई थी.
साझा विरासत और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
झारखंड राज्य के गठन और उसके लंबे राजनीतिक इतिहास में मुस्लिम समुदाय की भूमिका बेहद अहम रही है, हालांकि मुख्यधारा के इतिहास में इसे अक्सर कम जगह मिली है. अफसार अली द्वारा प्रस्तुत विवरण के अनुसार, इस क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय का आगमन सदियों पुराना है. लगभग 800 साल पहले इस क्षेत्र में आए मुस्लिम समुदाय के लोग स्थानीय मुंडाओं और अन्य निवासियों के साथ इस प्रकार घुल-मिल गए कि उन्होंने अपनी साझा संस्कृति और परंपराओं को आपस में आत्मसात कर लिया. फादर हॉफमैन के अनुसार, यहाँ की स्थानीय भाषाओं में अरबी और फारसी के कई शब्दों का समावेश भी इसी गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक मेल-जोल को दर्शाता है.
झारखंड को एक अलग राज्य बनाने की वैचारिक और राजनीतिक माँग की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी. वर्ष 1912 में जब बिहार को बंगाल से अलग किया गया, तब अस्मत अली पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने यह आशंका जताई थी कि इस प्रशासनिक बदलाव से झारखंड क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान खतरे में पड़ सकती है. इसी चिंता के तहत उन्होंने सबसे पहले 1912 में अलग झारखंड राज्य की माँग उठाई थी. इसके बाद 1919 में चिराग अली ने इस माँग को और अधिक मजबूती प्रदान की.
समय के साथ इस आंदोलन में राजनीतिक संगठनों की सक्रियता भी बढ़ी. वर्ष 1923 में मुरमा (रांची) में मोमिन कॉन्फ्रेंस का गठन हुआ, जिसका उद्देश्य क्षेत्र की संस्कृति को बचाना और बुनकर समुदाय को ब्रिटिश अत्याचारों से राहत दिलाना था. इसके बाद 1936 में मोमिन कॉन्फ्रेंस ने आधिकारिक रूप से अलग झारखंड राज्य के गठन के लिए प्रस्ताव पारित कर दिया. 1937 के चुनावों में मोमिन कॉन्फ्रेंस के आर. अली ने मुस्लिम लीग के उम्मीदवार को हराकर यह साबित कर दिया था कि समुदाय स्थानीय क्षेत्रीय मुद्दों पर बेहद सक्रिय है. वहीं, 1946 में भी मोमिन कॉन्फ्रेंस ने मुस्लिम लीग के चुनाव अभियान को करारी शिकस्त दी थी.
आजादी के बाद भी यह सहयोग और संघर्ष लगातार जारी रहा. ढब्ले उरांव द्वारा ‘आदिवासी प्रोग्रेसिव सोसायटी’ के गठन के बाद मोमिन कॉन्फ्रेंस ने क्षेत्र के निवासियों के कल्याण के लिए आवाज उठाई. हाजी इमाम अली, नजारत हुसैन, अब्दुल्ला सरदार, फरजंद अली, शेख अली जान और मौलवी दुखु मियाँ जैसे नेता आदिवासी समाज के साथ मिलकर अपनी पुरानी संस्कृति और अस्मिता को बचाने के लिए सक्रिय रूप से जुड़े रहे. मोमिन कॉन्फ्रेंस ने झारखंड आंदोलन के दौरान मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा का समर्थन किया. 6 जुलाई 1990 को रांची में ऑल-इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस कमेटी ने झारखंड राज्य के गठन के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया और 7 जुलाई 1990 को झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के साथ समझौता किया.
झारखंड कौमी तहरीक और युवाओं की भूमिका
इस आंदोलन के अंतिम चरणों में ‘झारखंड कौमी तहरीक’ (JQT) और ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (AJSU) के बीच का संयुक्त संघर्ष भी मील का पत्थर साबित हुआ. 23 जुलाई 1989 को रांची विश्वविद्यालय परिसर में झारखंड कौमी तहरीक का पहला सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसके अध्यक्ष प्रोफेसर खालिद अहमद और सचिव आफताब जमील चुने गए. JQT ने AJSU के साथ कंधे से कंधा मिलाकर झारखंड आंदोलन को गति दी.
इस संगठन ने आंदोलन के दौरान धार्मिक अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और मूलवासियों के लिए उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा, तकनीकी संस्थानों और सरकारी सेवाओं में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण, तथा अल्पसंख्यक आयोग व मदरसा बोर्ड के गठन की स्पष्ट माँग रखी. इस दौरान मोहम्मद फैजी, सरफराज अहमद, मुश्ताक अहमद, इमरान अंसारी, मुजीबुर रहमान और मोहम्मद साजिद सहित तमाम युवाओं ने AJSU के बैनर तले इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और कई बार लाठियाँ खाईं तथा जेल गए. इस प्रकार, झारखंड के निर्माण और उसकी राजनीतिक चेतना के विकास में मुस्लिम समुदाय का यह योगदान इतिहास का एक महत्वपूर्ण और अभिन्न हिस्सा रहा है.
वर्ष 2000 में भले ही झारखंड एक अलग राज्य के रूप में वजूद में आया, लेकिन 29 सितंबर 1947 का यह छोटा-सा पर्चा इस बात का गवाह है कि इस क्षेत्रीय आकांक्षा की जड़ें आजादी के ठीक बाद से ही कितनी गहरी और विविध थीं.
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