सोनिया गांधी की किताब के भारत में प्रकाशन को लेकर जारी विवाद के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार अरुण शौरी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है. एक इंटरव्यू में अरुण शौरी ने कहा कि भारत अब लोकतंत्र नहीं रहा है, बल्कि एक ‘Elected Autocracy’ यानी निर्वाचित निरंकुश व्यवस्था बन गया है.
पेंगुइन द्वारा सोनिया गांधी की किताब प्रकाशित नहीं करने के मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अरुण शौरी ने कहा कि प्रकाशक के पास सिर्फ किताबें ही नहीं, बल्कि रीढ़ की हड्डी भी होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि देश में लगातार हो रही घटनाएं यह संकेत देती हैं कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और अभिव्यक्ति की आजादी पर दबाव बढ़ रहा है.
अब खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहना ठीक नहीं
अरुण शौरी ने इंटरव्यू में कहा कि अब भारत को खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहना उचित नहीं है. उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि हमें अब खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते रहना चाहिए. हम अब लोकतंत्र नहीं हैं. हम अब एक Elected Autocracy बन गए हैं.
शौरी ने आरोप लगाया कि देश में एक सीमित समूह सत्ता पर नियंत्रण बनाए हुए है और मौजूदा दौर की कई घटनाएं इसकी ओर इशारा करती हैं. अरुण शौरी ने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि ‘गोदी मीडिया’ भी मौजूदा व्यवस्था का एक लक्षण है. उनके मुताबिक, हर दिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जो यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था पहले की तरह काम कर रही है.
सोनिया गांधी की किताब को लेकर अरुण शौरी ने सरकार की कथित बेचैनी पर तंज कसा. उन्होंने कहा कि आखिर एक किताब में कुछ लेखांश (passages) होने से सरकार को इतनी चिंता क्यों है. उन्होंने कहा कि अरे, एक किताब आएगी, उसमें कुछ पेसेजेस (लेखांश) होंगे. भारत में कितने लोग 500 पन्नों की किताब पढ़ते हैं? फिर भी सरकार उसे लेकर नर्वस है.
यह 56 इंच की नहीं, कमजोर सरकार का संकेत
अरुण शौरी ने कहा कि किताब को लेकर सरकार की कथित घबराहट उसकी ताकत नहीं, बल्कि कमजोरी को दिखाती है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘56 इंच’ वाले राजनीतिक संदर्भ पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी सरकार को बार-बार अपनी ऑथोरिटी स्थापित करने की जरूरत पड़ रही है तो यह मजबूत सरकार का संकेत नहीं है.
उन्होंने कहा कि यह 56 इंच की मजबूत सरकार का संकेत नहीं है, बल्कि एक कमजोर और नर्वस सरकार का संकेत है, जो बार-बार अपना अधिकार स्थापित करना चाहती है.
सोनिया गांधी की किताब के प्रकाशन को लेकर चल रहे विवाद के बीच अरुण शौरी के इस बयान ने देश में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सत्ता की आलोचना को लेकर बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है.
बता दें, अरुण शौरी भारत के वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, अर्थशास्त्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं. वह अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे और उन्होंने विनिवेश, वाणिज्य एवं उद्योग, संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली. एक अर्थशास्त्री के तौर पर उन्होंने एक दशक वर्ल्ड बैंक में काम किया.
यहां तक कि वे तीसरे भारतीय प्लानिंग कमीशन (1972-74) में सलाहकार के तौर रहे. वे कई चर्चित किताबों के लेखक भी हैं जिनमें वर्शिपिंग फाल्स गोड, द वर्ल्ड ऑप फतवा, मिशनरिज इन इंडिया, कोर्ट्स एंड देयर जजमेंट आदि शामिल है. आपातकाल के दौरान उन्होंने पत्रकार के तौर पर इंडियन एक्सप्रेस में काम किया. इसके अलावा वे सत्ता पर खुलकर राय रखने के लिए जाने जाते हैं.

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