करीब चार दशक तक सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बने रहे भाकपा (माओवादी) के शीर्ष नेता और पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा उर्फ सागर दा उर्फ भाष्कर दा उर्फ सुनिर्मल दा उर्फ प्रधान दा और उसके साथी मोछू और सौरभ को गिरफ्तार कर लिया गया है. झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए इसे बड़ी सफलता माना जा रहा है.
सूत्रों के अनुसार, करीब दो माह पहले झारखंड पुलिस और इंटेलिजेंस ब्यूरो ने मध्यस्थों के जरिए मिसिर बेसरा तक सरेंडर का संदेश पहुंचाया था. सूत्रों का दावा है कि उस समय मिसिर बेसरा ने साफ शब्दों में कहा था, “मर जाऊंगा, लेकिन सरेंडर नहीं करूंगा.”
सरेंडर से इनकार के दो माह भी पूरे नहीं हुए थे कि झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई में मिसिर बेसरा अपने साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस के अनुसार वह संगठन का पोलित ब्यूरो सदस्य, केंद्रीय कमेटी सदस्य, केंद्रीय मिलिट्री कमिशन सदस्य तथा ईस्टर्न रिजनल ब्यूरो सदस्य था. करीब चार दशक तक उसने झारखंड के कोल्हान और सारंडा क्षेत्र में माओवादी संगठन की रणनीति तैयार करने, कैडर विस्तार और सैन्य गतिविधियों के संचालन में अहम भूमिका निभाई. पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार उसके खिलाफ वर्ष 2010 से 2026 के बीच झारखंड के विभिन्न थाना क्षेत्रों में 141 आपराधिक मामले दर्ज हैं.
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यह गिरफ्तारी माओवादी संगठन के लिए बड़ा झटका है. जांच अधिकारियों को उम्मीद है कि पूछताछ में संगठन के शीर्ष नेतृत्व, हथियार आपूर्ति, लेवी नेटवर्क, वित्तीय स्रोत और विभिन्न राज्यों में सक्रिय कैडरों से जुड़ी कई अहम जानकारियां सामने आ सकती हैं.
छात्र राजनीति से माओवादी पोलित ब्यूरो तक का सफर
पुलिस दस्तावेजों के अनुसार मिसिर बेसरा झारखंड के गिरिडीह जिले के पीड़टांड़ थाना क्षेत्र के मदनाडीह गांव का निवासी है. उसके पिता का नाम स्वर्गीय दर्पण बेसरा और माता का नाम रसोमति देवी है. उसने स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की और हिंदी, संथाली तथा हो भाषा पर अच्छी पकड़ रखता है.
दस्तावेजों के अनुसार छात्र जीवन में ही वह तत्कालीन माओवादी संगठन एमसीसी की विचारधारा से प्रभावित हुआ. वर्ष 1985 में धनबाद के सिंदरी में आयोजित ऑल इंडिया लीग फॉर रिवोल्यूशनरी कल्चर के दूसरे राष्ट्रीय सम्मेलन में उसने वालंटियर के रूप में काम किया. वहीं उसकी मुलाकात एमसीसी के वरिष्ठ नेता प्रशांत बोस उर्फ किशन दा से हुई. वर्ष 1986 में सोवन मरांडी ने उसे संगठन की प्राथमिक सदस्यता दिलाई और यहीं से उसका भूमिगत जीवन शुरू हुआ.
वर्ष 1990 में संगठन ने उसे कोलकाता भेजा, जहां उसने प्रेस और प्रचार-प्रसार का काम संभाला. दो वर्ष बाद वह झारखंड लौटा और रांची सहित आसपास के क्षेत्रों में संगठन के विस्तार में जुट गया. वर्ष 2003 में वह केंद्रीय कमेटी का सदस्य बना और 2004 में एमसीसी तथा पीपुल्स वार ग्रुप के विलय के बाद गठित भाकपा (माओवादी) में केंद्रीय मिलिट्री कमिशन और ईस्टर्न रिजनल ब्यूरो में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली. बाद में वह पोलित ब्यूरो तक पहुंच गया.
कोल्हान और सारंडा में कैसे खड़ा किया माओवादी नेटवर्क
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 1997 में उसने दक्षिणी छोटानागपुर कमेटी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वर्ष 2000 में झारखंड रीजनल कमेटी के गठन में भी वह सक्रिय रहा. इसी दौरान बुंडू क्षेत्र में संगठन के पहले सशस्त्र दस्ते के गठन का उल्लेख भी पुलिस रिकॉर्ड में मिलता है.
इसके बाद पश्चिमी सिंहभूम का कोल्हान और सारंडा इलाका उसकी गतिविधियों का मुख्य केंद्र बन गया. जराईकेला, गोइलकेरा, छोटानागरा, टोंटो, मनोहरपुर और आसपास के घने जंगलों में सक्रिय माओवादी दस्तों का संचालन उसके नेतृत्व में होता था. पुलिस दस्तावेजों में तुम्बाहाका, पाटातोरोप, रेंगड़ाहातु, आजेदबेड़ा, मुरूमबुरा, चिरियाबेड़ा, जोरोयउली, सारजोमबुरू, बलिबा, थोलकोबाद, तिरिलपोसी, राधापोड़ा और होलोंगउली सहित कई गांवों का उल्लेख उसके सक्रिय क्षेत्र के रूप में किया गया है.
लेवी, हथियार और संगठन की कमान
पुलिस दस्तावेजों के अनुसार मिसिर बेसरा केवल एक क्षेत्रीय कमांडर नहीं था, बल्कि संगठन की रणनीति तैयार करने वाले शीर्ष नेताओं में शामिल था. केंद्रीय मिलिट्री कमिशन का सदस्य होने के कारण उस पर सैन्य गतिविधियों, दस्तों की तैनाती, प्रशिक्षण और अभियान संचालन की जिम्मेदारी थी.
दस्तावेजों में दावा किया गया है कि माओवादी संगठन का प्रमुख आर्थिक स्रोत प्रभावित क्षेत्रों में सड़क निर्माण और अन्य विकास परियोजनाओं से जुड़े ठेकेदारों से कथित लेवी वसूली थी. इसी धन से हथियार, विस्फोटक, रसद और संगठन की अन्य गतिविधियों का संचालन किया जाता था.
141 आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड, कई थानों में दर्ज हैं केस
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2010 से 2026 के बीच मिसिर बेसरा के खिलाफ झारखंड के विभिन्न थाना क्षेत्रों में 141 आपराधिक मामले दर्ज हैं. सबसे अधिक मामले गोइलकेरा थाना में दर्ज हैं. इसके अलावा टोंटो, जराईकेला, छोटानागरा, मनोहरपुर, सोनुआ, गुवा, टेबो, टोकलो, कराईकेला, किरीबुरू, जेटेया, आनंदपुर और मुफस्सिल थाना क्षेत्रों में भी उसके खिलाफ कई मुकदमे दर्ज हैं.
रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2023, 2024 और 2025 में उसके खिलाफ सबसे अधिक नए मामले दर्ज हुए. पुलिस ने इन मामलों में सुरक्षा बलों पर हमले, आईईडी विस्फोट, हत्या, लेवी वसूली, अपहरण, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और प्रतिबंधित संगठन की गतिविधियों जैसे आरोप लगाए हैं.
हत्या, यूएपीए और आर्म्स एक्ट सहित कई गंभीर धाराओं में मुकदमे
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार मिसिर बेसरा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस-2023), गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए), आर्म्स एक्ट, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट (सीएलए) एक्ट तथा सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम सहित कई कानूनों के तहत मुकदमे दर्ज हैं.
इन मामलों में हत्या, हत्या की साजिश, पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमला, सरकारी कार्य में बाधा, देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने से जुड़ी धाराएं, अवैध हथियार रखने, विस्फोटक के इस्तेमाल, लेवी वसूली, आपराधिक षड्यंत्र और प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं.
जांच एजेंसियों की नजर अब किन सवालों के जवाब पर
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी से माओवादी संगठन के नेटवर्क को समझने में बड़ी सफलता मिल सकती है. जांच के दौरान यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि वर्तमान में संगठन की कमान किसके हाथ में है, हथियार और विस्फोटकों की आपूर्ति कैसे होती थी, लेवी का पैसा किन माध्यमों से एकत्र किया जाता था और विभिन्न राज्यों में संगठन का नेटवर्क किस तरह संचालित हो रहा था.
जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने का प्रयास करेंगी कि पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों पर हुए बड़े हमलों की योजना किस स्तर पर बनी और उनमें शीर्ष नेतृत्व की क्या भूमिका रही. अधिकारियों का मानना है कि पूछताछ से भविष्य में माओवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है.
हालांकि, यह उल्लेखनीय है कि पुलिस द्वारा दर्ज सभी मामले न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं. किसी भी मामले में अंतिम दोषसिद्धि का निर्णय संबंधित अदालत द्वारा साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही किया जाएगा.
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