जोहार लाइव ब्यूरो
राजधानी रांची के तमाड़ थाना क्षेत्र में 450 ग्राम अफीम बरामदगी के मामले में अदालत ने तीन आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया. अभियोजन पक्ष अदालत में अपने अहम गवाहों को पेश नहीं कर सका. स्थिति यह रही कि गवाहों को कोर्ट में बुलाने के लिए थाना प्रभारी से लेकर एसएसपी, डीआईजी और आखिर में झारखंड के डीजीपी तक पत्र भेजे गए, लेकिन इसके बावजूद गवाह अदालत में हाजिर नहीं हुए. लगातार मौके दिए जाने के बाद भी अभियोजन साक्ष्य पेश करने में विफल रहा.
अपर न्यायिक आयुक्त-XVIII, रांची की अदालत ने 22 अगस्त 2026 को दीपक कुमार उर्फ बुटरू, बुधन सिंह मुंडा और महेश स्वांसी को एनडीपीएस एक्ट की धारा 18(c) और 29 के आरोपों से बरी कर दिया. अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका.
450 ग्राम अफीम बरामदगी का था मामला
मामला तमाड़ थाना कांड संख्या 64/2024 से जुड़ा है. अभियोजन के अनुसार 8 जून 2024 को इलाके में एरिया डोमिनेशन और सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा था. इसी दौरान पुलिस और एसएसबी की टीम को सूचना मिली कि जंगल के रास्ते बाइक से अफीम की तस्करी होने वाली है. टीम ने सड़क पर चेकिंग अभियान शुरू किया.
करीब 1.10 बजे दो लोग बाइक से आते दिखाई दिए. पुलिस को देखकर दोनों बाइक छोड़कर भागने लगे, जिसके बाद टीम ने पीछा कर उन्हें पकड़ लिया. पूछताछ में उनकी पहचान महेश स्वांसी और बुधन सिंह मुंडा के रूप में हुई. तलाशी के दौरान महेश स्वांसी के पास मौजूद पीले रंग के बैग से काले प्लास्टिक में रखा पदार्थ बरामद हुआ. इलेक्ट्रॉनिक मशीन से तौलने पर उसका वजन करीब 450 ग्राम बताया गया.
इस मामले में बाद में दीपक कुमार उर्फ बुटरू को भी आरोपी बनाया गया. उसके खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गई और मई 2025 में तीनों के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 18(c) और 29 के तहत आरोप तय किए गए.
अभियोजन ने पेश किया सिर्फ एक गवाह
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल एक गवाह, पीडब्ल्यू-1 सिरिल सांगा, को ही अदालत में पेश किया. बचाव पक्ष की ओर से कोई गवाह नहीं दिया गया. 17 अगस्त 2026 को आरोपियों के बयान दर्ज किए गए, जिसमें उन्होंने सभी आरोपों से इनकार किया और खुद को झूठे मामले में फंसाए जाने की बात कही.
पीडब्ल्यू-1 सिरिल सांगा ने अदालत में बरामदगी और गिरफ्तारी से जुड़ी घटनाओं के बारे में बयान दिया. हालांकि, जिरह के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि बरामद पदार्थ की मौके पर किसी फील्ड टेस्टिंग किट से जांच नहीं की गई थी. सिर्फ काले और सामान्य दिखने के आधार पर उसे अफीम माना गया. मौके पर उसका सैंपल भी नहीं लिया गया था.
थाना प्रभारी से लेकर DGP तक भेजे गए पत्र
अदालत ने अपने फैसले में अभियोजन की ओर से गवाह पेश नहीं किए जाने को गंभीरता से दर्ज किया है. फैसले के अनुसार आरोप तय होने के बाद 9 जून 2025 को गवाहों को समन जारी किया गया. इसके बाद 15 जुलाई 2025 को तमाड़ थाना प्रभारी को पत्र भेजा गया.
गवाहों की पेशी नहीं होने पर 12 जनवरी 2026 को थाना प्रभारी को शो-कॉज नोटिस जारी किया गया. इसके बाद 13 फरवरी 2026 को रांची एसएसपी को पत्र और 16 मार्च 2026 को रांची डीआईजी को पत्र भेजा गया. इसके बावजूद गवाह कोर्ट में पेश नहीं हुए.

आखिरकार 23 जून 2026 को झारखंड के डीजीपी को भी पत्र भेजा गया. इसके बाद अभियोजन को 22 जुलाई 2026 को साक्ष्य पेश करने का अंतिम मौका दिया गया. 10 अगस्त 2026 को एक और अंतिम अवसर दिया गया, लेकिन बाकी गवाह फिर भी अदालत में उपस्थित नहीं हुए.
अहम गवाहों में थे टीम लीडर, जब्ती गवाह और IO
अदालत ने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन ने जिन अहम लोगों को गवाह के तौर पर पेश नहीं किया, उनमें मामले के सूचक मृत्युंजय कुमार, टीम लीडर असिस्टेंट कमांडेंट अजीत कुमार उपाध्याय, जब्ती के गवाह राकेश कुमार और लाल बाबू प्रसाद तथा जांच अधिकारी शामिल थे.
अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी की गवाही नहीं होने से बचाव पक्ष को तलाशी, जब्ती, बरामद सामान की कस्टडी और पूरी जांच प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर जिरह करने का अवसर नहीं मिला.
FSL रिपोर्ट भी नहीं हुई पेश
अदालत ने पाया कि अभियोजन ने बरामद पदार्थ की पहचान साबित करने के लिए कोई FSL रिपोर्ट पेश नहीं की. पीडब्ल्यू-1 ने जिरह में बताया कि मौके पर किसी नारकोटिक्स फील्ड टेस्टिंग किट से पदार्थ की जांच नहीं हुई थी.
इसके अलावा मौके पर प्रतिनिधि सैंपल भी नहीं लिया गया और उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रमाणित कराने की प्रक्रिया भी रिकॉर्ड पर नहीं थी. अदालत ने कहा कि रासायनिक विश्लेषण के जरिए यह साबित नहीं किया गया कि बरामद पदार्थ वास्तव में एनडीपीएस एक्ट के तहत प्रतिबंधित मादक पदार्थ था.
बरामद पदार्थ मौके पर सील भी नहीं किया गया था
मामले में एक और अहम कमी सामने आई. गवाह ने जिरह में बताया कि बरामद पदार्थ को घटनास्थल पर कपड़े में बांधा गया था, लेकिन उसे वहीं सील नहीं किया गया था. अदालत के सामने बरामद पदार्थ को मटेरियल एग्जिबिट के रूप में भी पेश नहीं किया गया.
अदालत ने माना कि इस तरह बिना सील की कस्टडी से कथित बरामदगी की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं.
भीड़भाड़ वाली सड़क पर हुई थी कार्रवाई, फिर भी स्वतंत्र गवाह नहीं
अदालत के मुताबिक घटनास्थल एक व्यस्त सार्वजनिक सड़क थी, जहां आम लोगों की आवाजाही थी. इसके बावजूद तलाशी और जब्ती की कार्रवाई में किसी स्वतंत्र नागरिक को गवाह नहीं बनाया गया. अभियोजन की ओर से इसका संतोषजनक कारण भी सामने नहीं आया.
अदालत ने इन सभी कमियों को एक साथ देखते हुए कहा कि अभियोजन बरामदगी, तलाशी, जब्ती, कथित मादक पदार्थ की पहचान और कथित साजिश को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा.
तीनों आरोपियों को मिला संदेह का लाभ
अदालत ने कहा कि अभियोजन के साक्ष्य में गंभीर कमियां हैं और आरोपियों के खिलाफ मामला संदेह से परे साबित नहीं हुआ. ऐसे में तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ दिया गया.
अदालत ने दीपक कुमार उर्फ बुटरू, बुधन सिंह मुंडा और महेश स्वांसी को एनडीपीएस एक्ट की धारा 18(c) और 29 के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया. जमानत पर चल रहे आरोपियों को उनके बेल बॉन्ड की जिम्मेदारियों से भी मुक्त कर दिया गया.
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