छोटा नागपुर के पठार पर स्थित रातु गढ़ की दीवारें सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं हैं, बल्कि ये सदियों पुराने उस नागवंशी राजवंश की गवाह हैं जिसने झारखंड की संस्कृति और इतिहास को गढ़ा है. पुंडरीक नाग के वंशज कहे जाने वाले नागवंशी राजाओं की इस धरती पर अपनी एक अलग ही आन-बान और शान रही है. इसी गौरवशाली परंपरा की एक अहम और बेहद सम्मानित कड़ी थे महाराजा चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव. साल 2014 में उनके निधन के बाद रातु राजपरिवार के भविष्य और उनकी संपत्ति को लेकर अक्सर कयास लगाए जाते रहे हैं. अब रांची की एक अदालत के ऐतिहासिक फैसले ने इस राजघराने की विरासत में एक नया अध्याय जोड़ दिया है.
64वीं पीढ़ी के महाराजा की विरासत
इतिहास के झरोखे से देखें तो नागवंशी राजवंश की शुरुआत फणि मुकुट राय से हुई थी. महाराजा चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव इस महान वंश की 64वीं पीढ़ी के महाराजा थे. वे रांची विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक भी रहे और इलाके की जनता के बीच बेहद लोकप्रिय थे. 10 जुलाई 2014 को जब उनका निधन हुआ, तो छोटा नागपुर ने अपने अंतिम महाराजा को खो दिया. महाराजा अपने पीछे कोई लिखित वसीयत नहीं छोड़ गए थे, इस चलते उनकी कुछ चल संपत्तियों के कानूनी मालिकाना हक तय किया जाना बाकी था.
रांची के न्यायिक आयुक्त अनिल कुमार मिश्रा नंबर-1 की अदालत में इसी को लेकर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत एक मामला (सक्सेशन केस संख्या 16/2024) चल रहा था. मामला महाराजा की उस रकम और प्रतिभूतियों से जुड़ा था, जो उन्होंने बैंक ऑफ इंडिया की रातु चट्टी शाखा और केनरा बैंक की कामरे शाखा के खातों में जमा कर रखी थी. विभिन्न सेविंग अकाउंट, करंट अकाउंट, मंथली इनकम प्लान्स और फिक्स्ड डिपॉजिट को मिलाकर यह कुल रकम 62 लाख 4 हजार 138 रुपये और 24 पैसे थी.
अदालत में दिखा राजशाही का बड़प्पन
इस मामले का सबसे दिलचस्प पहलू तब सामने आया, जब महाराजा की बहू प्रियदर्शिनी शाहदेव ने इस राशि पर अपना दावा पेश किया. प्रियदर्शिनी शाहदेव फिलहाल प्रयागराज में रहती हैं. कानून के मुताबिक, अदालत ने महाराजा के अन्य सभी कानूनी वारिसों को प्रतिवादी बनाया और उनसे जवाब मांगा. इन वारिसों में राजपरिवार के सदस्य माधुरी मंजरी देवी, कल्पना सिंह, मध्वेंद्र सिंह, कौशलेन्द्र सिंह, प्रियंका सिंह और नाबालिग अभिरित देव सिंह शामिल थे.
अदालत को अंदेशा रहा होगा कि शायद इस बड़ी रकम पर कोई विवाद खड़ा हो, लेकिन रातु राजपरिवार ने अपनी परंपरा के अनुरूप बड़प्पन दिखाया. सभी कानूनी वारिसों ने अदालत में हाजिर होकर लिखित रूप में अपनी ‘अनापत्ति’ यानी नो ऑब्जेक्शन सौंप दी। उन्होंने एक सुर में कहा कि यदि यह उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्रियदर्शिनी शाहदेव के पक्ष में जारी किया जाता है, तो परिवार के किसी भी सदस्य को कोई एतराज नहीं है. इतना ही नहीं, रातु के ग्रामीणों या आम जनता की तरफ से भी इस दावे के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठी.
प्रियदर्शिनी के लिए कानूनी सुरक्षा कवच
सभी गवाहों के बयानों, मृत्यु प्रमाण पत्र और बैंक स्टेटमेंट की गहन जांच के बाद अदालत ने माना कि महाराजा की पुत्रवधू का दावा पूरी तरह से वैध है। अदालत ने कार्यालय को तुरंत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया और बैंकों को आदेश दिया कि वे यह पूरी राशि ब्याज सहित प्रियदर्शिनी शाहदेव को सौंप दें। हालांकि, कानूनी औपचारिकताओं को मुकम्मल करने के लिए अदालत ने प्रियदर्शिनी शाहदेव को एक क्षतिपूर्ति बॉन्ड और सुरक्षा बॉन्ड जमा करने का भी निर्देश दिया है। यह एक कानूनी सुरक्षा कवच है, ताकि भविष्य में अगर कोई अन्य व्यक्ति इस संपत्ति पर अपना दावा पेश करे, तो कानूनी जवाबदेही तय रहे।
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