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    Home»जोहार ब्रेकिंग»ब्रिक्स में डॉलर के मुकाबले सदस्य देशों की करेंसी कितनी मजबूत?
    जोहार ब्रेकिंग

    ब्रिक्स में डॉलर के मुकाबले सदस्य देशों की करेंसी कितनी मजबूत?

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkSeptember 13, 2026No Comments4 Mins Read3
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    ब्रिक्स देश इन दिनों अपनी कोई साझा करेंसी लाने की बात तो आधिकारिक रूप से नहीं कर रहे हैं, लेकिन अंदरखाने दबी जुबान से यह चर्चा जोरों पर है कि कैसे अनऔपचारिक रूप से डॉलर से दूरी बनाई जाए.

    नई दिल्ली के भारत मंडपम में 12 और 13 सितंबर को हो रहे 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि सदस्य देश आपस में कारोबार करने के लिए डॉलर का इस्तेमाल छोड़ दें और अपनी-अपनी स्थानीय मुद्राओं में ही लेन-देन करें. भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी यही अपील की है कि अगर भारत और रूस को व्यापार करना है, तो वे रुपये और रूबल में करें; भारत और चीन चाहें तो रुपये और युआन में व्यापार कर सकते हैं. या संबंधित देशों की करेंसी से. मकसद साफ है, हर बार बीच में डॉलर को लाने की जरूरत न पड़े और पेमेंट का काम जल्दी और सस्ता हो जाए.

    लेकिन यहीं पर एक बड़ा पेंच फंसता है. जब ब्रिक्स देश डॉलर से पिंड छुड़ाना चाहते हैं, तो पहले यह देखना भी जरूरी है कि उनके पास अपनी जो 11 करेंसी हैं, वे डॉलर के मुकाबले कितनी पानी में हैं? आइए एक नजर डालते हैं ब्रिक्स के इन 11 देशों की मुद्राओं के हाल पर:

    ब्रिक्स के 11 देशों की करेंसी का हाल

    चीन का युआन (Renminbi): एक डॉलर की कीमत करीब 6.7 युआन है. चीन का ग्लोबल व्यापार बहुत बड़ा है, इसलिए ब्रिक्स देशों में युआन को अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए सबसे मजबूत और काम की करेंसी माना जाता है.

    यूएई का दिरहम: एक डॉलर की कीमत करीब 3.67 दिरहम है. यूएई की करेंसी सीधे डॉलर से बंधी (Pegged) हुई है, इसलिए इसमें ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता.

    सऊदी अरब का रियाल: एक डॉलर करीब 3.75 रियाल के बराबर है. सऊदी रियाल भी लंबे समय से डॉलर के हिसाब से ही स्थिर रखा गया है.

    ब्राजील का रियल: एक डॉलर की कीमत लगभग 5.1 रियल है. ब्राजील की अर्थव्यवस्था बड़ी है और वहां से सामानों (कमोडिटी) का निर्यात अच्छा होता है, इसलिए इसकी करेंसी ठीक-ठाक स्थिति में है, हालांकि थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव चलता रहता है.

    रूस का रूबल: एक डॉलर करीब 84 रूबल के आसपास है. पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों के बाद रूस ने चीन और बाकी देशों के साथ लोकल करेंसी में व्यापार काफी बढ़ा दिया है.

    भारत का रुपया: एक डॉलर की कीमत लगभग 95 रुपये के आसपास चल रही है. वैश्विक और घरेलू कारणों से फिलहाल भारतीय रुपये पर थोड़ा दबाव बना हुआ है.

    दक्षिण अफ्रीका का रैंड: एक डॉलर करीब 17 रैंड का है. उभरते बाजारों की उन मुद्राओं में इसकी गिनती होती है, जिनमें काफी तेजी से उतार-चढ़ाव आते हैं.

    मिस्र का पाउंड: एक डॉलर की कीमत करीब 48 मिस्र पाउंड है. पिछले कुछ सालों में डॉलर के मुकाबले यह करेंसी काफी कमजोर हुई है.
    इंडोनेशिया का रुपिया: एक डॉलर के मुकाबले आपको 17,000 से ज्यादा इंडोनेशियाई रुपिया मिल जाएंगे. इस पर भी डॉलर की मजबूती का असर साफ दिखता है.

    इथियोपिया का बिर्र: एक डॉलर की कीमत लगभग 155 बिर्र या उससे भी ज्यादा है. देश में आर्थिक तंगी और विदेशी मुद्रा की कमी का बुरा असर इसकी करेंसी पर पड़ा है.

    ईरान का रियाल: सरकारी कागजों में एक डॉलर 13 लाख रियाल से ज्यादा का बताया जाता है, लेकिन बाजार की स्थिति और भी अलग हो सकती है. अमेरिका और पश्चिमी प्रतिबंधों की वजह से यह ब्रिक्स देशों की सबसे कमजोर करेंसी है.

    तो फिर ब्रिक्स का प्लान क्या है?

    इन आंकड़ों को देखकर यह साफ हो जाता है कि ब्रिक्स के सभी देशों की करेंसी एक जैसी ताकत वाली बिल्कुल नहीं हैं. कुछ मुद्राएं काफी मजबूत या स्थिर हैं, कुछ पर दबाव है, और कुछ सीधे डॉलर के सहारे ही टिके हैं.

    यही वजह है कि ब्रिक्स की रणनीति डॉलर के सामने कोई एक सुपर-करेंसी खड़ा करने की नहीं है. इसके बजाय, उनका प्लान यह है कि हर देश अपनी खुद की करेंसी (जैसे भारत का रुपया, चीन का युआन, रूस का रूबल और ब्राजील का रियल) का इस्तेमाल करके आपस में व्यापार कर ले, ताकि डॉलर पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जा सके.

    Also Read : Brics Summit 2026: ब्रिक्स समिट में भारत का असली एजेंडा, डॉलर से दूरी और चीन पर रणनीतिक लगाम

    डॉलर ब्रिक्स करेंसी
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