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    Home»ट्रेंडिंग»“मंदिर हो या दरगाह… सड़क पर बाधा नहीं बन सकती धार्मिक संचरना”, बुल्डोजर केस में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
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    “मंदिर हो या दरगाह… सड़क पर बाधा नहीं बन सकती धार्मिक संचरना”, बुल्डोजर केस में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

    Team JoharBy Team JoharOctober 1, 2024No Comments2 Mins Read
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    नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि है और सड़क, जल निकायों या रेल पटरियों पर अतिक्रमण करने वाले किसी भी धार्मिक ढांचे को हटाया जाना चाहिए. न्यायालय ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, इसलिए अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई का निर्देश सभी नागरिकों के लिए होगा, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो.

    कोर्ट की टिप्पणियां

    जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने ‘बुलडोजर न्याय’ के संदर्भ में चल रही याचिकाओं पर सुनवाई की. कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अवैध संरचनाओं के खिलाफ कार्रवाई केवल धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं होनी चाहिए. यदि कोई धार्मिक ढांचा सार्वजनिक सड़क, फुटपाथ या रेलवे लाइन के क्षेत्र में है, तो उसे हटाया जाना चाहिए.

    सॉलिसिटर जनरल का बयान

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तीन राज्यों की ओर से पेश होते हुए कहा कि किसी आपराधिक मामले में आरोपी होना बुलडोजर कार्रवाई का आधार नहीं हो सकता. उन्होंने कहा, “यह नियम रेप या आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों के लिए भी लागू होगा.”

    ऑनलाइन पोर्टल की जरूरत

    कोर्ट ने इस प्रक्रिया के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल बनाने की भी बात की, जिससे लोग जागरूक हो सकें और रिकॉर्ड मेंटेन किया जा सके. सॉलिसिटर जनरल ने चिंता व्यक्त की कि अदालत कुछ उदाहरणों के आधार पर निर्देश जारी कर रही है, जिसमें एक समुदाय को निशाना बनाए जाने का आरोप है.

    धार्मिक और अनधिकृत निर्माण

    न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनधिकृत निर्माण के लिए एक विशेष कानून होना चाहिए, जो धर्म या आस्था पर निर्भर न हो. वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने आवास उपलब्धता के मुद्दे पर तर्क किया, जिस पर सॉलिसिटर जनरल ने आपत्ति जताई, यह कहते हुए कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की आवश्यकता नहीं है. सुप्रीम कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई में कोई भेदभाव नहीं होगा और सार्वजनिक सुरक्षा हमेशा प्राथमिकता होगी. अदालत ने यह भी कहा कि संपत्ति का विध्वंस केवल नागरिक नियमों के उल्लंघन के मामलों में ही किया जा सकता है, न कि आपराधिक मामलों में आरोपित होने के कारण.

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