लोहरदगा जिले के भंडरा प्रखंड के हाटी गांव में धर्मांतरण के मुद्दे पर ग्राम सभा के फैसले ने चर्चा तेज कर दी है. शुक्रवार को हुई विशेष ग्राम सभा में गांव में धर्मांतरण के मकसद से आने वाले पादरियों, पास्टरों, मिशनरियों और धार्मिक प्रचार से जुड़ी गतिविधियों पर रोक लगाने का प्रस्ताव पारित किया गया. साथ ही प्रार्थना सभा और चंगाई सभा पर भी प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया गया. इससे संबंधित सूचना बोर्ड भी गांव में लगाया गया है. सूचना बोर्ड में साफ लिखा गया है कि धर्मांतरण या धार्मिक प्रचार के उद्देश्य से गांव में प्रवेश करने वाले लोगों के खिलाफ ग्राम सभा के निर्णय के अनुसार कार्रवाई की जाएगी. इस बैठक में मौजूद IRS अधिकारी निशा उरांव ने इसे गांव की परंपरा और स्वाभिमान से जुड़ा फैसला बताया.
निशा उरांव ने कहा कि गांव की सीमा पर लगाया गया सूचना बोर्ड सिर्फ एक पट्टी नहीं है, बल्कि यह गांव के स्वाभिमान और अपनी धर्म-परंपरा को बचाने का संकल्प है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है और हाटी गांव की पहल उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.
आज लोहरदगा के हाटी ग्राम सभा ने “सूचना पट्टी” के संदेश से “चंगाई सभा” पर स्थायी रोक लगाते हुए , झारखंड में एक ऐतिहासिक शुरुआत की है !
👉🏽सूचना पट्ट पर पादरी ,पास्टर तथा अन्य लोगों के धर्मांतरण के उद्देश्य से गाँव में आने पर रोक लगाने का आदेश सूचना पट्टी पर लिखा गया है
👉🏽 यह… pic.twitter.com/jwCHzxap94
— Nesha Oraon 🇮🇳 (@OraonNesha) July 3, 2026
निशा उरांव ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और पेसा कानून के तहत ग्राम सभा को अपने पारंपरिक अधिकारों और सामाजिक व्यवस्था की रक्षा करने का अधिकार हासिल है. उन्होंने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहले भी ऐसे मामलों में ग्राम सभा के फैसलों और सूचना पट्टी को संवैधानिक मान चुके हैं.
उन्होंने बताया कि इस अभियान में गांव के सनातनी परिवारों ने भी सरना समाज का सहयोग किया है. उनके मुताबिक सरना और सनातन समाज की यह एकता उन लोगों के लिए जवाब है, जो समाज को बांटने की कोशिश करते हैं. उन्होंने कहा कि आने वाले समय में झारखंड के कई अन्य गांवों में भी इसी तरह की सूचना पट्टियां लगाई जाएंगी, ताकि आदिवासी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत किया जा सके.
ग्राम सभा में आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों, समाजसेवियों और बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने हिस्सा लिया. बैठक में जल, जंगल, जमीन, आदिवासी संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक मूल्यों की रक्षा को लेकर भी विस्तार से चर्चा हुई.
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