मुस्कान चौधरी
किसी समाज की तरक्की का असली पैमाना सिर्फ यह नहीं कि वह कितना आगे बढ़ा, बल्कि यह भी है कि उस तरक्की की रोशनी सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक कितनी पहुंची. इसी सोच से जुड़ा है ‘अंत्योदय’, यानी समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का उदय. हर साल 25 सितंबर को मनाया जाने वाला अंत्योदय दिवस इसी विचार को सामने लाता है और इस दिन को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती से जोड़ा गया है.
लेकिन अंत्योदय दिवस की कहानी सिर्फ एक सरकारी दिवस की कहानी नहीं है. इसके केंद्र में दीनदयाल उपाध्याय का जीवन और उनका वैचारिक सफर है. एक ऐसा सफर, जिसकी शुरुआत मथुरा के एक छोटे से गांव से हुई, जिसने बचपन में ही माता-पिता को खो दिया, फिर शिक्षा, संगठन, पत्रकारिता और राजनीति के रास्ते से गुजरते हुए भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक पहुंचा.
दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद को भारतीय जनसंघ के आधिकारिक सिद्धांत के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वहीं समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान से जुड़ा ‘अंत्योदय’ उनके विचारों की चर्चा का अहम हिस्सा बना. उनकी जिंदगी जितनी विचारों से जुड़ी रही, उतनी ही उनकी अचानक हुई मौत ने भी उन्हें इतिहास के एक रहस्यमयी अध्याय का हिस्सा बना दिया.
तो आखिर कौन थे दीनदयाल उपाध्याय?
25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नगला चंद्रबन गांव में दीनदयाल उपाध्याय का जन्म हुआ था. आज इस स्थान को दीनदयाल धाम के नाम से जाना जाता है. इसी वजह से 25 सितंबर उनकी जयंती की तारीख है. इसी दिन को अंत्योदय दिवस के रूप में भी मनाया जाता है.
‘अंत्योदय’ का सामान्य अर्थ है, अंतिम व्यक्ति का उदय. यानी समाज की विकास यात्रा में जो व्यक्ति सबसे पीछे रह गया है, जो आर्थिक या सामाजिक रूप से वंचित है, उस तक भी विकास, अवसर और कल्याण का लाभ पहुंचाना. यही वह विचार है, जिसने दीनदयाल उपाध्याय की पहचान को सिर्फ एक राजनेता तक सीमित नहीं रहने दिया.

दीनदयाल उपाध्याय का बचपन आसान नहीं था. जब वे महज आठ वर्ष के थे, तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया. इसके बाद उनका पालन-पोषण उनके मामा-मामी ने किया. मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद पढ़ाई में उनकी प्रतिभा लगातार सामने आती रही. सीकर में पढ़ाई के दौरान उन्हें स्वर्ण पदक मिला. किताबों के लिए आर्थिक सहायता और मासिक छात्रवृत्ति भी दी गई.
इसके बाद उन्होंने पिलानी से इंटरमीडिएट और कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज से बीए की पढ़ाई पूरी की. आगे उन्होंने आगरा में अंग्रेजी साहित्य में उच्च शिक्षा शुरू की, लेकिन पारिवारिक और आर्थिक समस्याओं के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर सके. यही संघर्ष उनके जीवन की आगे की दिशा तय करने वाला साबित हुआ.
पढ़ाई से संगठन तक, 1937 में RSS से जुड़े
1937 में दीनदयाल उपाध्याय RSS के संपर्क में आए. इसके बाद उन्होंने संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की. 1942 में वे पूर्णकालिक कार्यकर्ता बने और बाद में प्रचारक के तौर पर काम किया. उत्तर प्रदेश में संगठन विस्तार के दौरान उन्होंने गांव-गांव और अलग-अलग क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने का काम किया.यह दौर उनके जीवन में महत्वपूर्ण था, क्योंकि यहीं से एक छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता धीरे-धीरे एक बड़े संगठनकर्ता के रूप में सामने आया.
दीनदयाल उपाध्याय की भूमिका सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं थी. वे लेखन और पत्रकारिता से भी जुड़े. 1940 के दशक में उन्होंने लखनऊ से ‘राष्ट्र धर्म’ नामक मासिक प्रकाशन शुरू किया. इसके बाद ‘पांचजन्य’ और ‘स्वदेश’ जैसे प्रकाशनों से भी जुड़े. यानी उनके लिए विचार सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं थे. उन्हें लेख, संपादकीय और पुस्तकों के जरिए भी लोगों तक पहुंचाया गया. उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य पर नाटक लिखा, शंकराचार्य की जीवनी लिखी और हेडगेवार की मराठी जीवनी का हिंदी अनुवाद भी किया.

भारतीय जनसंघ से राष्ट्रीय राजनीति तक
1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की. दीनदयाल उपाध्याय को पार्टी के संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी मिली. वे पहले उत्तर प्रदेश में पार्टी के महासचिव बने और बाद में अखिल भारतीय महासचिव की जिम्मेदारी संभाली. करीब 15 वर्षों तक वे संगठन के इस महत्वपूर्ण पद पर रहे.

1963 में उन्होंने जौनपुर लोकसभा सीट से उपचुनाव भी लड़ा, लेकिन चुनाव जीत नहीं सके. इसके बाद 1967 के आम चुनाव में भारतीय जनसंघ ने 35 लोकसभा सीटें जीतीं और वह लोकसभा की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी. दिसंबर 1967 में कालीकट अधिवेशन में दीनदयाल उपाध्याय को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया. लेकिन अध्यक्ष बनने के महज दो महीने बाद ही उनकी जिंदगी का अंत हो गया.
एकात्म मानववाद से अंत्योदय तक
दीनदयाल उपाध्याय की राजनीतिक पहचान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उनका समग्र या एकात्म मानववाद का विचार है. 1965 में उनके द्वारा विकसित अवधारणाओं को भारतीय जनसंघ ने अपने आधिकारिक सिद्धांत के रूप में अपनाया. इस चिंतन को समझने पर अंत्योदय की अवधारणा को समझना आसान होता है. अंत्योदय का सवाल मूल रूप से यही है कि विकास का फायदा आखिर किस तक पहुंच रहा है?
अगर समाज का एक बड़ा हिस्सा विकास की प्रक्रिया से बाहर रह जाए, तो विकास अधूरा माना जाएगा. इसलिए अंतिम व्यक्ति तक अवसर, संसाधन और कल्याण पहुंचाने की सोच को अंत्योदय के विचार से जोड़ा जाता है. यानी विकास की कतार में जो सबसे पीछे है, उसे सबसे पहले दिखाई देने वाली जगह तक लाना ही अंत्योदय की मूल भावना है.
2014 में अंत्योदय दिवस की घोषणा
दीनदयाल उपाध्याय की जयंती को अंत्योदय दिवस के रूप में मनाने का फैसला 25 सितंबर 2014 को उनकी 98वीं जयंती के अवसर पर किया गया. इसके बाद हर साल 25 सितंबर को अंत्योदय दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन दीनदयाल उपाध्याय के विचारों के साथ-साथ समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास और कल्याण पहुंचाने, समान अवसर उपलब्ध कराने और जरूरतमंद वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ने जैसे मुद्दों पर चर्चा होती है.

इस तरह 25 सितंबर की तारीख दो स्तरों पर महत्वपूर्ण हो जाती है. यह दीनदयाल उपाध्याय की जयंती है और साथ ही उस विचार को याद करने का दिन भी है, जिसमें समाज के अंतिम व्यक्ति को विकास के केंद्र में रखने की बात कही जाती है. लेकिन दीनदयाल की कहानी का आखिरी अध्याय सबसे रहस्यमयी है
राजनीतिक जीवन में ऊंचाई पर पहुंचने के कुछ ही समय बाद दीनदयाल उपाध्याय की जिंदगी अचानक खत्म हो गई. 10 फरवरी 1968 को वे लखनऊ से पटना जाने वाली ट्रेन में सवार हुए थे. आधी रात के बाद उन्हें जौनपुर में जीवित देखा गया. ट्रेन करीब 1:40 बजे वाराणसी पहुंची और फिर मुगलसराय के लिए रवाना हुई. करीब 2:10 बजे ट्रेन मुगलसराय पहुंची, लेकिन दीनदयाल उसमें नहीं थे. लगभग 2:20 बजे उनका शव मुगलसराय जंक्शन के बाहर मिला. उस समय उनके हाथ में पांच रुपये का नोट था.
इसके बाद उनकी मौत की जांच हुई.
CBI की जांच में लूट की कोशिश के दौरान उन्हें ट्रेन से बाहर धकेले जाने की बात सामने आई. दो लोगों को गिरफ्तार किया गया और उन पर हत्या तथा चोरी के आरोप लगाए गए. हालांकि दोनों हत्या के आरोप से बरी हो गए.
बाद में इस मामले की एक सदस्यीय जांच भी हुई. 1970 में सामने आए निष्कर्ष में राजनीतिक मकसद का कोई सबूत नहीं पाया गया और मौत को अधूरी चोरी की घटना के दौरान हुई घटना के रूप में देखा गया. इसके बावजूद उनकी मौत को लेकर सवाल और अलग-अलग दावे समय-समय पर सामने आते रहे. 2017 में भी उनकी हत्या की नए सिरे से जांच की मांग उठी थी.
51 साल की जिंदगी और लंबी राजनीतिक विरासत
दीनदयाल उपाध्याय की जिंदगी महज 51 साल की रही. लेकिन इस छोटे से जीवन में उन्होंने कई भूमिकाएं निभाईं. वे छात्र रहे, स्वयंसेवक बने, प्रचारक बने, पत्रकार रहे, लेखक रहे, संगठनकर्ता बने और आखिरकार भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. उनकी राजनीतिक विरासत को समझने के लिए दो शब्द सबसे ज्यादा सामने आते हैं: एकात्म मानववाद और अंत्योदय.
एक तरफ एकात्म मानववाद समाज और व्यक्ति को देखने की उनकी वैचारिक दृष्टि को सामने रखता है, तो दूसरी तरफ अंत्योदय उस सवाल को उठाता है कि विकास का लाभ समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति तक कैसे पहुंचे. आज 25 सितंबर को मनाया जाने वाला अंत्योदय दिवस इसी विचार को सार्वजनिक विमर्श में सामने लाने का अवसर देता है.
Also Read : महंगाई दर में दिल्ली को पछाड़ा, फिर भी झारखंड में महंगाई कम? समझिए NSO का यह पेंच पार्ट-2

