झारखंड के 18 साल के अवि मोहन कुमार शुक्ला ने ऐसा AI आधारित डिवाइस तैयार किया है, जो इंसानों और हाथियों के बीच होने वाले संघर्ष को कम करने में मदद कर सकता है. खास बात यह है कि यह डिवाइस कम लागत में तैयार हुआ है और फिलहाल पलामू टाइगर रिजर्व (PTR) में इसकी टेस्टिंग चल रही है. अगर परीक्षण सफल रहा तो अगस्त से इसे रांची जिले में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लगाया जाएगा.
रांची के रहने वाले अवि ने हाल ही में 12वीं की पढ़ाई पूरी की है. फिलहाल अवि ने एक साल के लिए पढ़ाई से ब्रेक लिया है और अगले साल IIT में दाखिला लेने की तैयारी कर रहे हैं. उनके इस प्रोजेक्ट को झारखंड वन विभाग, IIM रांची और अमेरिका की Emergent Ventures का भी सहयोग मिल रहा है. उन्हें स्टार्टअप्स झारखंड की ओर से बेस्ट बडिंग एंटरप्रेन्योर का सम्मान भी मिल चुका है.
डिवाइस ऐसे करेगी काम
अवि मोहन पिछले तीन महीने से वह इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे. उन्होंने जो डिवाइस बनाया है, उसका नाम ‘इनोबॉक्स’ (Innobox) है. यह सोलर एनर्जी से चलता है और इसमें AI कैमरा, रडार और सीस्मिक सेंसर लगे हैं. ये तकनीक मिलकर हाथियों और दूसरे बड़े जंगली जानवरों की पहचान करती है और गांव वालों को समय रहते अलर्ट भेजती है. अवि का दावा है कि यह डिवाइस 80 से 85 फीसदी तक सही पहचान करने में सक्षम है.
वन विभाग के अनुसार, राज्य में मानव-हाथी संघर्ष रोकने के लिए तीन स्तर पर काम किया जा रहा है. ऊपरी इलाकों में थर्मल कैमरे, बीच के हिस्सों में इन्फ्रारेड कैमरे और गांवों के पास, जहां बिजली और नेटवर्क की दिक्कत रहती है, वहां अवि का AI डिवाइस लगाया जाएगा.
वर्तमान में जो हाथी भगाने वाले उपकरण इस्तेमाल हो रहे हैं, उनमें मोशन सेंसर लगे होते हैं. ये किसी भी हलचल पर सायरन बजा देते हैं, चाहे वह इंसान हो या कोई छोटा जानवर. इससे बैटरी जल्दी खत्म होती है और गांव वालों को बेवजह अलर्ट झेलना पड़ता है. लेकिन उनका AI डिवाइस सिर्फ हाथी जैसे बड़े जानवर की पहचान होने पर ही सायरन बजाता है. साथ ही यह सोलर एनर्जी से चलता है, इसलिए बिजली या बैटरी की परेशानी भी नहीं होती.
बता दें, झारखंड में हाथियों और इंसानों के बीच टकराव लंबे समय से बड़ी समस्या बना हुआ है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2019-20 से अब तक हाथियों के हमलों में 474 लोगों की जान जा चुकी है. ऐसे में वन विभाग भी इस समस्या का स्थायी समाधान खोजने में जुटा है.
पलामू टाइगर रिजर्व में हो रही है टेस्टिंग
अवि को इस डिवाइस का आइडिया IIM रांची के ‘यंग चेंज मेकर’ कार्यक्रम के दौरान मिला. वह रांची के रसाबेड़ा गांव गए थे, जहां उन्होंने किसानों की फसल को हाथियों से होते नुकसान को करीब से देखा. इसके बाद उन्होंने सबसे पहले एक शुरुआती मॉडल तैयार किया, जिससे गांव के 35 परिवारों को फायदा मिला. इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने इसका और बेहतर AI वर्जन तैयार किया.
मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक रवि रंजन के मुताबिक, सोशल मीडिया पर अवि के काम की जानकारी मिलने के बाद वन विभाग ने उन्हें बुलाया और उनका प्रेजेंटेशन देखा. इसके बाद विभाग ने 10 AI डिवाइस बनाने के लिए एक लाख रुपये की आर्थिक मदद दी. फिलहाल पलामू टाइगर रिजर्व में इसकी टेस्टिंग हो रही है और शुरुआती नतीजे काफी अच्छे मिले हैं.
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