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    Home»जोहार ब्रेकिंग»झारखंड में चीखते गांव, तड़पते हाथी : 5 साल में 474 मौ’तें
    जोहार ब्रेकिंग

    झारखंड में चीखते गांव, तड़पते हाथी : 5 साल में 474 मौ’तें

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkJune 22, 2026Updated:June 22, 2026No Comments5 Mins Read4
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    हाथियों
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    Ranchi : झारखंड के कोडरमा में जंगली हाथियों के झुंड ने एक बार फिर से तांडव मचाया है। इस बार हाथियों के झुंड ने डोमचांच थाना क्षेत्र के गोलगो गांव में आधा दर्जन घरों में तोड़फोड़ कर सबकुछ तहस-नहस कर दिया। राहत की बात यह है कि इस वारदात में किसी को जान का नुकसान नहीं हुआ। पर लगातार हो रहे हाथियों के हमले से लोग खौफ से साये में हैं।

    झारखंड के जंगल अब हाथियों और इंसानों के लिए ‘डेथ जोन’ बनते जा रहे हैं। साल 2020 से 2025 के बीच सरकारी फाइलों में दर्ज आंकड़े तो यह गवाही दे रहे हैं। विकास की अंधी दौड़ और जंगलों में बारूद की गूंज ने हाथियों को बेघर किया, तो बदले में हाथियों ने ग्रामिणों के आशियाने और उनके अपनों की सांसें छीन ली। गुजरे पांच सालों में 450 से ज्यादा परिवारों के चिराग बुझ चुके हैं, तो दर्जनों हाथियों ने भी तड़पकर दम तोड़ा है। चार लाख के सरकारी मुआवजे और कागजी दावों के बीच, झारखंड के गांवों में आज भी हर रात मौत की दस्तक का खौफ बना रहता है।

    इंसानों की मौत और घायलों का आंकड़ा

    सरकारी रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले पांच सालों (2020 से 2025 के बीच) में झारखंड मानव-हाथी संघर्ष के मामले में पूरे देश में दूसरे नंबर पर रहा है।

    • मौत का आंकड़ा : साल 2020 से 2025 के बीच झारखंड में हाथियों के हमले में 474 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। अकेले साल 2023-24 में ही 87 लोगों को हाथियों ने कुचलकर मार डाला।
    • घायलों की संख्या : इस 5 साल में 150 से अधिक लोग बेतरह जख्मी हुए हैं। कई लोग तो हमेशा के लिए अपाहिज हो गए।
    • सबसे प्रभावित इलाके : रांची, खूंटी, चाईबासा, जमशेदपुर, सरायकेला, गुमला, लातेहार, बोकारो, धनबाद और अब कोडरमा इस संघर्ष का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट हैं। अकेले रांची प्रमंडल में सबसे ज्यादा हादसे दर्ज किए गए हैं।

    गजराजों की भी गयी जान

    इस लड़ाई में नुकसान सिर्फ इंसानों का नहीं हुआ है, बल्कि हाथियों ने भी भारी कीमत चुकाई है। झारखंड अब हाथियों के लिए ‘कब्रगाह’ बनता जा रहा है।

    • वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 (जनवरी–सितंबर) में 5 हाथियों की जान गयी। वहीं, 2022 (पहले 8 महीने) में 10 और 2025 में 2 हथिनी की मौत हुई।
    • मौत की वजह : हाथियों की मौत की सबसे बड़ी वजह इलेक्ट्रोक्यूशन (बिजली के तारों की चपेट में आना) है। ग्रामीण इलाकों में लटकते हाई वोल्टेज तार या खेतों को बचाने के लिए बिछाए गए बिजली के अवैध फंदे इनके लिए काल बन रहे हैं। इसके अलावा तेज रफ्तार ट्रेनों की चपेट में आने और जंगलों में नक्सलियों द्वारा प्लांट किये गये IED बम की चपेट में आने से भी हाथियों की मौत हुई है।

    सरकार की तरफ से मुआवजा

    हाथियों के हमले में जान-माल के नुकसान पर झारखंड सरकार वन विभाग के जरिये मुआवजा देती है। हालांकि, ग्रामीणों का हमेशा से यह दर्द रहा है कि यह मुआवजा ऊंट के मुंह में जीरे के समान है और इसे मिलने में महीनों लग जाते हैं।

    • वर्तमान मुआवजा (जान माल का नुकसान) : वर्तमान नियमों के तहत किसी शख्स की मौत होने पर उसके परिजनों को 4 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाता है।
    • 2020 (जनवरी–सितंबर) : मृतक के आश्रितों को ₹1.24 करोड़, घायलों को ₹22 लाख… कुल ₹1.46 करोड़ मुआवजा दिया गया।
    • 2022 (वित्त वर्ष-अभी तक) : मृतक के आश्रितों को ₹1.19 करोड़ का भुगतान हुआ था।
    • भविष्य की तैयारी : झारखंड सरकार अब इस मुआवजे की राशि को 4 लाख से बढ़ाकर 10 लाख रुपये करने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रही है।
    • नई एसओपी : सीएम हेमंत सोरेन की ओर से हाल ही में निर्देश दिए गए हैं कि हाथियों के हमले से हुए नुकसान का मुआवजा 10 दिनों के भीतर भुगतान किया जाए। इसके साथ ही घायल हाथियों के इलाज के लिए मोबाइल वेटरीनरी यूनिट बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

    कितना हुआ फसल और घर नुकसान

    झारखंड के ग्रामीण इलाकों में हाथियों का झुंड जब घुसता है, तो पल भर में सब कुछ तबाह कर देता है।

    • फसलों की बर्बादी : हाथियों को सबसे ज्यादा धान, महुआ और गन्ना पसंद है। हर साल सैकड़ों एकड़ में लगी धान की खड़ी फसल को हाथी चट कर जाते हैं या पैरों तले रौंद देते हैं।
    • घरों में तोड़-फोड़ : अनाज की खातिर हाथी अक्सर ग्रामीणों के कच्चे और पक्के घरों की दीवारें या दरवाजे तोड़ देते हैं। साल 2020 से 2025 के बीच राज्य में हजारों घरों को हाथियों ने तहस-नहस किया है, जिससे गरीब आदिवासी परिवार बेघर होने को मजबूर हुए हैं।
    वित्तीय वर्षफसल क्षति के मामलेकुल मुआवजा वितरण (लगभग)अनाज क्षति के मामलेकुल मुआवजा वितरण (लगभग)
    2022–237,922₹4.9 करोड़1₹1.0 करोड़
    2023–2411,087₹5.6 करोड़1₹50 लाख
    2024–258,598₹4.7 करोड़1₹1.2 करोड़

    जंगली जानवरों से जुड़े जानकारों का साफ कहना है कि हाथियों के इस हिंसक व्यवहार के पीछे झारखंड में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध खनन, जंगलों की कटाई और उनके प्राकृतिक ‘एलीफेंट कॉरिडोर’ (आने-जाने का रास्ता) का टूटना है। जब उन्हें जंगल में खाना और पानी नहीं मिलता, तभी वे मजबूरन गांवों का रुख करते हैं।

    Also Read : झारखंड : आखिर जिलों के एसपी से क्यों नाराज चल रहा पुलिस मुख्यालय, जानिये पूरा मामला

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