जोहार लाइव ब्यूरो
IDBI बैंक की बिक्री को लेकर कांग्रेस ने केंद्र की मोदी सरकार पर सवाल उठाए हैं. कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने बैंक को कनाडा की कंपनी Fairfax को बेचने की प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तीन सीधे सवाल पूछे हैं. उन्होंने बैंक की बिक्री में पारदर्शिता, संभावित हितों के टकराव और शेयर की कीमत घटाने के फैसले पर जवाब मांगा है.
जयराम रमेश ने कहा कि IDBI की स्थापना 1 जुलाई 1964 को हुई थी. तत्कालीन वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णमाचारी (TTK) ने इसकी परिकल्पना की थी. निजी क्षेत्र को वित्तीय सहायता देने और देश के औद्योगिक विकास को गति देने में इस संस्थान की ऐतिहासिक भूमिका रही है. इतना ही नहीं, SIDBI, EXIM Bank, NSE, SEBI और NSDL जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं के निर्माण में भी IDBI का अहम योगदान रहा है.
उन्होंने सवाल उठाया कि जिस बैंक ने पिछले वित्तीय वर्ष में करीब 10 हजार करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया, उसे बेचने का औचित्य क्या है? जयराम रमेश के मुताबिक, Businessworld की हालिया पड़ताल में इस सौदे से जुड़े कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो सरकार के फैसले पर सवाल खड़े करते हैं.
LIC निदेशक की दोहरी भूमिका पर उठे सवाल
जयराम रमेश ने LIC के स्वतंत्र निदेशक गुरुमूर्ति महालिंगम की भूमिका पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि महालिंगम करीब सात महीने तक LIC और Fairfax नियंत्रित Thomas Cook India, दोनों के बोर्ड में रहे. इस दौरान LIC ने IDBI में अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी और Fairfax भी बैंक खरीदने के लिए बोली लगाने वालों में शामिल थी.
महालिंगम LIC की Investment Committee के सदस्य भी थे. ऐसे में उनकी दोहरी भूमिका को संभावित हितों के टकराव का मामला बताते हुए जयराम रमेश ने पूछा कि क्या इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच हुई है?
मोदी सरकार से पूछे तीन सवाल
जयराम रमेश ने IDBI बैंक की बिक्री को लेकर मोदी सरकार के सामने तीन सवाल रखे हैं.
1. IDBI के शेयर की न्यूनतम कीमत पहले 94.42 रुपये तय की गई थी. बाद में इसे घटाकर 75.99 रुपये क्यों कर दिया गया? सरकार के तय न्यूनतम मूल्य से करीब 8,800 करोड़ रुपये कम कीमत पर बैंक बेचने की नौबत क्यों आई? यह फैसला किसके कहने पर लिया गया?
2. Fairfax की बोली खुलने वाले दिन ही न्यूनतम कीमत क्यों बदली गई और इसके लिए किन नियमों का पालन किया गया? नई कीमत तय करने वालों को क्या पहले से पता था कि Fairfax ने कितनी बोली लगाई है?
3. जब LIC Fairfax को IDBI में अपनी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया में थी, तब LIC का एक निदेशक Fairfax समूह की ही एक कंपनी के बोर्ड में भी शामिल था. क्या यह हितों का सीधा टकराव नहीं है? इसके अलावा, IDBI की बिक्री प्रक्रिया शुरू होने के बाद Fairfax समूह की कंपनियों में दस पूर्व सरकारी और नियामक अधिकारियों की नियुक्ति क्यों हुई? क्या इन नियुक्तियों की जांच कराई गई?
सरकार की जवाबदेही पर भी उठाए सवाल
जयराम रमेश ने कहा कि सरकार की ओर से इस मामले में सफाई देने की कोशिश की गई है, लेकिन इससे महालिंगम की दोहरी भूमिका, संभावित हितों के टकराव और IDBI कर्मचारियों के भविष्य से जुड़े सवालों का जवाब नहीं मिलता. उन्होंने सवाल किया कि जब बैंक मुनाफे में लौट चुका है, तो उसकी बिक्री को लेकर इतनी जल्दबाजी क्यों की जा रही है.
उन्होंने इस मामले को सिर्फ IDBI बैंक की बिक्री तक सीमित नहीं रखते हुए बड़े सरकारी सौदों में पारदर्शिता और जवाबदेही का मुद्दा बताया. जयराम रमेश ने पूछा कि ऐसे सौदों में फैसले कौन लेता है, किसके हित सुरक्षित रखे जाते हैं और क्या नियामक संस्थाओं की स्वतंत्रता बरकरार है?
उन्होंने कहा कि बड़े सरकारी सौदों में मूल्यांकन, सलाहकारों की नियुक्ति और निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए. संसद को सिर्फ फैसले की जानकारी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सरकार को उसके प्रति जवाबदेह भी होना चाहिए.
जयराम रमेश ने कहा कि न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए. जब गंभीर सवालों के जवाब न मिलें और संभावित हितों के टकराव की स्वतंत्र जांच सामने न आए, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
Also Read : पंजाब चुनाव 2027: AAP ने जारी की 40 उम्मीदवारों की पहली सूची, भगवंत मान फिर धुरी से लड़ेंगे चुनाव


