अभी पुलिस संस्मरण दिवस बीता.
हर साल 21 अक्टूबर को देश की रक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने हेतु सर्वोच्च बलिदान देने वाले पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों को राष्ट्र श्रद्धांजलि देता है.
व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए यह दिन भावनाओं से भरा होता है. न सिर्फ शहीदों की बल्कि आम पुलिस अधिकारियों और कर्मियों की, उनके परिजनों की संघर्ष गाथा से जुड़े चौबीस बरस के मेरे सफ़र में ऐसे दिनों, ऐसी रातों और लम्हों की गिनती नहीं की जा सकती जिनकी याद आज भी कलेजे में शूल सी चुभ जाती है. और तब यह संस्मरण सिर्फ़ एक दिन का नहीं, जीवन भर का बन जाता है.
सन् २००२ में ,जब हमारे नवसृजित झारखंड में नक्सल समस्या अपने चरम पर थी ,मैंने एक पुलिस अधिकारी को अपना जीवन साथी चुना था. ऐसा नहीं था कि उस राह की चुनौतियों से मैं अनजान थी, पर जानने और भोगने में कितना अंतर होता है , यह समझने में ज़्यादा देर नहीं लगी.
पति की पहली पोस्टिंग हुई पलामू के छतरपुर में, और आवास था हरिहरगंज का डाकबंगला. उसी परिसर में एक कमरा ऑफिस भी था और उसी का बरामदा जवानों के लिए बैरक का काम करता था. ठीक पूर्ववर्ती पदाधिकारी नक्सल ऑपरेशन में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर चुके थे. सर्वत्र व्याप्त भय और अविश्वास के वातावरण में ,बेहद सीमित भौतिक और मानव संसाधनों के साथ प्राणपण से लड़ने की इस यात्रा की मैं मौन साक्षी रही हूँ. वहाँ तब न बिजली थी, न मोबाइल फ़ोन, न पर्याप्त बल.
आसूचनाओं का संकलन, उनकी प्रोसेसिंग , प्लानिंग और उसके आधार पर ऑपरेशन कई दिनों तक चलता था. और अक्सर रात दो ढाई बजे जब ऑपरेशन में जाने के लिए एंटी माइन्स व्हीकल पर सवार होकर इनकी टीम घर से निकलती थी तो उसके भारी भरकम पहिए जैसे सड़क की जगह मेरे हृदय पर चल रहे होते थे.
छह माह के शिशु को गोद में लिए, साइड टेबल पर एक्स्ट्रा मैग्ज़ीन के साथ राइफल रखकर बंद कमरे में गुज़ारी भीषण गर्मियों की कितनी रातें और दिन आज भी कल की ही बात लगते हैं.
तब इतना बल भी नहीं होता था कि घर की सुरक्षा के लिये कुछ लोगों को पीछे छोड़ा जा सके, और इसीलिए मैंने ड्राई रिहर्सल से फायरिंग सीखी और ड्राइविंग भी. कौन जाने , कब कैसी परिस्थिति आ जाये.
पटाखों की आवाज तक पर दिल धड़क उठता था, कहीं अटैक तो नहीं हुआ. चंदन ने घर में ट्रेंच बनवा रखे थे, ताकि हमले के समय मोर्चा लिया जा सके, मॉक ड्रिल में जवानों के साथ मुझे भी रखते थे और सारे स्ट्रेटेजिक प्वाइंट्स डिस्कस करते थे. और हमारे ट्रांसफ़र के कुछ महीने बाद ही उस घर पर भीषण अटैक हुआ था, पता चला कि उसे नाकाम करने में उन ट्रेंचेज़ ने बड़ी मदद की थी.
तभी लस्सी बनाना भी सीखा ! माँ ने बताया था कि दही चीनी खा कर निकलना शुभ होता है, और मैं लगभग हर दिन बड़े से पतीले में दही जमाती थी. निकलते समय चंदन अपने होल्स्टर – पिस्टल और राइफल ठीक कर रहे होते, और मैं किचेन में भाग कर लस्सी बना रही होती कि सभी सिपाहियों को भी थोड़ा – थोड़ा दे सकूँ.
तभी ये आदत भी पड़ गई कि घर में हर समय पर्याप्त मात्रा में कुछ सूखा खाना हो,पता नहीं कब निकलना पड़ जाए तो सबके मुँह में डालने के लिए कुछ तो तैयार रहे. उस पूरे कैम्पस में मैं एक मात्र स्त्री थी; बिना घर परिवार के , बैरकों में रह रहे जवानों को ऑपरेशन में निकलते देख कर कलेजा मुँह को आता था, पता नहीं जो जा रहा है, लौट कर आयेगा कि नहीं, कुछ खिला कर तो भेजूँ!
और मेरा यकीन है कि उन दिनों लगभग हर पुलिसकर्मी की पत्नी परिजन इन्हीं परिस्थितियों से गुजरते होंगे. हर बार लौटती हुई गाड़ी की आवाज पर एक सशंक उत्कंठा से दरवाज़े को देखना , फिर ऑपरेशन की कहनियाँ सुनना और कितनी ही बार जिप्सी पर गोलियों के छेद देख कर चुप चाप शुकराना करना ; यही जीवन था!
तब से अब तक झारखंड पुलिस ने अपने असाधारण संयम और पराक्रम से एक असंभव सा लगता कार्य पूर्ण कर दिखाया है. पर इस यात्रा में साथ छोड़ गए वीरों की याद अब भी हृदय के घाव को मिटने नहीं देती. साथ साथ उठे बैठे, खाये पिये लोग जब अचानक साथ छोड़ जायें तो हतप्रभ हृदय का सन्नाटा जीवन भर के लिये एक कोने में घर कर लेता है. अमरजीत बलिहार सर, शमशाद आलम और शतानन्द ऐसे ही नाम थे जिनके जाने की खबर ने मुझे महीनों बेचैन कर रखा था.
पर सबसे हृदयविदारक था सुनील का जाना! पलामू एसपी के रूप में वह चंदन का अंगरक्षक था. सामान्यतः भी सभी अंगरक्षक और चालक घर परिवार के सदस्यों जैसे ही हो जाते हैं पर सुनील कुछ ख़ास ही था. हर समय मुस्कुराता चेहरा , सदा उत्साह से भरा और दौड़ता हुआ आने वाला. मेरे मन में तो वही छवि तुम्हारी बसी है जब छठ में अर्घ्य देते समय तुम हम दोनों के बीच ही रहकर फोटो खिंचवाने की जिद सी करते, जैसे अपना बेटा ही जिद करता हो!
मकर संक्रांति में जब सभी एक साथ बैठकर दही चूड़ा खाते तो साहब के बगल में जगह न मिल पाने पर रूठ से जाते! तुम्हारे जाने से हृदय का एक कोना सदा के लिये सूना रह गया सुनील! पर तुमने जिस अप्रतिम साहस का परिचय देते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है उसके लिए पुलिस परिवार और झारखंड राज्य सदा तुम्हारा ऋणी रहेगा.
तुम्हारी और तुम्हारे जैसे हर एक पुलिसकर्मी की कमी पूरी तो नहीं की जा सकती पर मैं माननीय मुख्यमंत्री महोदय श्री हेमंत सोरेन जी के संवेदनशील नेतृत्व के प्रति व्यक्तिगत तौर पर हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ जिन्होंने पुलिस कर्मियों और उनके परिजनों के जीवन की कठिनाइयों को समझा है और उन्हें आसान करने की दिशा में कई प्रयास किए हैं. पुलिस कर्मियों की माँग के अनुरूप पुरानी पेंशन बहाली,तेरहवें माह के वेतन के साथ 20 दिनों के क्षतिपूरक अवकाश की स्वीकृति, बेहतर आवासन एवं सभी थानों में नई गाड़ियों की व्यवस्था आदि ऐसे कई कार्य हैं जिन्होंने पुलिस कर्मियों के दैनन्दिन जीवन को आसान बनाया है.
पर सबसे महत्वपूर्ण कि माननीय मुख्यमंत्री की पहल पर स्टेट बैंक पुलिस सैलरी पैकेज अकाउंट एवं ग्रुप टर्म प्लान के अंतर्गत नक्सल गतिविधि अथवा दुर्घटना आदि परिस्थितियों में मृत्यु के उपरान्त कुल एक करोड़ दस लाख रुपये की राशि उनके परिजनों को उपलब्ध कराई जाती है.
विधि के विधान से गये हुए जीवन को वापस तो नहीं लाया जा सकता पर सरकार का यह निर्णय उनके परिजनों को कठिन समय में कुछ राहत एवं संबल अवश्य दे रहा है और सबसे बढ़कर पुलिस कर्मियों में यह विश्वास भर रहा है कि वह विगतशंक होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें सरकार उनके योगक्षेम का वहन करने को प्रतिबद्ध है.
“है नमन उनको कि जो यशकाय को अमरत्व देकर
इस जगत के शौर्य की जीवित कहानी हो गये हैं
है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय
जो धरा पर गिर पड़े पर आसमानी हो गये हैं”


