रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने एनएचएआई (NHAI) के एक कर्मचारी के प्रमोशन से जुड़े मामले में एक अहम और स्पष्ट फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ कर दिया है कि जिस इंजीनियरिंग डिग्री के आधार पर किसी कर्मचारी को प्रमोशन मिला हो और बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से वह डिग्री रद्द कर दी गई हो, तो उस फर्जी या रद्द डिग्री के बल पर मिला प्रमोशन बरकरार नहीं रखा जा सकता.
इस महत्वपूर्ण निर्णय के साथ ही हाईकोर्ट ने एनएचएआई के उस आदेश को पूरी तरह बहाल कर दिया है, जिसके तहत कर्मचारी पूर्ण चंद्र कहिली को डिप्टी जनरल मैनेजर (टेक्निकल) के पद से हटाकर वापस टेक्निकल असिस्टेंट के पद पर डिमोट कर दिया गया था.
क्या था पूरा मामला?
पूर्ण चंद्र कहिली की नियुक्ति 25 जून 1997 को एनएचएआई में ड्राफ्टमैन (बाद में टेक्निकल असिस्टेंट) के रूप में हुई थी. नौकरी के दौरान उन्होंने साल 2008-2011 के बीच डिस्टेंस लर्निंग के जरिए सिविल इंजीनियरिंग में बी.टेक की डिग्री हासिल की. अगस्त 2011 में एनएचएआई द्वारा मैनेजर (टेक्निकल) के पदों के लिए आवेदन मांगे गए, जिसमें सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री अनिवार्य योग्यता थी. पूर्ण चंद्र ने इसी डिग्री के आधार पर आवेदन किया और उन्हें 2015 में मैनेजर तथा 2016 में डीजीएम (टेक्निकल) के पद पर प्रमोशन मिल गया.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पलटी पूरी तस्वीर
मामले में मोड़ तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘ओड़िसा लिफ्ट इरीगेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम रबी शंकर पाट्रो’ मामले में डिस्टेंस एजुकेशन के जरिए हासिल की गई कई इंजीनियरिंग डिग्रियों को अवैध और रद्द घोषित कर दिया. साथ ही ऐसी डिग्रियों के आधार पर मिले प्रमोशन के लाभ को वापस लेने का निर्देश दिया. चूंकि पूर्ण चंद्र की डिग्री भी इसी दायरे में आती थी, इसलिए एनएचएआई ने 1 मार्च 2021 को उन्हें डीजीएम पद से डिमोट कर वापस टेक्निकल असिस्टेंट बना दिया. इसके खिलाफ कर्मचारी ने पहले कैट (CAT) और फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
कानूनी प्रक्रिया और सुनवाई के बाद एनएचएआई ने 27 जून 2024 को दोबारा उन्हें डिमोट करने का आदेश जारी किया. इसके बाद केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) ने 6 फरवरी 2025 को कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए एनएचएआई के रिवर्जन आदेश को रद्द कर दिया था. इसी आदेश के खिलाफ एनएचएआई झारखंड हाईकोर्ट पहुंची थी.
हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि नियमों के अनुसार पद के लिए सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री होना अनिवार्य था. कर्मचारी के पास लंबा अनुभव होने के बावजूद, अनुभव को निर्धारित शैक्षणिक योग्यता का विकल्प नहीं माना जा सकता.
अदालत ने कहा कि जब प्रमोशन की मुख्य आधारशिला (डिग्री) ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश से रद्द हो चुकी है, तो उस पर खड़े प्रमोशन के महल को कानूनी रूप से वैध नहीं रखा जा सकता. हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार कर्मचारी से पहले मिल चुके वेतन या वित्तीय लाभों की रिकवरी (पैसे की वापसी) नहीं की जाएगी, लेकिन डीजीएम पद से हटाकर टेक्निकल असिस्टेंट बनाने का डिमोशन आदेश पूरी तरह वैध रहेगा.
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