अनुराग
झारखंड में अगस्त 2026 की सालाना खुदरा महंगाई दर दिल्ली से अधिक रही. राज्य में यह दर 3.14 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि दिल्ली में 2.61 प्रतिशत रही. दोनों के बीच 0.53 प्रतिशत अंक का अंतर है. हालांकि, अपने सभी पांच पड़ोसी राज्यों के मुकाबले झारखंड में महंगाई की रफ्तार कम रही. देश की औसत दर भी झारखंड से ऊपर 4.82 प्रतिशत दर्ज की गई.
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index–CPI) के अगस्त के अनंतिम आंकड़ों में यह तस्वीर सामने आई है. ये आंकड़े ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों को मिलाकर तैयार किए गए हैं. इनमें महंगाई दर पिछले साल के उसी महीने के मुकाबले कीमतों में बढ़ोतरी बताती है. दिल्ली से अधिक दर होने का मतलब यह नहीं है कि झारखंड में सामान या रहना दिल्ली से महंगा है.
ओडिशा में सबसे अधिक, पश्चिम बंगाल की दर झारखंड के करीब
झारखंड और उसके पांच पड़ोसी राज्यों की तुलना में ओडिशा की महंगाई दर सबसे अधिक 5.52 प्रतिशत रही. उत्तर प्रदेश में यह 5.09 प्रतिशत, बिहार में 4.22 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 3.78 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 3.28 प्रतिशत दर्ज की गई.
झारखंड की 3.14 प्रतिशत दर से सबसे कम अंतर पश्चिम बंगाल का रहा. दोनों के बीच 0.14 प्रतिशत अंक का फासला था. वहीं, ओडिशा की दर झारखंड से 2.38 प्रतिशत अंक अधिक रही.
उत्तर प्रदेश में झारखंड के मुकाबले महंगाई दर 1.95 प्रतिशत अंक, बिहार में 1.08 प्रतिशत अंक और छत्तीसगढ़ में 0.64 प्रतिशत अंक अधिक रही. यानी पिछले साल के अगस्त की तुलना में कीमतें बढ़ने की औसत रफ्तार झारखंड में इन पांचों राज्यों से धीमी थी.

राज्यों में पांचवीं सबसे कम महंगाई दर
अगस्त में केवल राज्यों की तुलना करें तो झारखंड की महंगाई दर देश में पांचवीं सबसे कम रही. मिजोरम में 2.35 प्रतिशत, मेघालय में 2.74 प्रतिशत, नगालैंड में 2.88 प्रतिशत और अरुणाचल प्रदेश में 3.11 प्रतिशत महंगाई दर्ज की गई. इन चार राज्यों की दर झारखंड से नीचे रही.

केंद्रशासित प्रदेशों को भी शामिल करने पर झारखंड और लक्षद्वीप संयुक्त रूप से छठे सबसे कम स्तर पर रहे. दोनों की दर 3.14 प्रतिशत थी. दिल्ली की दर भी झारखंड से नीचे रही. वह केंद्रशासित प्रदेश है, इसलिए केवल राज्यों की तुलना में उसे शामिल नहीं किया गया है.
यह क्रम कीमतें बढ़ने की सालाना रफ्तार का है, सबसे सस्ते राज्यों का नहीं.
दिल्ली से अधिक दर, फिर भी सामान सस्ता कैसे हो सकता है?
इसे एक काल्पनिक उदाहरण से समझ सकते हैं. मान लीजिए, दिल्ली में कोई सामान पिछले साल 200 रुपये का था और इस साल 205 रुपये का हो गया. पांच रुपये की बढ़ोतरी के बावजूद कीमत में इजाफा 2.5 प्रतिशत हुआ.
झारखंड में उसी तरह का सामान पिछले साल 100 रुपये का था और इस साल 104 रुपये का हो गया. यहां चार रुपये की बढ़ोतरी हुई, लेकिन प्रतिशत में यह चार प्रतिशत है.

इस उदाहरण में झारखंड में सामान की कीमत अब भी दिल्ली से कम है, जबकि उसके महंगा होने की रफ्तार अधिक है. ये किसी बाजार के वास्तविक भाव नहीं, बल्कि कीमत और महंगाई दर का अंतर समझाने के लिए दिए गए उदाहरण हैं.
दिल्ली और झारखंड की महंगाई दर को भी इसी अंतर के साथ देखना होगा. दिल्ली की कम दर केवल यह बताती है कि वहां पिछले साल के मुकाबले औसत कीमतें धीमी रफ्तार से बढ़ीं. किस जगह परिवार का खर्च अधिक है, यह जानने के लिए राशन, किराया, परिवहन, इलाज और पढ़ाई की वास्तविक लागत की तुलना करनी होगी.
जुलाई के मुकाबले धीमी हुई कीमतें बढ़ने की सालाना रफ्तार
झारखंड की सालाना महंगाई दर जुलाई में 3.50 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 3.14 प्रतिशत रह गई. इसमें 0.36 प्रतिशत अंक की कमी आई. इसी दौरान देश की दर 4.45 प्रतिशत से बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई.
जुलाई की सालाना दर में जुलाई 2026 की कीमतों की तुलना जुलाई 2025 से की गई है. अगस्त की दर में अगस्त 2026 की तुलना अगस्त 2025 से हुई है. इसलिए इन दोनों दरों में कमी का मतलब जुलाई से अगस्त के बीच सामान सस्ता होना नहीं है. इसका मतलब है कि पिछले साल के मुकाबले कीमतें बढ़ने की रफ्तार धीमी हुई.
राज्य की कुल महंगाई दर से यह पता नहीं चलता कि इस कमी में सब्जियों, अनाज, ईंधन या दूसरी वस्तुओं का कितना योगदान रहा. किसी एक वस्तु या सरकारी फैसले को इसकी वजह बताने के लिए अलग-अलग श्रेणियों के विस्तृत आंकड़े जरूरी हैं. फिलहाल आंकड़े झारखंड में सालाना महंगाई की रफ्तार घटने की पुष्टि करते हैं, इसकी किसी एक निश्चित वजह की नहीं.
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