13 सितंबर 1948 यानी आज से ठीक 78 साल पहले, भारत आजादी की सुबह देख चुका था. देश का तिरंगा शान से फहरा रहा था. लेकिन, अगर आप उस वक्त के भारत के नक्शे को देखें, तो उसके ठीक बीचों-बीच एक बहुत बड़ा छेद नजर आता था — हैदराबाद रियासत.
देश आजाद हो चुका था, पर यह भूभाग अभी भी भारत का हिस्सा नहीं बना था. और फिर, इसी तारीख को भारतीय सेना ने उस रियासत के खिलाफ एक ऐसा कदम उठाया, जिसे इतिहास ‘ऑपरेशन पोलो’ (Operation Polo) के नाम से जानता है. महज़ पांच दिन… और निजाम के महलों से लेकर मैदानों तक, सब कुछ बदल गया.
लेकिन इन पांच दिनों की आग सुलगती कैसे रही? आइए, पीछे मुड़कर उस इतिहास के पन्नों को पलटते हैं.
565 रियासतों का ज्वार और एक अनसुलझी पहेली
अगस्त 1947. जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए, तो वे पीछे एक खुला खेल मैदान छोड़ गए थे—565 से ज्यादा रियासतें. राजा, महाराजा, नवाब और निजाम… हर कोई अपनी-अपनी ताकत के नशे में था.
ब्रिटिश राज की विदाई के साथ उनकी ‘सर्वोच्चता’ (Paramountcy) भी खत्म हो चुकी थी. अब सवाल यह था कि यह बिखरा हुआ भारत एक कैसे होगा? अगर हर रियासत अपनी मनमानी करती, तो नक्शा कागज़ की तरह बिखर जाता.
यह चुनौती थी देश के गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और उनके साथी वी.पी. मेनन के सामने. ज्यादातर राजाओं ने सूझबूझ दिखाई और भारत या पाकिस्तान के साथ हाथ मिला लिया. लेकिन कुछ रियासतें ऐसी थीं, जिनकी जिद इतिहास का सबसे बड़ा कांटा बन गई—और उनमें सबसे बड़ा नाम था हैदराबाद.
भारत के सीने पर बसा एक स्वतंत्र देश का ख्वाब
हैदराबाद कोई छोटा-मोटा इलाका नहीं था. यह भारत की सबसे विशाल रियासत थी, जो आज के तेलंगाना, महाराष्ट्र और कर्नाटक के एक बड़े हिस्से तक फैली हुई थी. यहां राज था मीर उस्मान अली खान, आसफ जाह सप्तम का (दुनिया के सबसे अमीर आदमियों में से एक) उनके पास अपनी सेना थी, अपना खजाना था, अपनी मुद्रा (Currency) थी. निजाम को लगता था कि वे भारत के भीतर एक आजाद, संप्रभु देश चला सकते हैं.
लेकिन नक्शे को देखिए, हैदराबाद भारत के ठीक बीचों-बीच बैठा था. बीच देश में एक दूसरा स्वतंत्र देश? दिल्ली के हुक्मरानों को यह किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं था.
शुरुआत में बातचीत का दौर चला. नवंबर 1947 में एक ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ (Standstill Agreement) भी हुआ, ताकि वक्त मिल सके. लेकिन पर्दे के पीछे हालात बद से बदतर हो रहे थे. हैदराबाद के भीतर कासिम रिजवी के नेतृत्व में मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन और उनका सशस्त्र दस्ता—’रजाकार’ अपनी ताकत बढ़ा चुका था. ये कट्टरपंथी ताकतें भारत में विलय के सख्त खिलाफ थीं. धीरे-धीरे रजाकारों की हिंसा और लूटपाट ने सीमाओं पर खौफ का माहौल बना दिया.
अब यह मामला सिर्फ दो राजनीतिक पक्षों के बीच का नहीं रह गया था. यह आम लोगों की सुरक्षा और देश की अखंडता का सवाल बन गया था.
13 सितंबर: जब खामोशी टूटी और गूंजी तोपों की आवाज
नेहरू और पटेल शांति चाहते थे, लेकिन सितंबर 1948 आते-आते यह साफ हो गया कि निजाम सिर्फ वक्त खींच रहे हैं. बातचीत के दरवाजे बंद हो चुके थे.
और फिर आ गई वह तारीख… 13 सितंबर 1948 की सुबह.
भारतीय सेना ने मेजर जनरल जे.एन. चौधरी के नेतृत्व में हैदराबाद की सीमाओं को लांघ दिया. सरकार ने इसे ‘युद्ध’ नहीं, बल्कि “पुलिस एक्शन” का नाम दिया था. लेकिन मैदान में नजारा किसी बड़े युद्ध से कम नहीं था. एक तरफ अनुशासित, आधुनिक हथियारों से लैस भारतीय सेना थी, तो दूसरी तरफ निजाम की फौज और जोश से भरे रजाकार. लेकिन यह मुकाबला टिकने वाला नहीं था. चारों तरफ से घिर चुकी हैदराबाद की सेना के हौसले महज कुछ ही घंटों में डगमगाने लगे.
सिर्फ 5 दिन और सब खत्म
यह एक ऐसा तूफान था जो पांच दिनों से ज्यादा टिक नहीं सका. कार्रवाई शुरू होने के ठीक पांचवें दिन यानी 17 सितंबर 1948 को निजाम के होश फाख्ता हो चुके थे. आखिरकार निजाम को झुकना पड़ा. उन्होंने युद्धविराम का ऐलान किया, रजाकारों को भंग करने का आदेश दिया और हैदराबाद के सेना प्रमुख मेजर जनरल सैयद अहमद एल-एड्रूस ने भारतीय सेना के सामने हथियार डाल दिए.
इस तरह, पांच दिन के उस छोटे लेकिन तीव्र ऑपरेशन ने भारत के नक्शे के बीच का वह नासूर हमेशा के लिए मिटा दिया.
एक जीत… और उसके साये में छिपा सच
लेकिन इस कहानी का अंत यहीं नहीं होता. ऑपरेशन पोलो को सिर्फ एक शानदार सैन्य जीत मान लेना इस इतिहास के साथ आधा न्याय होगा. इस कार्रवाई के दौरान और उसके बाद, सांप्रदायिक हिंसा का जो खूनी खेल खेला गया, उसने हजारों बेकसूरों की जिंदगियां तबाह कर दीं. बाद में बनी सुंदरलाल समिति की रिपोर्ट ने इस अंधेरे सच को भी दुनिया के सामने रखा.
यही वजह है कि 13 सितंबर सिर्फ एक तारीख नहीं है. यह उस राजनीतिक जिद, सैन्य पराक्रम, और एक नए देश के निर्माण के दर्द की पूरी दास्तान है, जिसने आधुनिक भारत को उसका आज का स्वरूप दिया.
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