देश की राजधानी को सपनों का शहर कहा जाता है, लेकिन पूर्वोत्तर से अपनी उम्मीदें और भविष्य तलाशने दिल्ली आने वाले नागरिकों के लिए यह शहर बार-बार एक भयानक असुरक्षा का गवाह बना है. कभी पार्किंग या शोर पर मामूली कहासुनी, कभी बंद कमरों में संदिग्ध मौतें, तो कभी सीधे तौर पर नस्ली फब्तियां और बेरहम हिंसा.
7 सितंबर 2026 को मणिपुर के 55 वर्षीय संगीतकार और शिक्षक चोंगथाम विक्रम सिंह की हत्या ने एक बार फिर राष्ट्रीय राजधानी के अंतःकरण को झकझोर दिया है. यह कोई पहली घटना नहीं है. बीते दो दशकों में ऐसे कई नाम सामने आए हैं, जिन्होंने दिल्ली की अंतरात्मा पर कभी न मिटने वाले सवालिया निशान छोड़े हैं.
दो दशकों का खूनी आईना : वो नाम जो भुलाए नहीं जा सकते
2006: लूसी काशुंग – मिजोरम
16 दिसंबर 2006 को लूसी काशुंग को संदिग्ध हालत में अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. बाद में अदालत में चली कार्रवाई में आरोपी के खिलाफ हत्या समेत गंभीर धाराओं में मामला सामने आया.
2007: केजेविली – नगालैंड
9 सितंबर 2007 को 24 वर्षीय केजेविली की गांधी विहार में एक पार्टी के दौरान हुई मामूली बहस के बाद चाकू मारकर हत्या कर दी गई.
2009: गैपुइलियू गैंगमेई – मणिपुर
17 अप्रैल 2009 को महिपालपुर में मणिपुर की नगा समुदाय की एक नाबालिग लड़की का शव पानी की टंकी से बरामद हुआ. इस घटना में यौन हिंसा और हत्या का खौफनाक पहलू सामने आया.
2009: लैंगाइलु पामेई – मणिपुर
15 मई 2009 को दिल्ली के रिज इलाके में 25 वर्षीय नर्स लैंगाइलु पामेई का गला कटा शव मिला. इस घटना ने राजधानी में अकेले काम करने वाली पूर्वोत्तर की महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए.
2009: रामचंफी हॉंगरे – मणिपुर
24 अक्टूबर 2009 को मुनिरका के किराये के कमरे में 19 वर्षीय रामचंफी हॉंगरे की गला दबाकर हत्या कर दी गई. जांच की सुई आईआईटी दिल्ली के एक शोधार्थी तक पहुंची. इस मामले ने पढ़े-लिखे तबके की मानसिकता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए.
2013: रेंगाम्फी आउंगशी – मणिपुर
29 मई 2013 को चिराग दिल्ली के एक कमरे में 21 वर्षीय रेंगाम्फी आउंगशी का शव मिला. पुलिस ने शुरुआती तौर पर इसे आत्महत्या माना, लेकिन परिवार और पूर्वोत्तर के संगठनों ने इसे सुनियोजित हत्या बताते हुए लंबे समय तक संघर्ष किया.
2014: नीडो तानिया – अरुणाचल प्रदेश
30 जनवरी 2014 को लाजपत नगर में 19 वर्षीय छात्र नीडो तानिया के बालों और पहनावे को लेकर फब्तियां कसी गईं. विरोध करने पर उसकी बेरहमी से पिटाई की गई और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई.
देशव्यापी जनाक्रोश के बाद केंद्र सरकार को एम.पी. बेजबरुआ समिति गठित करनी पड़ी. समिति ने नस्ली हिंसा से निपटने के लिए कड़े कानूनों और पुलिस सुधारों समेत कई सिफारिशें कीं. लेकिन इन सिफारिशों के जमीनी क्रियान्वयन को लेकर सवाल आज भी बने हुए हैं.
2014: अखा सालौनी – मणिपुर
21 जुलाई 2014 को कोटला मुबारकपुर में 29 वर्षीय अखा सालौनी को पीट-पीटकर मार डाला गया. पुलिस ने इसे रोड-रेज बताया, जबकि प्रत्यक्षदर्शियों और पूर्वोत्तर के संगठनों ने इसे नस्लवादी नफरत का नतीजा बताया.
2026: चोंगथाम विक्रम सिंह – मणिपुर
7 सितंबर 2026 को दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के किलोकरी में घर के बाहर तेज शोर पर आपत्ति जताने के बाद 55 वर्षीय संगीत शिक्षक चोंगथाम विक्रम सिंह पर जानलेवा हमला हुआ. ब्लंट-फोर्स इंजरी से उनकी मौत हो गई. मामले में आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है और पुलिस नस्ली कोण से भी जांच कर रही है.
सवाल सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, मानसिकता का है
इन घटनाओं को केवल अलग-अलग आपराधिक आंकड़े मानकर खारिज नहीं किया जा सकता. भले ही हर मामले की परिस्थितियां और कानूनी नतीजे अलग रहे हों, लेकिन इन घटनाओं के बीच एक समान दर्द दिखाई देता है – पूर्वोत्तर के नागरिकों को अपने ही देश की राजधानी में ‘बाहरी’ समझे जाने का दर्द.
नीडो तानिया की मौत के बाद गठित बेजबरुआ समिति की सिफारिशों के करीब 12 साल बाद भी जब एक सम्मानित संगीतकार को घर के बाहर शोर का विरोध करने पर पीट-पीटकर मार दिया जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पुलिस हेल्पलाइन और औपचारिक विशेष सेल से आगे उस सामाजिक पूर्वाग्रह पर कितना काम हुआ, जो कई बार हिंसा का रूप ले लेता है.
विक्रम सिंह की पत्नी ने प्रतिशोध नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और न्याय की मांग की है.
साल 2006 की लूसी से लेकर 2026 के विक्रम सिंह तक – तारीखें बदलीं, हुकूमतें बदलीं, लेकिन सवाल वही बना रहा. क्या पूर्वोत्तर के नागरिकों को अपनी ही राजधानी में बेखौफ जीने का हक कभी पूरी तरह मिल पाएगा?
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