सुप्रीम कोर्ट में 8 सितंबर को पेश की गई अमिकस क्यूरी की एक रिपोर्ट ने झारखंड की डीजीपी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है. सुप्रीम कोर्ट में डीजीपी नियुक्तियों के मामले में अमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि तदाशा मिश्रा को रिटायरमेंट से ठीक एक दिन पहले डीजीपी बनाना सुप्रीम कोर्ट की प्रकाश सिंह गाइडलाइन के खिलाफ है. सबसे अहम सवाल यह है कि जिस अधिकारी की रिटायरमेंट में सिर्फ एक दिन बचा था, उन्हें डीजीपी बनाकर दो साल का कार्यकाल कैसे दिया गया.
मामला क्या है?
पूरा मामला डीजीपी की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट की तय की गई शर्तों से जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह गाइडलाइन मामले में कहा गया था कि राज्य का डीजीपी ऐसे अधिकारियों में से चुना जाना चाहिए जिनके पास रिटायरमेंट से कम से कम 6 महीने का कार्यकाल बाकी हो. साथ ही डीजीपी को कम से कम दो साल का कार्यकाल देने की व्यवस्था है, ताकि पुलिस प्रमुख राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम कर सके.
लेकिन झारखंड में तदाशा मिश्रा को 30 दिसंबर 2025 को पूर्णकालिक डीजीपी बनाया गया. इसके ठीक अगले दिन यानी 31 दिसंबर 2025 को जब उनकी सामान्य रिटायरमेंट होनी थी. यानी नियुक्ति के समय उनके पास करीब एक दिन की ही सेवा बची थी. सरकार के फैसले के बाद उन्हें दो साल का कार्यकाल मिला. यहीं से विवाद शुरू हुआ.
8 सितंबर 2026: अमिकस की रिपोर्ट से मामला फिर गरमाया
अब 8 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में अमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन की रिपोर्ट सामने आई. रिपोर्ट में कहा गया कि अगर झारखंड के 2025 के नियमों में बदलाव करके छह महीने से कम बची सेवा को भी डीजीपी नियुक्ति के लिए पर्याप्त माना जाता है, तो यह प्रकाश सिंह फैसले की मूल भावना के खिलाफ होगा. अमिकस ने खास तौर पर इस बात पर सवाल उठाया कि तदाशा मिश्रा की नियुक्ति रिटायरमेंट से सिर्फ एक दिन पहले हुई.
जनवरी 2025: झारखंड ने बनाए नए डीजीपी नियुक्ति नियम
विवाद की शुरुआत तदाशा मिश्रा की नियुक्ति से भी पहले हो चुकी थी. जनवरी 2025 में झारखंड सरकार ने डीजीपी/आईजीपी यानी Head of Police Force की नियुक्ति के लिए नए नियम अधिसूचित किए.
इन नियमों के कुछ प्रावधानों को लेकर भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया. उन्होंने खास तौर पर Rule 4, Rule 5(c) और Rule 10 को सुप्रीम कोर्ट की प्रकाश सिंह गाइडलाइन के खिलाफ बताया.
मार्च 2025: बाबूलाल मरांडी हाईकोर्ट पहुंचे
बाबूलाल मरांडी की ओर से झारखंड हाईकोर्ट में PIL दाखिल की गई. इसमें सवाल उठाया गया कि राज्य के बनाए नए डीजीपी नियुक्ति नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप हैं या नहीं.
इसके बाद मामला सिर्फ झारखंड हाईकोर्ट तक सीमित नहीं रहा. इसी विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका और अवमानना की कार्यवाही का रास्ता खुला. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में लंबित PIL को अपने पास ट्रांसफर कर लिया, ताकि इसे डीजीपी नियुक्ति से जुड़े मुख्य मामले के साथ सुना जा सके.
नवंबर 2025: तदाशा मिश्रा बनीं प्रभारी डीजीपी
इसके बाद नवंबर 2025 में तत्कालीन डीजीपी अनुराग गुप्ता के पद छोड़ने के बाद तदाशा मिश्रा को प्रभारी डीजीपी बनाया गया. तदाशा ने 7 नवंबर 2025 को यह जिम्मेदारी संभाली. उस समय भी उनकी रिटायरमेंट 31 दिसंबर 2025 को तय थी. यानी उनके पास करीब 55 दिन ही बचे थे.
यहीं से आगे चलकर यह सवाल और बड़ा हो गया कि इतनी कम बची सेवा वाले अधिकारी को स्थायी डीजीपी बनाया जा सकता है या नहीं.
30 दिसंबर 2025: रिटायरमेंट से एक दिन पहले स्थायी डीजीपी
फिर आया 30 दिसंबर 2025. झारखंड सरकार ने तदाशा मिश्रा को पूर्णकालिक डीजीपी नियुक्त कर दिया.
सबसे अहम बात यह थी कि अगले ही दिन यानी 31 दिसंबर को उनकी रिटायरमेंट होनी थी. नियुक्ति के बाद उन्हें दो साल का कार्यकाल मिल गया. यही नियुक्ति अब सुप्रीम कोर्ट में विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा है.
नियुक्ति से ठीक पहले नियम में भी बदलाव
विवाद सिर्फ नियुक्ति की तारीख को लेकर नहीं है. अमिकस की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि झारखंड सरकार ने Rule 5(c) में बदलाव किया था. इसमें डीजीपी या एजीपी के तौर पर 30 साल की सेवा पूरी करने के बाद बिताई गई सेवा अवधि को भी residual service की गणना में शामिल करने का प्रावधान जोड़ा गया.
अमिकस का कहना है कि अगर इस बदलाव का असर यह होता है कि छह महीने से कम बची सेवा वाले अधिकारी को भी छह महीने की शर्त पूरी करने वाला माना जाए, तो यह सुप्रीम कोर्ट की प्रकाश सिंह गाइडलाइन से टकराएगा.
सुप्रीम कोर्ट की 6 महीने वाली शर्त क्यों अहम है?
सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी की नियुक्ति को लेकर साफ किया था कि ऐसे अधिकारी पर विचार होना चाहिए जिसके पास रिटायरमेंट से कम से कम 6 महीने का कार्यकाल बाकी हो.
इसका मकसद यह है कि डीजीपी का चयन पारदर्शी तरीके से हो और किसी ऐसे अधिकारी को सिर्फ पसंद के आधार पर पुलिस प्रमुख न बनाया जाए जिसकी रिटायरमेंट बिल्कुल करीब हो. इसीलिए तदाशा मिश्रा की नियुक्ति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब उनके पास सिर्फ एक दिन की सेवा बची थी, तो छह महीने की शर्त कैसे पूरी हुई?
UPSC की भूमिका पर भी सवाल
प्रकाश सिंह व्यवस्था में डीजीपी के चयन में UPSC की भूमिका महत्वपूर्ण है. अमिकस की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि झारखंड के नियमों में राज्य सरकार द्वारा नाम भेजने के लिए एक Nomination Committee का प्रावधान है. अमिकस के मुताबिक यह व्यवस्था अपने आप में गलत नहीं है, अगर UPSC की जरूरी भूमिका बनी रहती है.
लेकिन चयन प्रक्रिया में समय पर प्रस्ताव भेजने और बाहरी निगरानी जैसी व्यवस्था जरूरी है, ताकि आखिरी समय में किसी अधिकारी की नियुक्ति करके नियमों को दरकिनार करने की स्थिति न बने.
फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में है. अमिकस क्यूरी ने अपनी रिपोर्ट में तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को प्रकाश सिंह गाइडलाइन के खिलाफ बताया है. साथ ही झारखंड के डीजीपी नियुक्ति नियमों के कुछ प्रावधानों में ऐसी सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत बताई है, जिससे मनमानी या राजनीतिक दबाव की गुंजाइश कम हो. अब बड़ा सवाल यही है कि सुप्रीम कोर्ट इन नियमों और तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर क्या फैसला करता है.
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